आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, समृद्धि का वास्तविक रहस्य चाहना नहीं योग्य बनना, Samriddhi Ka Vaastavik Rahasya Chaahna Nahin, Yogya Banna Hai.
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, समृद्धि का वास्तविक रहस्य चाहना नहीं योग्य बनना, Samriddhi Ka Vaastavik Rahasya Chaahna Nahin, Yogya Banna Hai.
जीवन का रहस्य केवल चाहने में नहीं, योग्य बनने में है। जब पात्रता पर कृपा का स्पर्श होता है, तब लक्ष्मी, प्रेम और प्रकाश का आगमन स्वाभाविक हो जाता है। जहाँ पात्रता और कृपा का मिलन होता है, वहाँ लक्ष्मी, प्रेम और प्रकाश स्वयं चले आते हैं।
इच्छा करने वाला और इच्छा का पात्र बनने वाला दोनों में अंतर है। जिसे लक्ष्मी प्राप्त करने की इच्छा होती है, वह पाने की आकांक्षा में लगा रहता है। उसकी साधना, कर्म और मन का केंद्र केवल प्राप्ति बन जाता है। परंतु जिसे स्वयं लक्ष्मी चाहे, वह अपने गुणों और आचरण से ऐसा पात्र बन चुका होता है कि समृद्धि उसके जीवन में स्थिर होने लगती है।
लक्ष्मी का अर्थ केवल धन नहीं है। वह सौभाग्य, सदाचार, सत्य, परिश्रम, संतुलन, संतोष और कल्याण का भी प्रतीक है। शास्त्रों में कहा गया है कि लक्ष्मी वहीं स्थिर रहती है जहाँ पवित्रता, शुद्धता, शील, संयम, ईमानदारी, श्रम, संतोष और धर्म का वास हो। इसलिए लक्ष्य केवल लक्ष्मी को पाने का नहीं, बल्कि उन गुणों को धारण करने का होना चाहिए जिनके कारण लक्ष्मी स्वयं आने और टिकने की इच्छा करे।
जिसे लक्ष्मी चाहे उसे न मिले यह असंभव क्यों ? क्योंकि जहाँ सद्गुण हो वहां लक्ष्मी रुकती ही है जहाँ विनय शील और परिश्रम हो वहां लक्ष्मी चली ही आती है जहाँ ईश्वर की कृपा, मातृशक्ति का आशीर्वाद और मन की पवित्रता हो, वहां लक्ष्मी टिकती है अर्थात लक्ष्मी स्वयं जिसे चुन ले उसे रोकने की शक्ति किसी में नहीं।
जिसे लक्ष्मी स्वयं चाहे, उसे लक्ष्मी न मिले यह लगभग असंभव है। कारण यह है कि लक्ष्मी केवल धन का नाम नहीं, बल्कि समृद्धि, सौभाग्य, सम्मान, संतोष और मंगलमय जीवन का प्रतीक है। जहाँ सद्गुण होते हैं, वहाँ लक्ष्मी ठहरती है। जहाँ विनय, शील, सत्यनिष्ठा और परिश्रम होते हैं, वहाँ लक्ष्मी का आगमन स्वाभाविक हो जाता है। जहाँ धर्म का पालन, मन की पवित्रता, ईश्वर की कृपा और मातृशक्ति का आशीर्वाद होता है, वहाँ लक्ष्मी स्थिर रहने की प्रवृत्ति रखती है।
जो व्यक्ति अपने आचरण, विचार और कर्म से स्वयं को लक्ष्मी का योग्य पात्र बना लेता है, उसके जीवन में किसी न किसी रूप में समृद्धि अवश्य प्रकट होती है। ऐसे व्यक्ति को रोकने वाली बाहरी बाधाएँ कुछ समय के लिए विलंब कर सकती हैं, परंतु उसके गुणों से उत्पन्न होने वाला कल्याण अंततः अपना मार्ग बना लेता है लक्ष्मी को पाने की इच्छा से अधिक महत्वपूर्ण है ऐसा चरित्र बनाना जिसे लक्ष्मी स्वयं चुन ले।
जो व्यक्ति सत्य, शील, संयम, परिश्रम और धर्म का पालन करता है, वह भीतर से ऐसा आधार निर्मित करता है जिस पर स्थायी समृद्धि खड़ी हो सकती है। ऐसी समृद्धि केवल धन तक सीमित नहीं होती; उसमें सम्मान, विश्वास, संतोष, उत्तम संबंध, मानसिक शांति और जीवन की सार्थकता भी सम्मिलित होती है।
दार्शनिक दृष्टि से लक्ष्मी का आगमन बाहरी उपलब्धि मात्र नहीं, बल्कि आंतरिक योग्यता की अभिव्यक्ति है। जब व्यक्ति अपने गुणों से स्वयं को योग्य बनाता है, तब समृद्धि उसके जीवन में कृपा और कर्म दोनों के संयुक्त फल के रूप में प्रकट होती है।लक्ष्मी को प्राप्त करने का श्रेष्ठ मार्ग लक्ष्मी के पीछे दौड़ना नहीं, बल्कि उन गुणों को धारण करना है जिनके कारण लक्ष्मी स्वयं आकर्षित होकर आए और स्थिर हो जाए।
लक्ष्मी का मिलना या न मिलना इच्छा पर नहीं योग्यता चरित्र शुद्ध कर्म और माता की कृपा पर निर्भर करता है इच्छा करने वाले कई हो सकते हैं पर योग्य चुने हुए बहुत विरले होते हैं इसलिए जिसे लक्ष्मी चाह ले उसे लक्ष्मी न मिले ऐसा हो ही नहीं सकता।
इच्छा करने वाले तो असंख्य होते हैं, परंतु स्वयं को योग्य बनाने वाले विरले होते हैं। केवल चाहना पर्याप्त नहीं है; पात्रता का निर्माण करना आवश्यक है। जब व्यक्ति सत्य, सदाचार, परिश्रम, संयम और धर्म को अपने जीवन में धारण करता है, तब वह लक्ष्मी का अधिकारी बनता है।लक्ष्मी केवल धन नहीं, बल्कि समृद्धि, सौभाग्य, सम्मान, संतोष और कल्याण की अधिष्ठात्री शक्ति है। इसलिए वह वहाँ स्थिर होती है जहाँ शुद्धता, विनय, कर्तव्यनिष्ठा और पवित्रता का वास होता है।
जिसे लक्ष्मी स्वयं चुन ले, उसके जीवन में किसी न किसी रूप में समृद्धि का प्राकट्य अवश्य होता है। बाधाएँ मार्ग में आ सकती हैं, समय लग सकता है, परंतु पात्रता और कृपा का फल निष्फल नहीं जाता। इच्छा अनेक लोगों में होती है, किंतु योग्यता कुछ ही लोगों में होती है; और जब योग्यता पर कृपा का स्पर्श हो जाए, तब लक्ष्मी का आगमन केवल संभावना नहीं, स्वाभाविक परिणाम बन जाता है।
निरादर की आशंका से पहले हृदय का काँपना ही मन को संकोची कर देता है जिससे मन दूर हटना चाहता है पर वही तो तुमसे मिलने को व्याकुल खड़ा है जिसे तुम सबसे अधिक चाहते हो तब मन स्वयं को बचाने के लिए दूर हटना चाहता है, कदम पीछे खींच लेता है, और मौन का आश्रय ले लेता है। पर विडंबना यह है कि जिसके पास जाने से वह डरता है, वही तो सामने खड़ा है मिलने को व्याकुल, प्रतीक्षा में स्थिर। और उससे भी बड़ा सत्य यह है कि वही व्यक्ति वह है जिसे मन सबसे अधिक चाहता है। कभी-कभी दूरी प्रेम की कमी से नहीं, बल्कि अस्वीकार हो जाने के भय से जन्म लेती है; जबकि दोनों हृदय एक-दूसरे की ओर बढ़ना चाहते हैं।
जो प्रकाश तुम्हारे लिए ही उतरा है उसे क्यों तुम स्वयं ही ठुकराते हो अपने आपको तुच्छ समझकर मूर्खता की आड़ में क्यों छुप जाते हो शरद की चाँदनी से बचने के लिए सिर पर कपड़ा डाल कर जीवन को शान्ति से अशांति में स्वयं ही क्यों भगाते हो?
जो प्रकाश विशेषत तुम्हारे लिए ही अवतरित हुआ है उसे तुम स्वयं ही क्यों ठुकराते हो? अपने आपको तुच्छ समझकर, आत्म-संशय की छाया में छिपकर, तुम उस अनुग्रह से दूर क्यों भागते हो जो तुम्हें आलोकित करना चाहता है?
शरद की निर्मल चाँदनी से बचने के लिए यदि कोई अपने ही सिर पर आवरण डाल ले, तो दोष चाँदनी का नहीं होता। प्रकाश तो वैसे ही बरसता रहता है; उससे वंचित वही होता है जो अपनी आँखें मूँद लेता है। फिर जीवन को शांति से अशांति की ओर स्वयं क्यों धकेलते हो? क्यों उस सुख से विमुख होते हो जो तुम्हारे द्वार पर खड़ा है?
कभी-कभी सबसे बड़ी बाधा संसार नहीं होता, बल्कि अपनी ही अपात्रता का भ्रम होता है। और जब यह भ्रम हट जाता है, तब ज्ञात होता है कि जिस प्रकाश को हम खोज रहे थे, वह तो आरंभ से ही हमारी प्रतीक्षा कर रहा था।
अपने आपको तुच्छ समझना बुझदिली है भला वह कैसा मूर्ख होगा जो शरीर को शान्ति देने वाली शरद-चाँदनी को रोकने के लिए सिर पर कपड़ा डाल ले जो प्रकाश तुम्हारे लिए ही उतरा है उसे क्यों तुम स्वयं ही ठुकराते हो?
अपने आपको तुच्छ समझना विनम्रता नहीं बल्कि बुझदिली है। भला वह कैसा मूर्ख होगा जो शरीर और मन को शीतलता देने वाली शरद की चाँदनी को रोकने के लिए अपने ही सिर पर कपड़ा डाल ले? चाँदनी तो अपना स्वभाव निभाती है वह सब पर समान रूप से बरसती है। उससे वंचित वही होता है जो स्वयं को उससे वंचित कर लेता है।
उसी प्रकार जो प्रकाश विशेष रूप से तुम्हारे जीवन को आलोकित करने के लिए उतरा है, उसे तुम स्वयं ही क्यों ठुकराते हो? अपने ही मन में हीनता का पर्दा डालकर, अपने ही भाग्य के द्वार पर क्यों खड़े हो जाते हो? जब प्रकाश तुम्हें स्वीकार कर चुका है, तब स्वयं को अस्वीकार करना अज्ञान है और जब अनुग्रह तुम्हारी ओर बढ़ रहा है, तब उससे मुँहमोड़ लेना अपने ही सुख से विमुख होना है।
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