इस गीत का मूल संदेश है कि मानवता प्रेम करुणा सत्य सेवा और सत्कर्म ही जीवन के वास्तविक मूल्य हैं। कवि ईश्वर से ऐसी सद्बुद्धि देने की प्रार्थना करता है जिससे संसार में शांति न्याय और भाईचारा स्थापित हो तथा हर मनुष्य सम्मानपूर्वक जीवन जी सके। गीत में कवि ने दीन-दुखियों श्रमिकों और शोषित लोगों के प्रति करुणा व्यक्त करते हुए ईश्वर से मानवता की रक्षा की प्रार्थना की है। कवि चाहता है कि संसार से अन्याय अत्याचार शोषण अहंकार लालच और क्रूरता का अंत हो तथा सत्य प्रेम दया शिक्षा और न्याय का प्रकाश फैले। धन और सत्ता का अहंकार क्षणिक है। धन-दौलत मनुष्य के साथ नहीं जाती इसलिए मनुष्य को अभिमान और स्वार्थ छोड़कर दीन-दुखियों की सेवा करनी चाहिए। सच्ची पूजा वही है जिसमें पीड़ित मानव के आँसू पोंछे जाएँ और जरूरतमंदों की सहायता की जाए। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,हे प्रभु दीनदयाला मानवता की रक्षा करो, #He Prabhu Dindayala Manwata Ki Raksha Karo, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
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Writer ✍️ #Halendra Prasad
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जिनके मद से रोती धरती उनका तुम अभिमान हरो
हे प्रभु दीनदयाला मानवता की रक्षा करो
दिन दुखी की सुनलों भगवन उसके दिल पुकार को
जीवन में उजियार भरो दो विद्या की भरमार को
खानों में जो आँसू बहते उसमें तुम मुस्कान भरो
अचल समुद्र की लहरों में डुबो को पहचान देदो
अंधियारा अन्याय मिटा दो सत्य का दीप जलाकर
हर श्रमिको फल दे दो आंगन तक पहुंचकर
जिनके मद से रोती धरती उनका तुम अभिमान हरो
हे प्रभु दीनदयाला मानवता की रक्षा करो
तेरी करुणा सबपे बरसे प्रेम बने संसार का धर्म
मानवता फिर हंसती गाती सत्कर्म बने जीवन का कर्म
जिनके सामने मानवता असहाय हुई है उनको धर्म बता दो
अहंकार क्रूर सत्ता के चूर को सबक सिखा दो
स्वार्थ लालच के कारण असहाय का शोषण करते है
कष्ट क्रूर निर्दयता से दुख दर्द को भरते हैं
धन दौलत के लालच में मानव जीवन का मूल्य नहीं
कठिन कार्य में प्राण गवाते शोषण और अत्याचार सही
जिनके मद से रोती धरती उनका तुम अभिमान हरो
हे प्रभु दीनदयाला मानवता की रक्षा करो
कुचल देते मानवता को लोग पैर तले दबाकर
सत्ता धन के मद में चूर लोग मार देते हकलाकर
कितना पीड़ा सहता है वो विवश होकरके रहता है
कुछ ना बोले रो लेता है तड़प तड़प कर जीता है
मानवता की धरती पर कितने शोषण होते है
दर्द में रोता बालक के साथ बूढ़ा भी रो देता है
जोखिमों से ये भरी है धरती जीवन बना संग्राम यहां
देख कलेजा रोती है माँ शोषणों की संग्राम में
सीता जैसे सह जाती है रावण के अभिमान में
जिनके मद से रोती धरती उनका तुम अभिमान हरो
हे प्रभु दीनदयाला मानवता की रक्षा करो
धन दौलत सब यहीं रहेगा साथ चलेगा नाम खाली
प्रभु स्मरण का ज्ञान देगा पड़ लो थोड़ा ध्यान सही
क्यों करता अभिमान रे मनवा धन दौलत के लालच में
ना जाता वो साथ में किसके रह जाता है धरती पे
दृढ़ मुट्ठी में जग को बांधे किस बात का तुझे घमंड
एक दिवस सब मिट्टी होंगे यहीं जग विधान
दिन दुखी की सेवा करले यही सच्ची पूजा है
रोते मन में बसे हरि यहीं संतो की दूजा है
जिनके मद से रोती धरती उनका तुम अभिमान हरो
हे प्रभु दीनदयाला मानवता की रक्षा करो
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#He Prabhu Dindayala Manwata Ki Raksha Karo
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