यह गीत मानवता समानता करुणा आत्मसंयम क्षमा और आत्मबोध का संदेश देता है। कवि पीड़ित और निर्धन लोगों के दुःख को अपना दुःख मानता है तथा संसार में व्याप्त गरीबी अमीरी भेदभाव भूख और अभाव जैसी विषमताओं पर चिंता व्यक्त करता है। जिन लोगों को अन्न जल और जीवन की आवश्यक सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं उनकी पीड़ा देखकर कवि का हृदय व्याकुल हो उठता है। वह स्वयं को उनसे अलग नहीं बल्कि उनका अभिन्न अंग मानता है। कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वे राम के समान आकर संसार से दुःख अन्याय और बुराइयों का अंत करें। साथ ही वह मनुष्य के क्रोध आवेश कठोर वाणी अनुशासनहीनता और बड़ों के प्रति असम्मान को उसकी कमजोरियाँ बताता है। मनुष्य को अपनी भूल का एहसास होने पर अहंकार त्यागकर सच्चे मन से क्षमा माँगनी चाहिए। सच्ची क्षमा मनुष्य में आत्मबोध आत्मसंयम और आत्मशुद्धि की भावना उत्पन्न करती है। इस प्रकार गीत प्रेम संवेदना सदाचार और मानवीय एकता के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,उस जनता का अंग हूँ मैं जिसमें भरी पीड़ा भगवन, #Us Janta Ka Ang Hoon Main, Jismein Bhari Peeda Bhagwan, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
#Us Janta Ka Ang Hoon Main, Jismein Bhari Peeda Bhagwan.
Writer ✍️ #Halendra Prasad
BLOGGER=} 🙏♥️ #मेरी_हृदय_मेरी_माँ ♥️🙏
🙏❤️ #Meri_Hriday_Meri_Maa❤️🙏
मैं जान रहा हूँ अलग नहीं हूँ तेरी इस दुनियां से भगवन
उस जनता का अंग हूँ मैं जिसमें भरी पीड़ा भगवन
गरीबी अमीरी का दुःख तू बनाया है
गोरा काला रंग देकर वर्ण बंटवाया है
पद प्रतिष्ठा दिया दिया धन दौलत
निर्धन बनाया जिसे वो भी रोवे हरदम
अन्न का वो दाना दुर्लभ देखता नहीं क्या
कैसी तेरी लीला है तू सोचता नहीं क्या
मैं जान रहा हूँ अलग नहीं हूँ तेरी इस दुनियां से भगवन
उस जनता का अंग हूँ मैं जिसमें भरी पीड़ा भगवन
गरीबी भूख अभाव के कारण कष्ट झेल रहा है
निर्धन गरीब के भगवन हाल बड़ी बुरा है
मैं भी हिस्सा उस पीड़ित का तेरी दुनियां में
व्याकुल दुःख बेचैन है लोग देखकर जहां में
पास कुछ भी है ना तरस रहे है
खाना पानी बिना भगवन भटक रहे है
जन दुख को देखकर मेरा दिल तुमसे बोले
आजा तू राम बन रावण दुःख ने घेरे
मैं जान रहा हूँ अलग नहीं हूँ तेरी इस दुनियां से भगवन
उस जनता का अंग हूँ मैं जिसमें भरी पीड़ा भगवन
देखा है दुनियां को मैं बहुत करीब से
क्षमा याचना क्रोध और आवेश में
ऐसी बातें कह जाता जो कहनी नहीं है
आवेश आकर कुछ सोचता नहीं है
क्रोध में मोहित हो कठोर बोल जाते है
उचित नहीं अनुचित शब्द मुंह से निकाले है
बड़ों की मर्यादा में असम्मान आ गया है
उल्लंघन करता है अब बयार छा गया है
मैं जान रहा हूँ अलग नहीं हूँ तेरी इस दुनियां से भगवन
उस जनता का अंग हूँ मैं जिसमें भरी पीड़ा भगवन
कटुता वचन जग में फैला चारों ओर है
चोट पहुंचाने वाला बोल का भी रोग है
शासना अनुशासन शिष्टाचार लुप्त हुआ है
उद्दंड का व्यवहार अब जग में छा गया है
अज्ञान के विंदू में जब ज्ञान जाग जाता है
क्षमा मांगने लगता है जब दंड में पेराता है
मन में स्वच्छताता है उदण्ड बोध हो जाता
सच्चे हृदय की क्षमा आत्मा को जगाता
मैं जान रहा हूँ अलग नहीं हूँ तेरी इस दुनियां से भगवन
उस जनता का अंग हूँ मैं जिसमें भरी पीड़ा भगवन
गीत=} #उस जनता का अंग हूँ मैं जिसमें भरी पीड़ा भगवन
#Us Janta Ka Ang Hoon Main, Jismein Bhari Peeda Bhagwan.
Writer ✍️ #Halendra Prasad
BLOGGER=} 🙏♥️ #मेरी_हृदय_मेरी_माँ ♥️🙏
🙏❤️ #Meri_Hriday_Meri_Maa❤️🙏
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें