आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, परमात्मा का परम सत्य अद्वैत स्वरूप, Adhyatmik Darshanik Anmol Bhakti Rachna, Paramatma Ka Param Satya Advait Swaroop
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, परमात्मा का परम सत्य अद्वैत स्वरूप, Adhyatmik Darshanik Anmol Bhakti Rachna, Paramatma Ka Param Satya Advait Swaroop
परमात्मा ही समस्त सृष्टि का आदि आधार और अंत है। उसी से सब उत्पन्न होते हैं उसी से सबका पालन होता है और अंततः उसी में सबका लय हो जाता है। वह किसी वस्तु की तरह सीमित अस्तित्व नहीं बल्कि स्वयं समस्त अस्तित्व चेतना और अनंतता का मूलाधार है। समस्त प्राणियों में जो चेतना प्रकाशित है वही एक परम चेतना की अभिव्यक्ति है। नाम रूप और भेद केवल उपाधियों के कारण प्रतीत होते हैं आत्मिक दृष्टि से सबमें वही एक ब्रह्म विद्यमान है। जब यह एकत्व का बोध होता है तब मैं और तू मेरा और तेरा का भेद मिट जाता है। परमात्मा इंद्रियों मन और वाणी की सीमा से परे निर्विकार और अविभाज्य है। वह केवल दृश्य जगत में ही नहीं बल्कि जगत के अभाव में भी नित्य विद्यमान रहता है। वही परम सत्य है जिसके आश्रय से समस्त जगत का अस्तित्व संभव है। इसी अद्वैत सत्य का अनुभव जीवन का परम लक्ष्य है।
परमात्मा ही वह एक मूल स्रोत है जिससे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई है उसी से सबका पालन होता है और अन्त में उसी में सबका लय भी हो जाता है।
सृष्टि का कारण, पालनकर्ता और रक्षक परमात्मा ही है। माता-पिता जैसे स्नेह और करुणा का भाव उसी परम चेतना से उत्पन्न होता है।
जो प्रेम माता-पिता को संतान में दिखता है, वह भी उसी ईश्वर की ही अभिव्यक्ति है।
प्रत्येक प्राणी के भीतर जो चेतना है, वही उस परम चेतना का अंश है। अतः सब प्राणी वास्तव में उसी एक आत्मा के रूप हैं।
तुम सब मेरी आत्मा में स्थित हो फिर भी वास्तव में न तुम हमारे हो और न हम तुम्हारे है
तुम सब मेरी आत्मा में स्थित हो फिर भी वास्तव में न तुम हमारे हो और न हम तुम्हारे है ! भौतिक दृष्टि से हम मेरा और तेरा में बंधे हैं पर आत्मिक दृष्टि से कोई अलग नहीं है। सब एक ही चेतना के विविध रूप हैं।
सब उसी एक परमात्मा की लीला है। जब यह दृष्टि आ जाती है, तब द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल ‘एकत्व’ का अनुभव होता है।
परमात्मा केवल अस्तित्व नहीं है बल्कि अस्तित्व के पार भी है वह सत्ता और असत्ता दोनों का आधार है।
यह साकार जगत है दृश्य पदार्थ जीव ग्रह-नक्षत्र समय कर्म विचार चेतना सब कुछ जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में विद्यमान है। सब में जो चेतन तत्व व्याप्त है, वही परमात्मा है।
जो नहीं है अदृश्य अकल्पनीय निर्विकार स्थिति है। वह जो हमारी बुद्धि इंद्रियों या कल्पना की पहुँच से भी परे है। जहाँ नाम और रूप का अस्तित्व समाप्त हो जाता है वहाँ भी केवल वही परमसत्ता रहती है।
परमात्मा न केवल संसार में विद्यमान है बल्कि संसार के अभाव में भी उसी की सत्ता है। जैसे सागर से लहरें उठती हैं और सागर में ही विलीन हो जाती हैं वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि उसी परमात्मा से प्रकट होकर उसी में विलीन हो जाती है।
सृष्टि का आदि भी है सृष्टि का अन्त भी है और उन दोनों के परे भी वही है। परमात्मा ही एकमात्र सत्य है अस्तित्व और अनस्तित्व दोनों उसी में स्थित हैं। जो कुछ दिखाई देता है वह उसी की लीला है और जो कुछ दिखाई नहीं देता वह भी उसी की मौन उपस्थिति है।
जब हम किसी वस्तु के अस्तित्व की बात करते हैं तो उसका अर्थ होता है कि वह वस्तु अन्य वस्तुओं की तरह जगत में विद्यमान है। लेकिन परमात्मा को इस अर्थ में एक वस्तु नहीं माना जाता। यदि परमात्मा भी केवल एक अस्तित्ववान वस्तु होता तो वह भी अन्य वस्तुओं की तरह सीमित परिभाषित और किसी कारण पर निर्भर होता।
वेदांत के अनुसार परमात्मा वह आधार है जिसके कारण सभी वस्तुएँ अस्तित्व धारण करती हैं। जैसे मिट्टी से बने अनेक पात्रों का आधार मिट्टी है और स्वर्ण से बने अनेक आभूषणों का आधार स्वर्ण है, वैसे ही समस्त नाम और रूपों का अंतिम आधार परम सत्य है। नाम-रूप बदलते रहते हैं, पर उनका आधार एक ही रहता है।
किन्तु यह उपमा भी सीमित है, क्योंकि परमात्मा किसी भौतिक पदार्थ के समान नहीं है। मिट्टी और स्वर्ण स्वयं भी दृश्य, परिवर्तनशील और इंद्रियों से ग्रहण किए जाने वाले पदार्थ हैं, जबकि परमात्मा को वेदांत इंद्रियातीत, निर्विकार और सभी उपमाओं से परे मानता है। इसलिए ये उपमाएँ केवल समझाने के लिए हैं, परमात्मा का पूर्ण स्वरूप बताने के लिए नहीं।
जगत का वास्तविक आधार ब्रह्म है। ब्रह्म को उस तत्त्व के रूप में वर्णित करता है जिससे सब उत्पन्न होता है, जिसके द्वारा सब स्थित रहता है और जिसमें सबका लय होता है।
परमात्मा किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है बल्कि अस्तित्व का मूलाधार है। परमात्मा केवल जगत में नहीं है बल्कि जगत उसी पर आश्रित है।
वह केवल प्राणियों के भीतर नहीं है बल्कि प्राणी प्रकृति चेतना और समस्त अनुभव की संभावना का भी आधार है।इसलिए उसे परम सत्य कहा जाता है क्योंकि अन्य सभी सत्य सापेक्ष और परिवर्तनशील हैं जबकि वही नित्य और स्वाधीन है।
यही कारण है कि वेदान्त में ब्रह्म को "सत्यम्, ज्ञानम्, अनन्तम्" कहा गया है अर्थात् वह सीमित वस्तुओं के समान अस्तित्व नहीं रखता, बल्कि स्वयं अस्तित्व, चेतना और अनंतता का मूल स्रोत है।
उपनिषद विशेषकर इस बात पर जोर देते हैं कि परम सत्य किसी भी इंद्रिय-ग्राह्य वस्तु, रूप, गुण या कल्पना की सीमा में नहीं आता। जब मन और इंद्रियाँ अपनी पूरी क्षमता से किसी वस्तु को पकड़ने में असमर्थ हो जाते हैं, तब वह सीमा अभाव नहीं, बल्कि एक अलग स्तर की “परम सत्ता” की ओर संकेत मानी जाती है।
जो न इंद्रियों से पकड़ा जा सकता है न मन से पूरी तरह सोचा जा सकता है और न शब्दों से पूरी तरह व्यक्त किया जा सकता है उसे अकल्पनीय और निर्विकार कहा जाता है अर्थात उसमें परिवर्तन विकृति या सीमित रूप का आरोप नहीं किया जा सकता।
वेदान्त की भाषा में जब कहा जाता है कि वहाँ नाम-रूप नहीं हैं, तो उसका अर्थ सामान्य शून्यता या पूर्ण अभाव नहीं है। उसका अर्थ यह है कि वहाँ समस्त नाम-रूपात्मक भेद समाप्त हो जाते हैं और केवल वही निरुपाधिक, अविभाज्य परमसत्ता ब्रह्म शेष रहती है जो सभी नाम-रूपों का आधार है।
अद्वैत वेदान्त के अनुसार परम सत्य वह है जहाँ अस्तित्व अनस्तित्व ज्ञाता ज्ञेय विषय विषय-ज्ञान तथा सभी वैचारिक और भाषिक भेद अप्रासंगिक हो जाते हैं। उसे शून्य कहना भी पर्याप्त नहीं क्योंकि शून्य भी एक अवधारणा है। इसलिए ब्रह्म को निर्विकल्प अद्वैत और वाणी-मन से परे कहा जाता है; वह किसी भी अवधारणा से सीमित नहीं किया जा सकता।
परमसत्ता न तो किसी वस्तु के रूप में पकड़ी जा सकती है, न किसी विचार के रूप में पूरी तरह व्यक्त की जा सकती है फिर भी वही हर अनुभव, हर चेतना और हर अस्तित्व की अंतिम पृष्ठभूमि है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें