आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल रचना,मानव और ब्रह्मांड की एकता का अनुभव, Manav Aur Brahmand Ki Ekta Ka Anubhav,
मनुष्य का शरीर और ब्रह्मांड एक ही चेतना और प्राणशक्ति से जुड़े हैं। जो ऊर्जा सृष्टि को चलाती है वही मनुष्य के भीतर प्राण के रूप में प्रवाहित होती है। जब यह ऊर्जा संतुलित होती है तो मन शांत होता है और ध्यान की अवस्था सहज हो जाती है। इसी अनुभव से साधक समझता है कि मानव और ब्रह्मांड अलग नहीं बल्कि एक ही सत्य की अभिव्यक्ति हैं।
जो शरीर में है वही ब्रह्मांड में है और जो ब्रह्मांड है वो शरीर में है भीतर बहने वाली चेतना प्राणशक्ति वही प्राण शक्ति जो पूरा ब्रह्मांड में संचालित हो होता है तन के नस नस में जो ऊर्जा प्रवाहित होता वो ब्रह्मांड में होता है!
सब उसी प्राणशक्ति चेतना के रूप है जो शरीर में प्राणशक्ति बहती है वही ऊर्जा पूरे ब्रह्मांड को भी चलाती है। सांस, हृदय की धड़कन, विचार सब उसी चेतना के रूप स्वरूप हैं।
शरीर में जो सांस चल रही है वह केवल हवा का आना-जाना नहीं है बल्कि प्राण का प्रवाह है हृदय की धड़कन मस्तिष्क में विचार और नसों में बहती ऊर्जा सब उसी चेतना की अभिव्यक्ति हैं।
मनुष्य कोई अलग सत्ता नहीं बल्कि सृष्टि की लय में बंधा हुआ एक स्वर है जैसे संसार चलता है जैसे सृष्टि में ताल–मेल है वैसे ही शरीर मन और ऊर्जा भी चलते हैं मानव अलग नहीं है और उसी नियम से चलता है जिससे सूर्य ग्रह और सृष्टि चलती है।
प्राणशक्ति जब संतुलित होती है तो मन शांत और चेतना जागृत होती है। क्योंकि सृष्टि नृत्य ऊर्जा नर्तक शरीर संतुलन और सममिति स्थिरता योग और ध्यान की अवस्थाएँ हैं।
जब शरीर में प्राण का प्रवाह संतुलित होता है तो मन शांत और स्थिर हो जाता है विचार स्पष्ट हो जाते हैं और चेतना अधिक जागृत और सजग होती है।
प्राण शरीर की सूक्ष्म ऊर्जा नाड़ियों में बहता है, जिन्हें नाड़ी कहा जाता है। जब इनका प्रवाह संतुलित होता है, तब मन स्वाभाविक रूप से ध्यान में स्थिर होने लगता है।
योग और ध्यान की अवस्था यह है कि जब शरीर मे संतुलन सममिति स्थिरता आ जाते हैं तब मन सहज रूप से ध्यान की अवस्था में प्रवेश करता है और धीरे-धीरे साधक अपने भीतर की चेतना को अनुभव करने लगता है।
जब साधक की अवस्था जागृत होती हैं तो मन समझ नहीं पाता विचार भटकते हैं रातों में प्रश्न जागते हैं कभी आत्मा को पुकारते हैं कभी भूल जाते हैं
मन की गति कभी पूरी तरह बुझती या रुकती नहीं, क्योंकि साधक अभी साधना की अवस्था में है जब अनुभव हो जाता है, पर बुद्धि उसे पकड़ या समझ नहीं पाती।
मन स्वभाव से चंचल बहुत है इसलिए साधक के भीतर उसकी गति बनी रहती है अनुभव कभी-कभी ध्यान या साधना में अचानक हो जाता है लेकिन बुद्धि सीमित है जिसके कारण वह उस सूक्ष्म अनुभव को शब्दों या तर्क में पूरी तरह पकड़ नहीं पाती है।
आत्मा को रूप की ज़रूरत नहीं सत्य को मूर्ति की ज़रूरत नहीं भावनाएँ और धारणाएँ ही दुनिया बनाती हैं जिसे अद्वैत वेदांत का भाव कहते है क्योंकि सत्य न झूठ है न रूप है न नाम है बस केवल अनुभव है।
शरीर की बनावट सृष्टि जैसी है मस्तिष्क ब्रह्मांड जैसा है क्योंकि सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और आधुनिक विज्ञान भी यही कहता है।
मानव और ब्रह्मांड अलग नहीं हैं जो शक्ति बाहर है वही भीतर है जो सृष्टि को नचाती है, वही मेरे तन को चलाती है पर इसे पूरी तरह समझ पाना बहुत कठिन है फिर भी हम इसे जीता है जिसे सच्ची साधना कहते है।
यदि ध्यान गहरा हो और माँ का हृदय से जुड़ाव हो और अहंकार शिथिल हो तो अनुभव को बहने पर समझ अपने आप उतरने लगती है और साधक अनुभव को शब्द देने लगता है।
साधक के शरीर में प्रवाहित होने वाली ऊर्जा प्राणशक्ति और ब्रह्मांडीय चेतना के बीच गहरे सामंजस्य को व्यक्त करता है। साधक अपने अनुभव के आधार पर यह प्रश्न करता है कि क्या तन की नस–नस में बहने वाली ऊर्जा वही शक्ति है जो पूरी सृष्टि को संचालित करती है।
जैसे सृष्टि एक निश्चित नियम संतुलन और लय में चलती है वैसे ही मनुष्य का शरीर मन और चेतना भी उसी लय से बंधे हैं। यह ऊर्जा शरीर को गतिशील रखती है मन को प्रेरित करती है और आत्मा को जागृत करती है कभी यह शक्ति स्पष्ट अनुभव होती है तो कभी मन उसे समझ नहीं पाता और भ्रमित हो जाता है।
साधक अनुभव करता है कि आत्मा रूप और पदार्थ से परे है सत्य को किसी मूर्ति या आकार की आवश्यकता नहीं होती। शरीर की रचना मस्तिष्क की संरचना और चेतना की गति।सब कुछ ब्रह्मांड से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।
जब साधक अनुभूति पर पहुँचता है कि मनुष्य और ब्रह्मांड अलग नहीं हैं। जो शक्ति सृष्टि को चलाती है।वही शक्ति मनुष्य के भीतर भी प्रवाहित है बल्कि आध्यात्मिक अनुभव और आत्मबोध की अभिव्यक्ति है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें