आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, मातृभूमि वंदन : राष्ट्रप्रेम और नागरिक कर्तव्य, Adhyatmik Darshanik Anmol Bhakti Rachna, Matrubhumi Vandan: Rashtraprem aur Nagarik Kartavya
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, मातृभूमि वंदन : राष्ट्रप्रेम और नागरिक कर्तव्य, Adhyatmik Darshanik Anmol Bhakti Rachna, Matrubhumi Vandan: Rashtraprem aur Nagarik Kartavya
यह पाठ हमें राष्ट्रप्रेम मातृभूमि के प्रति श्रद्धा संविधान के सम्मान नागरिक कर्तव्यों जल के महत्व प्रकृति-प्रेम और श्रेष्ठ संस्कारों का संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि देश की सेवा प्रकृति का संरक्षण सदाचार और परोपकार ही सच्चे नागरिक और श्रेष्ठ मानव के गुण हैं।
हम अपने देश के प्रति प्रेम और कर्तव्य-बोध रखते हैं। हमारे लिए देश की सेवा उसकी सुरक्षा और विकास में सक्रिय योगदान देना ही सर्वोपरि धर्म है। संविधान में प्रत्येक नागरिक के कर्तव्य और दायित्व स्पष्ट रूप से बताए गए हैं जिनका पालन करना हम सभी का नैतिक और राष्ट्रीय दायित्व है।
हम अपने देश से प्रेम करते हैं और उसके प्रति अपना कर्तव्य निभाते हैं। हमारे लिए देश की सेवा करना, उसकी रक्षा करना और उसके विकास में मदद करना सबसे बड़ा धर्म है। संविधान में हर नागरिक के कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ साफ-साफ बताई गई हैं, जिन्हें हमें जरूर निभाना चाहिए।
हम अपनी जन्मभूमि की समृद्धि और संविधान के नियमों का सम्मान करते हुए अपने देश की सेवा और विकास के लिए स्वयं को समर्पित करते हैं। हमारा संविधान ही हमारे देश का मार्गदर्शक है जो हमारे कर्तव्यों और दायित्वों को स्पष्ट करता है।
मैं अपनी जन्मभूमि के प्रति वही गहरा सम्मान और प्रेम व्यक्त करता हूँ, जो अपनी मातृभूमि को बार-बार नमन और वंदन करता है। मेरी जन्मभूमि मेरे लिए पूजनीय है उसके प्रति श्रद्धा कृतज्ञता और समर्पण का भाव सदैव मेरे हृदय में बना रहता है।
जो अपनी मातृभूमि को बार-बार नमन और वंदन करता है, वह अपनी जन्मभूमि के प्रति अटूट प्रेम, सम्मान, श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करता है। उसके हृदय में देशभक्ति की भावना सदैव बनी रहती है और वह अपनी मातृभूमि के गौरव तथा उन्नति के लिए समर्पित रहता है।
हमारी मातृभूमि को माँ के समान माना गया है इसलिए उसे भारत माता' कहा जाता है। जिस प्रकार हम अपनी माँ का सम्मान आदर और सेवा करते हैं उसी प्रकार हमें अपनी मातृभूमि के प्रति भी श्रद्धा कृतज्ञता प्रेम और समर्पण का भाव रखना चाहिए। हमारी जन्मभूमि ने हमें पहचान संस्कृति और जीवन के मूल्य प्रदान किए हैं इसलिए उसके प्रति सम्मान और निष्ठा रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
हमारा भारत जल-संपन्न, हरियाली से भरपूर, उपजाऊ तथा अन्न-फल देने वाली भूमि है। हमारा देश प्राकृतिक संपदा से समृद्ध है और अपने लोगों का पालन-पोषण करता है। यह भूमि प्रचुर जल से परिपूर्ण, उर्वर और उत्तम फल देने वाली है। ऐसी पावन मातृभूमि को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।"
मलय पर्वत से आने वाली चंदन-सुगंधित, शीतल और शुद्ध वायु वातावरण को सुगंध एवं शांति से भर देती है। हरी-भरी फसलों से आच्छादित खेत भारत की समृद्धि का प्रतीक हैं। निर्मल चाँदनी से आलोकित रात्रि आनंद, सौंदर्य और उल्लास से भर जाती है। फूलों से सजी-धजी हमारी मातृभूमि अत्यंत सुंदर, मनोहारी और सुखद प्रतीत होती है।
भारत माता करुणा ममता और स्नेह की प्रतीक हैं। भारत की रातें निर्मल चाँदनी से आलोकित होकर आनंद और रोमांच से भर जाती हैं। फूलों से लदे वृक्ष सदा मुस्कराते हुए प्रतीत होते हैं। यहाँ के लोगों की वाणी मधुर है तथा उनकी संस्कृति और व्यवहार प्रेम, सौहार्द और मधुरता से परिपूर्ण हैं। ऐसा लगता है मानो पूरा देश मधुर गीत गुनगुनाकर अपनी समृद्ध संस्कृति और प्रकृति की सुंदरता का गुणगान कर रहा हो।
हमारी भारत माता अपनी संतानों को सुख, समृद्धि और आशीर्वाद प्रदान करती हैं। वे सबका कल्याण करने वाली, सुख देने वाली, वरदान देने वाली और जीवन में खुशियाँ भरने वाली माँ हैं। इसलिए हम श्रद्धा, प्रेम और कृतज्ञता के साथ भारत माता को बार-बार प्रणाम करते हैं।
आर्थिक और मानसिक गतिविधियाँ वहीं फलती-फूलती हैं जहाँ जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। जहाँ जल की उपलब्धता नहीं होती वहाँ न केवल आर्थिक विकास रुक जाता है, बल्कि मनुष्य की मानसिक गतिविधियाँ भी शिथिल और दुखित हो जाती हैं। क्योंकि जल ही जीवन है और जीवन ही जल है। जल के बिना जीवन की कल्पना असंभव है और जीवन के बिना सृजन, चिंतन और प्रगति का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
जल केवल प्यास नहीं बुझता बल्कि सृष्टि में संस्कार संस्कृति और विचारों को भी सींचता है और वही क्षेत्र जीवन के लिए अनुकूल माना जाता है। जल के प्रचुर होने से वहाँ की कृषि का विकास वनस्पति की अधिकता पशु-पक्षियों का संरक्षण और मानव बस्तियों का विस्तार संभव होता है। ऐसे क्षेत्रों में मिट्टी उपजाऊ होती है और भोजन की उपलब्धता विद्यमान रहती है और आर्थिक गतिविधियाँ फलती-फूलती हैं।
जहाँ जल की कमी होती है वहाँ जीवन कठिन हो जाता है और विकास की संभावनाएँ सीमित रह जाती हैं। इसलिए जल को जीवन का आधार कहा गया है और जिन स्थानों पर जल प्रचुर मात्रा में होता है वे प्राकृतिक रूप से समृद्ध माने जाते हैं।
सुजलाम् वह भूमि होती है जहाँ नदियाँ झीलें तालाब और वर्षा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होंता है। ऐसे स्थानों पर जल की कमी नहीं रहती जिससे कृषि उन्नत होती है फसलें अच्छी होती हैं और जन-जीवन सुखमय बनता है। जल की अधिकता के कारण भूमि उपजाऊ होती है और प्रकृति हरी-भरी रहती है और भारत माता की विशेषता यह है कि वह जल-संपदा से भरपूर है और अपने निवासियों का पालन-पोषण करने में सक्षम है।
जिस भूमि में पर्याप्त जल पोषक तत्व और अनुकूल वातावरण होता है वह भूमि बीज बोने पर फसल उत्पन्न करती है। ऐसी भूमि को उर्वर भूमि कहा जाता है। उसी प्रकार किसी भी वस्तु या माध्यम में यदि सृजन वृद्धि और विकास की क्षमता हो, तो उसे भी संतान उत्पन्न करने में सक्षम माना जाता है।
जिस प्रकार ज्ञान देने वाला गुरु अपने शिष्य के भीतर ज्ञान, विवेक और संस्कारों का जन्म कराता है, और जिस प्रकार संस्कृति नई परंपराओं तथा मूल्यों को जन्म देती है, उसी प्रकार 'जन्म' का विचार केवल भौतिक या जैविक उत्पत्ति तक सीमित नहीं है। इसका प्रयोग भावनात्मक, बौद्धिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भी किया जाता है। इस दृष्टि से 'जन्म' किसी नई चेतना, विचार, परंपरा या व्यक्तित्व के उद्भव का भी प्रतीक है।
