आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना,चेतना का जागरण: अज्ञान से आत्मबोध तक की जीवन यात्रा, Adhytmik Darshanik Anmol Bhakti Rachana,Chetna Ka Jagran: Agyan se Atmabodh Tak Ki Jeevan Yatra,
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना,चेतना का जागरण: अज्ञान से आत्मबोध तक की जीवन यात्रा, Adhytmik Darshanik Anmol Bhakti Rachana,Chetna Ka Jagran: Agyan se Atmabodh Tak Ki Jeevan Yatra,
आँखें खुली रहें पर चेतना जागृत हो, कर्म योग बन जाए और भीतर की आत्मज्योति प्रज्वलित हो निद्रा और सुस्ती केवल शारीरिक नहीं, बल्कि अज्ञान, आलस्य, मोह और विवेकहीनता का प्रतीक हैं सच्चा जागरण आँखें खोलने से नहीं, बल्कि आत्मचेतना, विवेक और उत्तरदायित्व से होता है। कर्म चेतना सोई रहे तो बंधन बनता है, चेतना जागृत रहे तो मुक्ति का साधन बनता है। अविद्या और विद्या: अविद्या कर्म अहंकार बढ़ाती है; विद्या कर्म को समर्पण और योग में बदल देती है। क्योंकि जागरूक जीवन मोह, आलस्य और अहंकार को छोड़कर, कर्तव्य पर ध्यान देना,संघर्ष और साधना से सफलता और आत्मबोध प्राप्त होता है।
आत्मबोध कर्मयोग और चेतना-जागरण का गूढ़ संदेश कहता है कि निद और सुस्ती को केवल शारीरिक नींद नहीं बल्कि अज्ञान आलस्य मोह और विवेकहीनता का प्रतीक है क्योंकि यह मन और बुद्धि की अवस्था को दर्शाता है।
जब मन सत्य को नहीं पहचानता और आत्मस्वरूप से अनभिज्ञ रहता है तब अज्ञान की स्थिति में रहता है और जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों और साधना से बचता है तो वो आलस्य में स्थित रहता है तथा जब हम अस्थायी चीजों को ही सत्य मान लेते हैं तो मोह के स्थित रहते है और हम सही-गलत का भेद नहीं कर पाते तो विवेकहीनता में स्थित रहते हैं!
आत्मबोध कर्मयोग और चेतना-जागरण की परंपरा में निद्रा और सुस्ती केवल शरीर की अवस्था नहीं मानी जाती बल्कि वे एक आंतरिक चेतना-स्थिति का संकेत हैं। जैसे निद्रा अज्ञान अविद्या सत्य से विमुखता है सुस्ती आलस्य कर्तव्य से विमुखता है मोह आसक्ति भ्रम और अहंकार और विवेकहीनता सही-गलत की पहचान का लोप है!
यह शारीरिक जागरण नहीं बल्कि विवेक का जागरण है कर्मयोग कहता है कि जब तक मन अज्ञान और आलस्य में डूबा है तब तक कर्म बंधन बनता है और जब चेतना जागती है तब वही कर्म मुक्ति का साधन बन जाता है सच्ची जागृति आँख खुलने से नहीं बल्कि आत्मचेतना उत्तरदायित्व और विवेक के उदय से होती है।
मनुष्य मोह आराम और असावधानी में डूबकर अपने साहस जिगर विवेक और लक्ष्य को खो बैठा है क्योंकि जहाँ आध्यात्मिक निद्रा है वहाँ आँखें खुली हैं पर चेतना सोई हुई है मनुष्य जैविक रूप से जाग्रत है पर आत्मिक रूप से सुप्त है आँखें खुली हैं पर दृष्टि नहीं है!
