यह रचना बचपन की मासूमियत मातृस्नेह प्रकृति-प्रेम और जीवन की सरलता के महत्व को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है।बचपन की निष्कपट खुशी प्रकृति और माँ के स्नेह की स्मृति तथा वर्तमान जीवन की जटिलताओं के बीच खोई हुई सहजता को पुनः पाने की लालसा यह है कि इस गीत में कवि अपने बचपन की मधुर स्मृतियों को याद करते हुए वर्तमान जीवन की जटिलताओं पर चिंतन करता है। बचपन में निडर निष्कपट आनंदमय और प्रकृति के निकट था। न किसी प्रकार का संकोच था न भय न ही संसार के भेदभाव और चिंताओं का ज्ञान था। परिवार प्रकृति और माँ का स्नेह ही सम्पूर्ण संसार था। जैसे-जैसे कवि बड़ा हुआ ज्ञान जिज्ञासा और सामाजिक अनुभवों के साथ जीवन में संकोच भय चिंता और अनेक प्रकार के बंधन बढ़ते गए। बचपन की सहजता और स्वतंत्रता धीरे-धीरे दूर होती गई तथा जीवन सांसारिक उलझनों में घिर गया। लगता है कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं ने मन की सरलता और निडरता को छीन लिया है। माँ और प्रकृति की गोद में बिताए उन सुखद दिनों को पुनः पाने की आकांक्षा उत्पन्न होने लगी है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, बड़ा खुश था मैं उस दिन जिस दिन जानता ना मैं किसीको , #Bada Khush Tha Main Us Din Jis Din Jaanta Na Main Kisi ko, Writer ✍️ #Halendra Prasad
#Bada Khush Tha Main Us Din Jis Din Jaanta Na Main Kisi ko.
Writer ✍️ #Halendra Prasad
BLOGGER=} 🙏♥️ #मेरी_हृदय_मेरी_माँ ♥️🙏
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जब याद आती है बचपन की वो दिन मुझको
बड़ा खुश था मैं उस दिन जिस दिन जानता ना मैं किसीको
मेरी मासूमियत ने मेरे निडरता को जगाया
जीवन का आनन्द मुझको बचपन सिखाया
जैसे जैसे दिन गुजरा वैसे मै बढ़ा हुआ
संकोच और भय ने मुझको अजबे रुलाया दया
बढ़ती जिज्ञासा मेरी प्यास की लहर थी
जान ने की इच्छा मेरी चाहत बे खबर थी
जब याद आती है बचपन की वो दिन मुझको
बड़ा खुश था मैं उस दिन जिस दिन जानता ना मैं किसीको
सहज आनंद से अब मैं दूर हो गया हूँ
प्यास की घड़ी में मैं अब मजबूर हो गया हूँ
खेलता था बचपन में मैं कुदरत के साथ में
वहीं मेरा ईश्वर था दुनियां संसार में
जानता ना था मैं ना मुझे मालूम था
कोशिशें क्या करता मैं वहीं मेरी दुनियां था
मात पिता भाई बन्धु सब था प्रकृति
खेलता था गोद में उनके बनकर मैं सारथी
जब याद आती है बचपन की वो दिन मुझको
बड़ा खुश था मैं उस दिन जिस दिन जानता ना मैं किसीको
ना कोई झिझक थी मन में ना कोई डर था
अपना पराया का मुझे ना फिकर था
जीवन की उस खेल में मैं खेलता जिगर से
स्वतंत्र से भरा था खुशियां आनन्द के उस घर में
बचपन का दिल मेरा बिल्कुल सरल था
ममता के आँचल में पल निष्कपट में रहा था
ना कोई पद जानता ना कोई रहस्य को
जानता था दिल मेरा प्रेम और अपनत्व को
जब याद आती है बचपन की वो दिन मुझको
बड़ा खुश था मैं उस दिन जिस दिन जानता ना मैं किसीको
जीवन की उस दौर में मैं चलता था खुशियों पे
सन्देह नहीं था मन में कोई खेलता था सुखियों में
जैसे जैसे बड़ा हुआ मैं फितरत मेरा बदल गया
भूल गया बचपन की बातें जीवन खेल से निकल गया
निष्कपट निडर सब दूर हुआ घेर लिया जंजालों ने
प्यास लगी थी दिल को मेरे आँख भरे है पानी में
खुला मन अब सिमट गया है इस दुनियां की रीति में
मांग रहा कुदरत से वो दिन याद आती मुझे राती में
जब याद आती है बचपन की वो दिन मुझको
बड़ा खुश था मैं उस दिन जिस दिन जानता ना मैं किसीको
जीवन का ये जोग कैसा माँ कैसे बदल जाती है
तेरी आँचल छोड़ देती जब जीवन बिखर जाती है
बड़ा किया है तूने तो संकोच झिझक को मारा क्यों ना
डर भय ने मुझे जार दिया है तूने उसको डाटा क्यों ना
जीवन सिमट गया है ऐसे जैसे अवचेतन ने मारा
चेतना की प्रतिक्रया ना है अब कौन मुझे उबारा
सब दूर हुआ सहजता अब बचपन याद आती है
भर देती आँखो में आँसू अब दूर नहीं जाती है
जब याद आती है बचपन की वो दिन मुझको
बड़ा खुश था मैं उस दिन जिस दिन जानता ना मैं किसीको
गीत =} #बड़ा खुश था मैं उस दिन जिस दिन जानता ना मैं किसीको
#Bada Khush Tha Main Us Din Jis Din Jaanta Na Main Kisi ko.
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