गीत की मुख्य भावना यही है कि परिवार अपने प्रिय सिद्धार्थ को पुनः अपने बीच देखना चाहता है। संसार को बुद्ध मिल गए, लेकिन परिवार को अपना सिद्धार्थ खोना पड़ा यही इस गीत की सबसे मार्मिक अनुभूति है। यह गीत भगवान बुद्ध के गृहत्याग के बाद उनके परिवार के हृदय में उत्पन्न हुए गहरे वियोग और दुःख को व्यक्त करता है। गीत में सिद्धार्थ की माता पत्नी यशोधरा पुत्र राहुल तथा परिवार के अन्य सदस्यों की भावनाएँ दिखाई गई हैं। परिवार के लिए सिद्धार्थ केवल एक राजकुमार नहीं बल्कि पुत्र पति पिता और उनके सुख का आधार थे। सिद्धार्थ के बुद्ध बनने से संसार को ज्ञान करुणा और शांति का मार्ग मिला लेकिन उनके परिवार ने अपना प्रिय सिद्धार्थ खो दिया। इसलिए गीत में बार-बार उनसे आग्रह किया गया है कि वे बुद्ध के रूप में नहीं बल्कि वही स्नेही सिद्धार्थ बनकर परिवार में लौट आएँ। यशोधरा अपने पति को राहुल अपने पिता को और माता-पिता अपने पुत्र को याद करते हुए अत्यंत दुःखी हैं। उन्हें धन-दौलत या राजपाट की कोई इच्छा नहीं है वे केवल अपने प्रिय सिद्धार्थ का प्रेम और पारिवारिक स्नेह वापस चाहते हैं। गीत में एक गहरा भावनात्मक द्वंद्व दिखाई देता है सिद्धार्थ का त्याग संसार के लिए कल्याणकारी था लेकिन उनके परिवार के लिए अत्यंत पीड़ादायक। इसी कारण गीत त्याग प्रेम वात्सल्य पारिवारिक मोह और मानव-कल्याण के बीच के संघर्ष को करुण स्वर में प्रस्तुत करता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, #जिससे मिलता था सारी दुनियां को सुखका अपार भगवान, #Jisase Milta Tha Sari Duniya Ko Sukhka Apar Bhagawan, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
#Jisase Milta Tha Sari Duniya Ko Sukhka Apar Bhagawan
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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मुझको लौटा दो मुझे मेरा वो सिद्धार्थ भगवन
जिससे मिलता था सारी दुनियां को सुखका अपार भगवान
मेरी करुणा को सुनलो भगवन मेरी दुखड़ा को सुनलो
यशोधरा की आँखो को देखलो प्रजापति को पढ़लो
करता हूँ मैं तुमसे विनती याचना और अनुरोध
सन्याशी बुद्ध नहीं मुझे लौटा दो मेरे राजकुमार
पूछ रहा है हृदय हमारा भाग्य नहीं है मेरा
निर्दयी मजाक किया नियति ने छोड़ गए परिवार
मुझको लौटा दो मुझे मेरा वो सिद्धार्थ भगवन
जिससे मिलता था सारी दुनियां को सुखका अपार भगवान
यशोधरा के प्राण वही थे राहुल के जीवन सहारा
छोड़कर चले गए है जब से अब दुख देखा ना जाता
सह ना पाता दुःख को देखकर पीड़ा अजीब की होती
दर्द उठे रह रहके जैसे जिन्दा ही जल जाता
अन धन दौलत कुछ ना मांगू मैं मांगू राजकुमार
कृपा वर्षा दो मुझपे भगवन देदो परिवार का प्यार
वहीं पुराने सिद्धार्थ लौटा दो पुत्र पिता का प्यार लौटा दो
पति पीता के रूप में माता का संसार लौटा दो
मुझको लौटा दो मुझे मेरा वो सिद्धार्थ भगवन
जिससे मिलता था सारी दुनियां को सुखका अपार भगवान
माता की आँखों की ज्योति थे पिता की अभिमान
शाक्य कुल के गर्व थे जीवन का स्वाभिमान
चारों ओर प्रकाश फैलाते दीपक जैसे जलते थे
अंधकार पड़ा है जीवन मेरा जब से घर से निकले थे
कैसे तुमको समझाऊं मैं कैसे तुमको दिखलाऊं
बेचैन किया उस यादों ने कैसे तुमको बतलाऊं
निंद नहीं मुझे आती है आँखो में आँख छाती है
धड़कन की वो धड़क बड़ी है आँसू आँख न जाती है
मुझको लौटा दो मुझे मेरा वो सिद्धार्थ भगवन
जिससे मिलता था सारी दुनियां को सुखका अपार भगवान
ज्योति और आनन्द थे भगवन विमाता की आँखों की
भर जाता सुख गर्व से आँचल देखकर अपनी गोद की
श्रेष्ठ सम्मानित कल्याणकारी नारी उनकी भार्या
छीन गया है सुख गौरव जब से सिद्धार्थ चला गया
अत्यन्त वियोग में दुःखी है देवी दुख से भरी पड़ी है
जीवन प्राण के याद में यशोधरा खड़ी हुई है
प्रेम करते थे सबसे सुन्दर और गुणवान थे
लोकप्रिय थे राजकुमार शाक्यों के जान थे
मुझको लौटा दो मुझे मेरा वो सिद्धार्थ भगवन
जिससे मिलता था सारी दुनियां को सुखका अपार भगवान
इस भाग्य ने ऐसा खेल रचाया गहरा शोक देकर
मन मंदिर का दीप बुझाया दुखों का आंधी देकर
ज्ञान प्राप्त बुद्ध नहीं मुझे स्नेही सिद्धार्थ को वापस लावों
प्रेममय कर्तव्यनिष्ठ परिवार को मुझे दिखाओ
लौटा दो सिद्धार्थ को मेरे मेरे प्राण को लेलो
पिता पुत्र माता को जोड़ो मेरी विनती सुनलों
मिट जाएगा शोक जीवन से बाप बेटे के आह में
खिल जाएगी खुशियां माँ की सहधर्मिणी के प्रेम में
मुझको लौटा दो मुझे मेरा वो सिद्धार्थ भगवन
जिससे मिलता था सारी दुनियां को सुखका अपार भगवान
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