मोह माया में डूबा हुआ मनुष्य सुख-सुविधा आराम और तात्कालिक आनंद में उलझकर अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाता है और साहस जिगर का क्षय हो जाता है जब चेतना सोई रहती है तो व्यक्ति जोखिम लेने सत्य के लिए खड़े होने और आत्म-विकास का प्रयास करने से बचता है और विवेक का लोप होने के कारण सही और गलत स्थायी और अस्थायी सत्य और भ्रम का भेद मिटने लगता है।
जब जीवन दिशा-विहीन हो जाता है तो लक्ष्य को भूल जाता है क्योंकि भीतर कोई स्पष्ट दृष्टि नहीं रहती और जब स्पष्ट दृष्टि नहीं रहती तो आँखें खुलीबर रहती हैं पर दृष्टि नहीं रहती हम देखते सब कुछ हैं पर समझते कम हैं हम जानकारी से भरे हैं पर ज्ञान से खाली हम व्यस्त हैं पर सच में जागरूक नहीं है ।
व्यक्ति संसार देख रहा है कर्म कर रहा है बोल रहा है सोच रहा है परंतु उसकी दृष्टि सत्य पर नहीं बल्कि भोग भय लाभ अहंकार और मोह पर टिकी है वह देखता तो है पर समझता नहीं जानकारी है पर समझ नहीं है हम व्यस्त रहते हैं पर भीतर से जागृत नहीं होते है!
चेतना सोई हुई है यानी आध्यात्मिक निद्रा है चेतना का सोने का मतलब है कि आत्मा की पहचान का अभाव अपने कर्तव्य और उद्देश्य से विस्मृति विवेक का निष्क्रिय हो जाना मैं कौन हूँ? मैं क्यों कर्म कर रहा हूँ? मेरे कर्म का फल किसे बाँध रहा है? जिसे अविद्या कहा गया है।
जब चेतना सोई होती है तो इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन रुक गया है बल्कि यह कि हम यांत्रिक तरीके से जी रहे होते हैं हम कर्म तो करते हैं पर मैं कौन हूँ? इसका उत्तर उधार का होता है इसे हम नहीं ढूंढते मैं क्यों कर रहा हूँ? इसका बोध धुंधला होता है और इसका फल किसे बाँध रहा है? यह समझ ही नहीं आती!
कर्म होता है पर योग नहीं होता जब चेतना सोई होती है कर्म बंधन बनता है धर्म भी स्वार्थ से जुड़ जाता है सेवा भी अहंकार से दूषित हो जाती है यानी जब इन्द्रियाँ राज करती हैं तो विवेक सोया रहता है कर्म होता है पर योग नहीं होता क्योंकि उसमें जागरूकता और समर्पण नहीं होता और सेवा भी अहंकार से दूषित हो जाती है क्योंकि मैंने किया का भाव उसे बाँध देता है!
जब चेतना सोई होती है तब कर्म तो होता है.पर योग नहीं होताक्योंकि योग के लिए स्मृति चाहिए मैं कर्ता नहीं मैं साक्षी हूँ तब कर्म बंधन बन जाता है क्योंकि उसमें फल की आकांक्षा और अहंकार जुड़ा होता है धर्म भी स्वार्थ से रंग जाता है धर्म साधना न रहकर पहचान पद या मान का साधन बन जाता है सेवा भी अहंकार से दूषित हो जाती है मैं कर रहा हूँ मेरे कारण हुआ यही बंधन है!
विवेक का जागरण तभी होता है जब इन्द्रियाँ स्वामी नहीं बल्कि साधन बनती हैं मन निर्देशन में आता है और चेतना साक्षीभाव में स्थिर होती है तभी वही कर्म योग बनता है बंधन नहीं मुक्ति की प्रक्रिया बन जाता है क्योंकि जब इन्द्रियाँ हावी होती हैं।तो व्यक्ति प्रतिक्रियात्मक बन जाता है लेकिन जब वे साधन बनती हैं तो वही इन्द्रियाँ ज्ञान के द्वार बन जाती हैं।
अविद्या में कर्म अहंकार को पुष्ट करता है विद्या में वही कर्म अहंकार को गलाता है इन्द्रियाँ घोड़ों की तरह हैं मन लगाम है और बुद्धि सारथी यदि घोड़े नियंत्रण में न हों तो रथ भटक जाएगा क्योंकि अविद्या में वही कर्म मैं को मजबूत बनाता है और मैंने किया मेरे कारण हुआ मेरा अधिकार है यही सूक्ष्म अहंकार बंधन को गहरा बना देता है।
विद्या में वही कर्म मैं को पिघलाता है कर्तापन ढीला पड़ता है और समर्पण आता है और धीरे-धीरे कर्म मेरे लिए नहीं बल्कि मुझसे होकर होने लगता है यही अंतर है क्योंकि अविद्या कर्म अहंकार की पुष्टि करता जबकि विद्या कर्म अहंकार का क्षय करता है!
जागरण क्या है? यानि जागरण का अर्थ है कि आँख खोलना नहीं बल्कि अंतरदृष्टि को जागना जब व्यक्ति मोह को देख लेता है तो अहंकार को पहचान लेता है और जब अहंकार को पहचान लेता है तो कर्तव्य को फल से अलग कर देता है तब चेतना जागती है तो व्यक्ति प्रतिक्रिया नहीं समझ से जीता है और निर्णय लालच डर से नहीं बल्कि विवेक से जीता हैं और मन धीरे-धीरे शांत और स्थिर होने लगता है!
शरीर का जागना संसार की क्रिया है चेतना का जागना आत्मा की क्रांति है बहुत लोग दिन में चलते-फिरते सोते हैं पर कोई-कोई आँखें बंद कर भी जागा हुआ होता है यही आध्यात्मिक गुरु परंपरा का संदेश है कि जागो पर देह से नहीं अज्ञान मोह और अहंकार से।
जीवन में कठिनाइयाँ काँटे है और संघर्ष आंधी हैं पर वही संघर्ष आगे चलकर फूलों और सफलता में बदलती हैं क्योंकि कष्ट ही विकास का द्वार है भागना नहीं इसे समझना है मेहनत करता है जो वहीं आगे बढ़ता सफलता भाग्य से नहीं बल्कि निरंतर श्रम धैर्य और अनुशासन से मिलती है और यह कर्मप्रधान दर्शन है।
असावधानी और प्रमाद मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं समय का दुरुपयोग आत्मिक पतन बन जाता है सजगता ही सुरक्षा है और चेतना उन्नति क्योंकि गुरु ज्ञान देते हैं माँ संस्कार देती है पिता पालनहारी है आत्मा सत्य दिखाती है और मन को वश में कर आत्मज्ञान पहचानने की प्रेरणा देती है ज्ञान गुरु और आत्मा है और यही जीवन है!
फल की चिन्ता निष्कर्ष से पहले भय है कर्म पूजा है हर मानव के भीतर एक दिव्य दीपक आत्म-ज्योति जलता है किन्तु आलस्य अज्ञान और मोह की धूल ने उसे ढक दिया है नींद शारीरिक नहीं बल्कि आत्मिक जड़ता है मोह और आलस्य को छोड़कर समय चेतना और कर्म का सम्मान करना और गुरु माँ और आत्मा के मार्गदर्शन चलना और फल की चिंता नहीं बल्कि कर्तव्य की साधना संघर्ष करना ही जीवन है
मनुष्य को मोह आलस्य और अज्ञान की नींद से जगाने का संदेश देता है यह है कि सफलता और आत्मिक विकास मेहनत सजगता और कर्मयोग से प्राप्त होते हैं। गुरु माँ और आत्मज्ञान मन को सही दिशा देते हैं। फल की चिंता छोड़कर कर्तव्यपूर्वक कर्म करने से भीतर की आत्मिक ज्योति प्रज्वलित होती है और जीवन सार्थक बनता है।
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