वीरानी अंत नहीं है प्रेम और प्रभु-स्मरण से जीवन में फिर नई हरियाली लाई जा सकती है। इस गीत का मूल संदेश है कि मनुष्य का हृदय चाहे कितना भी सूना और जीवन चाहे कितना भी बंजर क्यों न हो प्रेम करुणा भक्ति विश्वास और हौसले से उसमें फिर से जीवन की हरियाली और आशा के अंकुर उगाए जा सकते हैं। एक मार्मिक आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायक भक्ति गीत है। इसमें कवि ने ऊसर-बंजर भूमि के माध्यम से मानव जीवन और सूने हृदय की स्थिति को व्यक्त किया है। बाहरी रूप से महल और वैभव दिखाई देते हैं लेकिन भीतर प्रेम करुणा श्रद्धा और जीवन की हरियाली का अभाव दिखाई देता है। कवि जब सूने प्रांगण और पूजा की वेदी को देखता है तो उसे बीते हुए समय और पावन स्मृतियों की याद आती है। जहाँ कभी प्रभु के पावन चरणों से मंगल और भक्ति का वातावरण था वहीं अब वीरानी और उदासी दिखाई देती है। यह दृश्य मनुष्य को जीवन की नश्वरता और संसार की अनित्यता का बोध कराता है। क्योंकि अपने सूखे हुए हृदय को प्रेम और करुणा से फिर सींचना चाहिए। निराशा के बीच यदि आशा का छोटा-सा अंकुर भी दिखाई दे तो उसे विश्वास और कर्म से पोषित करना चाहिए। बुद्ध की दृष्टि के माध्यम से कवि यह समझाता है कि जो आया है उसे एक दिन जाना ही है इसलिए बीते हुए कल के दुःख में रुकने के बजाय नई आशा और नए सपनों के साथ आगे बढ़ना चाहिए। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, #दिखे उसर बंजर भूमि अंकुर बीज की निशानी ना दिखे, #Dikhe Usar Banjar Bhoomi, Ankur Beej Ki Nishani Na Dikhe, Writer ✍️ #Halendra Prasad
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Writer ✍️ #Halendra Prasad
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देखा महल बगल में जीवन की हरियाली ना दिखे
दिखे उसर बंजर भूमि अंकुर बीज की निशानी ना दिखे
उग आई थी थोड़ी दुबे सुने उस प्रांगण में
बीती यादों की छाया थी मौन खड़ा उस राहों में
इधर उधर बिखरी दुबे ध्यान से देखते प्रभु हमारे
दृष्टि टिका था प्रांगण में पूजा की वो बेदी थे प्यारे
जैसे कोई उसर बंजर खेत और खलिहान हो
जिसमें अंकुर निकल ना पाए वो कैसा बुद्धिमान हो
देखा महल बगल में जीवन की हरियाली ना दिखे
दिखे उसर बंजर भूमि अंकुर बीज की निशानी ना दिखे
बुध निहारे बार बार वेदी का सुना संसार
देखकर मनवा हर्षित ना है याद आए बीता काल
जैसे ऊसर खेत में कोई खोज रहा हरियाली को
हरित बाहर का बोध नहीं है सुखी मिट्टी धूल की
सुना निर्जन दिख रहा है दशा बना है बंजर
लगती है वीरानी वेदी कोई नहीं उसका कलंदर
अभाव घिरा हरियाली का चिंतन का अभाव खड़ा
प्रभु की दृष्टि पड़ी वेदी पर करुणा का चिंता घेरा
देखा महल बगल में जीवन की हरियाली ना दिखे
दिखे उसर बंजर भूमि अंकुर बीज की निशानी ना दिखे
हे मानव जीवन की धरती प्रेम से फिर सींच जरा
सूखे मन की आंगन में करूणा की तू दीप जला
विरल दुर्लभ अंकुर थे आशा के आंगन में
फिर भी उनमें जीवन था जीने की जहां में
टूटी हुई उस धरती में छिपा हुआ सम्पादन था
रचना क्रम की भावों में खिला हुआ उपमा था
दोनों गुण सामने खड़े सुन्दरता की छाया में
देख कर मनवा हर्षित हुआ आंखों की इस बादल में
देखा महल बगल में जीवन की हरियाली ना दिखे
दिखे उसर बंजर भूमि अंकुर बीज की निशानी ना दिखे
जहां कभी थे पावन चरण वहां वीरानी आई
मंगल की धरती पर आज उदासी छाई
फिर भी कहती बुद्ध की दृष्टी हर पल नई कहानी
जो आया उसे जाना है छोड़ यहां की पानी
चल पड़े हम नई राह में सपने लेकर आँख में
धूप मिले या छांव मिले सांसे रहे हौसला में
टूटे हुए कल को भुला आज कुछ बनाना है
छोटे छोटे कदमों से ही मंजिल पे पहुंच जाना है
देखा महल बगल में जीवन की हरियाली ना दिखे
दिखे उसर बंजर भूमि अंकुर बीज की निशानी ना दिखे
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