पर्वतीय नदियाँ सौंदर्य पवित्रता और शीतलता की प्रतीक मानी जाती हैं। उनके प्रवाह के साथ आने वाली चंदन की सुगंध वातावरण को शीतल मधुर और मनमोहक बना देती है। यह सुगंध मन को शांति ताजगी और आनंद का अनुभव कराती है तथा प्रकृति की निर्मलता और सौम्यता का सुंदर बोध कराती है।
भारत की प्रसिद्ध पर्वतीय नदियाँ अपनी निर्मल, शीतल और पवित्र धाराओं के कारण दिव्यता एवं सौंदर्य की प्रतीक मानी जाती हैं। उनका शांत और मनोहारी प्रवाह मानो प्रकृति की सात्त्विक सुगंध को चारों ओर बिखेर देता है। वे शांति, शीतलता, पवित्रता और सात्त्विकता जैसे श्रेष्ठ गुणों का संदेश देती हैं। जिस प्रकार सुगंध दूर-दूर तक फैलकर वातावरण को महकाती है, उसी प्रकार उत्तम संस्कार भी समाज में व्यापक रूप से प्रसारित होकर जन-जीवन को सुगंधित और समृद्ध बनाते है!
भारत की प्रसिद्ध पर्वतीय नदियाँ अपने स्वच्छ शीतल और निर्मल जल के लिए जानी जाती हैं। वे अपने सहज स्वभाव से मन में शांति हृदय में पवित्रता और जीवन में शीतलता का अनुभव कराती हैं। भारत नदियो का सुगंध किसी भौतिक गंध का संकेत नहीं है बल्कि उनके दिव्य सात्त्विक और कल्याणकारी प्रभाव का प्रतीक है। उनके दर्शन स्पर्श जल का सेवन तथा उनके तट पर निवास करने से मन और आत्मा को अद्भुत शांति निर्मलता और आध्यात्मिक सुकून का अनुभव होता।
जिस प्रकार शुद्ध और निर्मल नदियाँ अपने स्वाभाविक गुणों से आसपास के वातावरण को शीतलता, पवित्रता और जीवनदायिनी ऊर्जा से अनुप्राणित करती हैं, उसी प्रकार सात्त्विक संस्कारों और श्रेष्ठ गुणों से युक्त व्यक्ति भी अपने सदाचार, विनम्रता और उत्तम आचरण से समाज में शांति, पवित्रता तथा सकारात्मकता का संचार करते हैं। उनके व्यक्तित्व की सुगंध किसी भौतिक सुगंध की नहीं, बल्कि उनके सद्गुणों, विचारों और कर्मों की होती है। यही कारण है कि ऐसे व्यक्तियों का प्रभाव बिना किसी विशेष प्रयास के दूर-दूर तक फैलता है और वे अनेक लोगों के लिए प्रेरणा एवं आदर्श बन जाते हैं।
शुद्धता और अच्छे संस्कार स्वाभाविक रूप से दूसरों को भी प्रभावित करते हैं जैसे पवित्र नदियाँ पूरे वातावरण को निर्मल बना देती हैं।
संत के सद्गुणों का सुगन्ध और पर्वत की चंदन की सुगंध बिना प्रयास के फैल जाती है चंदन स्वयं को घिसे जाने पर भी सुगंध देता है और उत्तम व्यक्ति कष्ट में भी कल्याण ही करता है।
चंदन की खासियत यह होती है कि उसकी सुगंध स्वतः ही चारों ओर फैलती रहती है, चाहे उसे कोई छुए या न छुए। बल्कि जब उसे घिसा जाता है, तब उसकी सुगंध और अधिक प्रकट होती है। ठीक उसी तरह, सच्चे संत और उत्तम व्यक्ति अपने सद्गुणों और अच्छे आचरण से बिना प्रयास के ही दूसरों पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं
जब श्रेष्ठ व्यक्ति के जीवन में कष्ट या कठिनाइयाँ आती हैं तब भी वे बदले में बुराई नहीं करते बल्कि दूसरों का भला ही करते हैं। उनका स्वभाव परिस्थितियों से नहीं बदलता वे हर हाल में कल्याणकारी रहते हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें