यह गीत माँ की ममता त्याग विरह आँसू और अटूट आशा को समर्पित एक करुण एवं हृदयस्पर्शी रचना है। इस गीत का मूल संदेश है कि माँ का प्रेम निःस्वार्थ अटूट और अमर होता है। संतान कितनी भी दूर क्यों न चली जाए माँ का हृदय उसकी राह देखता रहता है। उसके लिए संतान का लौटना ही अंधकार में सवेरा और सूने जीवन में फिर से उजाला है। इस गीत में एक माँ की ममता पीड़ा विरह और अपनी संतान के लौट आने की प्रतीक्षा का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है। जीवन के संघर्षों ने माँ के शरीर को कमजोर कर दिया है लेकिन उसके हृदय में संतान के प्रति प्रेम और ममता आज भी उतनी ही गहरी है। माँ अपने दुःख को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाती। उसकी आँखों से बहते आँसू ही उसके मन की व्यथा और वर्षों से संजोए दर्द की कहानी कहते हैं। उसकी मुस्कान के पीछे अकेलापन संघर्ष और बिछोह की अनगिनत यादें छिपी हैं। माँ संतान के कदमों की आहट सुनते ही माँ के भीतर बुझी हुई आशा फिर जाग उठती है। सूना आँगन जैसे जीवंत हो जाता है और उसके आँसू दुःख के साथ-साथ खुशी और प्रेम के भी प्रतीक बन जाते हैं। माँ का कमजोर शरीर भले ही जीवन की पीड़ा सहते-सहते कंकाल समान हो गया हो पर उसकी ममता कभी कमजोर नहीं होती। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, #नयनों से बहती निर बताती द्वार आए है प्रभु हमार, #Naynon Se Bahti Neer Batati Dwaar Aaye Hain Prabhu Hamara, Writer ✍️ #Halendra Prasad
#Naynon Se Bahti Neer Batati Dwaar Aaye Hain Prabhu Hamara.
Writer ✍️ #Halendra Prasad
BLOGGER=} 🙏♥️ #मेरी_हृदय_मेरी_माँ ♥️🙏
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पिघल रही स्नेह की दीपका मन मोम बना है सारा
नयनों से बहती निर बताती द्वार आए है प्रभु हमारा
बूंद बूंद नयनों से आज भी बहता दर्द पुराना
मुस्कानों के पीछे छुपी है अफसानों की वो खजाना
दुबली पतली रूखी सूखी ममता की मन ना रुक पाई
निशब्द अधर में भीगी पलकें कहतीं अपनी कहानी
चित्त का संताप छिपाए बैठी है एक विरहिणी दीवानी
हर दर्द की माप कौन मापेगा कौन आँसू अपनाएगा
सुनकर पैरों की आहट कंपित मन बाहर जब आई
सुनी आँखो में फिर से दर्द पुराना मुसकाई
नैनो से बहते निर सूखे तन कंकाल के
मानो कोई बोझ जीवन ले गया बयार के
दुबली पतली रूखी सूखी हड्डियों को ढांचा है
पीड़ा का दीप जलता आँसू मुस्काता है
दिखता ना कोई जैसे चारों ओर अंधेरा है
ममता की प्याली में माँ का सवेरा है
सुनकर पैरों की आहट कंपित मन बाहर जब आई
सुनी आँखो में फिर से दर्द पुराना मुसकाई
दुःख अपना कह ना पाते नीर गिरते जाता है
नैनो की बारिश में बदन भींगते जाता है
मन का व्यथा कभी हंसे कभी मुस्काए
कह नाही पावे दुःख को मन को मनावे
किसको सुनाए अपनी दिल की व्यथा को
कौन यहां आँसू बांटे कौन गाथा को
पड़ गया पीला तन मन मिट्टी में मिलेगा
टूटा हर सहारा अब दिलवो ना जुटेगा
सुनकर पैरों की आहट कंपित मन बाहर जब आई
सुनी आँखो में फिर से दर्द पुराना मुसकाई
मैं नहीं जानू मन के किस कोने में आशा है
जलता हुआ तारा का कैसा भरोसा है
पैरों की आवाज सुनकर जागा कोई सपना
सुने आंगन में फिर से गूंज आया अपना
यादों की तराना मुझे छोड़े ना उम्मीद को
हृदय बीच रहता है घायल किया दिल को
आंसुओं के दीपक से पूरा घर जगमगाया है
रोशनी पुकारती हैं ज्योति जल बुलाया है
सुनकर पैरों की आहट कंपित मन बाहर जब आई
सुनी आँखो में फिर से दर्द पुराना मुसकाई
बूंदी बूंदी नैनों से बहता दर्द पुराना
मुस्कानों के पीछे छुपी है अफसानों की खजाना
पिघल रही स्नेह की दीपका मोम बना है मन
कौन माप पाएगा जग में दिल की दर्द पुराना
कपोलों की राहों पे ये आँसू मोती बन जाते है
सूनेपन की आंगन में यादों की दीपक खिल जाते है
चन्दन जैसी शीतल राते फिर भी मन जलता
बिन बोले जो पीड़ा सहता वहीं हृदय में पलता
सुनकर पैरों की आहट कंपित मन बाहर जब आई
सुनी आँखो में फिर से दर्द पुराना मुसकाई
गीत=} #नयनों से बहती निर बताती द्वार आए है प्रभु हमारा
#Naynon Se Bahti Neer Batati Dwaar Aaye Hain Prabhu Hamara.
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