यह गीत जीवन के संघर्ष माँ की ममता और आशीर्वाद ईश्वर की कृपा प्रकृति-प्रेम स्वाभिमान और सपनों के प्रति दृढ़ संकल्प की भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। कवि कहता है कि जीवन की कठिन राहों में वह कई बार गिरा और अनेक परिस्थितियों से संघर्ष किया, लेकिन माँ के प्रेम, आशीर्वाद और संस्कारों ने उसे हर बार संभाला और आगे बढ़ने की शक्ति दी। कवि कठिनाइयों से निराश होकर रुकना नहीं चाहता बल्कि आशा का दीप जलाकर मेहनत साहस और स्वाभिमान के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहता है। माँ की सीख उसे अपने मार्ग से विचलित न होने की प्रेरणा देती है। अंत में वह अपनी मेहनत और संघर्ष को ईश्वर के चरणों में समर्पित करता है और प्रकृति को अपनी भावनाओं का संदेशवाहक बनाता है। गीत का मुख्य संदेश है कि जीवन में गिरना असफलता नहीं है। माँ का आशीर्वाद कर्म पर विश्वास मेहनत साहस और सकारात्मक सोच के बल पर मनुष्य हर कठिनाई को पार करके अपने सपनों और मंजिल को प्राप्त कर सकता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, #गिरकर सम्हल गया हूँ राहों में माता ने मुझे संभाल लिया, #Girkar Sambhal Gaya Hoon Raahon Mein Mata Ne Mujhe Sambhaal Liya, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
गीत=} #गिरकर सम्हल गया हूँ राहों में माता ने मुझे संभाल लिया
#Girkar Sambhal Gaya Hoon Raahon Mein Mata Ne Mujhe Sambhaal Liya
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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सपनों की राहों में मैं तो दीप जलाने चल दिया
गिरकर सम्हल गया हूँ राहों में माता ने मुझे संभाल लिया
माता ने मुझे संभाल लिया माता ने मुझे संभाल लिया
गिरकर सम्हल गया हूँ राहों में माता ने मुझे संभाल लिया
प्रेम प्रकृति देशभक्ति विरह जीवन संघर्ष देखा
यादों की स्मरण में कितने घर को जला देखा
बार बार वो लौट आती है यादों की समंदर
पार हो जाता माँ कृपसे जैसे लांघे हनुमान समंदर
सूरज चांद की गलियों में नदी झरनों की कलियों में
पथ पे चलते जाता हूँ पर्वत फूल की फलियों में
सपनों की राहों में मैं तो दीप जलाने चल दिया
गिरकर सम्हल गया हूँ राहों में माता ने मुझे संभाल लिया
नई सुबह की ओर चला हूँ उजियारों पे दौड़ चला हूँ
आंखों में स्वाभिमान सजाकर पापों को मैं छोड़ चला हूँ
कांटे कितने आयेंगे राहों में कांट बिछायेंगे
मन कहता है रुकना ना पत्थर पे दूब जमाएंगे
वीर तुम बहादुर हो धीर तुम बहादुर हो
आँख में सजाकर सपना चलने वाला साधु हो
बादल गरज रहा है गढ़ गढ़ बिजली चमक रही है चम चम
मूसलाधार वर्षा है वर्षा वर्ष रहा है झम झम
सपनों की राहों में मैं तो दीप जलाने चल दिया
गिरकर सम्हल गया हूँ राहों में माता ने मुझे संभाल लिया
चलते चलते दिख रहा है आसमान है छोटा
पकड़ लूंगा मैं चांद को जल्दी सफर बहुत है छोटा
अपने पंखों से दुनियां सजाऊं खुशी ढूंढकर लाऊंगा
बांट दूंगा पूरे सृष्टि में दुख गम लेकर चल जाऊंगा
बहुत सुन्दर है सृष्टि सारी दृष्टि जिसने बदली
प्रेम प्रकृति की दुनियां जिसने जीवन समझी
वह गीत मुझे याद आती है जिसे माँ ने मुझे सुनाया था
विचलित ना हो पथ से अपने जब आँख भर मेरा आया था
सपनों की राहों में मैं तो दीप जलाने चल दिया
गिरकर सम्हल गया हूँ राहों में माता ने मुझे संभाल लिया
देख रहा मैं भाव में भगवन आसमान में छाया
घुंघराले काले बाल दिखे सुन्दर रूप की छाया
हृदय प्रेम की करुणा में ममता दिख रहा है
थोड़ा थोड़ा छाया दिखा है दिल में छा गया है
कह दिया हवा से हमने मेरी बात को ले जा
सागर नदियां झील समंदर उनको तू पहुंचा जा
मेहनत की मिट्टी की खुशबू आज तुझे मैं देता हूँ
कह देना भगवन से तुम हृदय बीच में रखता हूँ
सपनों की राहों में मैं तो दीप जलाने चल दिया
गिरकर सम्हल गया हूँ राहों में माता ने मुझे संभाल लिया
गीत=} #गिरकर सम्हल गया हूँ राहों में माता ने मुझे संभाल लिया
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