आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, जिसे खोजते रहे बाहर वह भीतर ही विराजमान था,Adhyatmik Darshanik Anmol Bhakti Rachna, Jise Khojte Rahe Bahar Woh Bheetar Hi Virajmaan Tha
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, जिसे खोजते रहे बाहर वह भीतर ही विराजमान था, Adhyatmik Darshanik Anmol Bhakti Rachna, Jise Khojte Rahe Bahar Woh Bheetar Hi Virajmaan Tha
जिसे मनुष्य जीवन भर बाहर खोजता रहा वह कभी उससे अलग था ही नहीं। मनुष्य जीवन भर परम सत्य ईश्वर शांति और पूर्णता को बाहर खोजता रहता है मंदिरों तीर्थों पहाड़ों जंगलों और संसार की यात्राओं में। लेकिन वास्तविक सत्य कहीं बाहर नहीं बल्कि हमारे अपने भीतर और सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है। जब मनुष्य बाहरी मोह भ्रम और अहंकार से ऊपर उठकर अपने भीतर झाँकता है मन को शांत करता है और आत्मचिंतन करता है तब उसे उस सत्य का अनुभव होने लगता है जो सदैव उसके भीतर उपस्थित था। माँ प्रेम करुणा ममता शांति और परम शक्ति का स्वरूप हैं। माँ का स्मरण भी वास्तव में बाहर से भीतर की यात्रा है। जब मन शांत और निर्मल होता है तब माँ के प्रेम और ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव अपने ही अंतर्मन में होने लगता है। इसलिए सत्य को बाहर मत खोजो। अपने भीतर लौटो। वहीं आत्मज्ञान है वहीं ईश्वर हैं वहीं माँ का प्रेम है और वहीं सच्ची शांति, आनंद और मुक्ति है।
गहरी और शांत रात में आकाश के तारे आपस में मुस्कुराते हुए मानो कोई गहरी बातचीत कर रहे थे। उनकी धीमी हँसी में जैसे सृष्टि का कोई प्राचीन रहस्य छिपा था। वे कह रहे थे देवता हों या मनुष्य जो परम सत्य परम शांति और पूर्णता की खोज बाहर-बाहर कर रहे हैं उनकी यह खोज व्यर्थ है। जिसे वे दूर आकाशों मंदिरों तीर्थों और अनंत यात्राओं में ढूँढ़ रहे हैं वह तो पहले से ही हमारे साथ है।
परम सत्य किसी एक स्थान में सीमित नहीं है। वह संसार की प्रत्येक वस्तु में प्रत्येक जीव में प्रत्येक श्वास में और अस्तित्व के कण-कण में व्याप्त है। पूर्णता को पाने के लिए कहीं जाना नहीं है बल्कि उस सत्य को पहचानना है जो पहले से हमारे भीतर मौजूद है।
तारे फिर हँसे मानो कह रहे हों ईश्वर बाहर नहीं है।वह समूची सृष्टि में है और उसी सृष्टि के एक अंश के रूप में हमारे भीतर भी है जिस दिन मनुष्य बाहर खोजते-खोजते भीतर लौट आएगा उसी दिन उसकी खोज समाप्त हो जाएगी क्योंकि तब उसे पता चलेगा कि जिसे वह जीवन भर खोजता रहा, वह कभी उससे अलग था ही नहीं।
गहरी और शांत रात में आकाश के तारे आपस में हँसते हुए मानो बातचीत कर रहे हों। वे कहते हैं कि देवता या मनुष्य जो परम सत्य या पूर्णता की खोज बाहर-बाहर कर रहे हैं वह खोज व्यर्थ है। क्योंकि वह परम सत्य परम पूर्णता पहले से ही संसार की हर वस्तु और हर प्राणी में व्याप्त है। ईश्वर या पूर्णता कहीं बाहर नहीं बल्कि पूरे सृष्टि में और हमारे भीतर ही मौजूद है।
परम सत्य हर जगह मौजूद है। मनुष्य उसे बाहर खोजता फिरता है जबकि वह उसके अपने भीतर और प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है।
प्रकृति मानो इस सत्य को बिना शब्दों के जानती है। तारे अपनी मौन ज्योति में, नदियाँ अपने अनवरत प्रवाह में वृक्ष अपनी निःस्वार्थ छाया में और आकाश अपनी अनंतता में उसी सत्य की ओर संकेत करते प्रतीत होते हैं। शायद सत्य को पाने के लिए कहीं जाना नहीं है केवल भीतर लौटना है उस मौन को सुनना है जहाँ खोज समाप्त होती है और अनुभूति आरंभ होती है।
ईश्वर या पूर्ण सत्य की खोज बाहर करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह सम्पूर्ण जगत के कण-कण में और प्रत्येक जीव के भीतर पहले से ही विद्यमान है। मनुष्य उसे दूर खोजता है जबकि सत्य उसके अपने अस्तित्व में ही उपस्थित है। प्रकृति की प्रत्येक अभिव्यक्ति और जीवन की प्रत्येक धड़कन उसी परम सत्य की ओर संकेत करती है। आवश्यकता केवल उसे कहीं बाहर पाने की नहीं बल्कि अपने भीतर उसे पहचानने की है।
माँ केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि शांति प्रेम करुणा और परम शक्ति ईश्वर का प्रतीक है। माँ के स्नेह में हमें उस दिव्य शक्ति की अनुभूति होती है, जो बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करना सिखाती है। सच्चा सुख और ईश्वर की खोज बाहर करने की आवश्यकता नहीं है। वह हमारे अपने मन की शांति और आत्मा की गहराइयों में पहले से ही विद्यमान हैं। जब मन निर्मल होता है और भीतर प्रेम जागता है, तब हमें अनुभव होता है कि जिसे हम संसार में खोज रहे थे, वह सदैव हमारे भीतर ही था।
गहरी रातों की निस्तब्धता में जब मन संसार के शोर से दूर हो जाता है तब भीतर से एक पुकार उठती है मइया मुझको याद आती रे यह माँ केवल जन्म देने वाली माँ नहीं बल्कि वह आध्यात्मिक मातृशक्ति है जो प्रेम करुणा शांति और परम शक्ति का स्वरूप है।
जब मन की बेचैनी शांत होने लगती है जब अहंकार और बाहरी खोज थम जाती है तब माँ को कहीं बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं रहती। ऐसा लगता है मानो माँ स्वयं हमारे अंतर्मन के द्वार पर आकर खड़ी हो गई हों। सच्चे अर्थों में माँ का स्मरण बाहर से भीतर की यात्रा है जहाँ मन शांत होता है आत्मा प्रेम से भरती है और उसी मौन में माँ की उपस्थिति अनुभव होने लगती है।
जब मन शांत होता है विचारों का शोर थम जाता है और भीतर की बेचैनी मिटने लगती है तब हमें ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है। ईश्वर कहीं दूर नहीं हैं वे हमारे भीतर ही विद्यमान हैं। आवश्यकता उन्हें खोजने की नहीं बल्कि मन को इतना शांत करने की है कि हम उस मौन में उनकी उपस्थिति को अनुभव कर सकें।
आत्मा में ही सत्य है। जो कुछ हम खोजते हैं उसका मूल हमारे भीतर ही विद्यमान है। बाहर की दुनिया परिवर्तनशील है दृश्य नाम और रूप के रूप में दिखाई देने वाली एक माया जैसी प्रतीति। वास्तविक सत्य उस आंतरिक चेतना में है जो इन सभी अनुभवों की साक्षी है।
तारे आकाश और समस्त ब्रह्मांड केवल बाहरी दृश्य नहीं बल्कि ब्रह्मांड और चेतना के गहरे रहस्य के प्रतीक भी हैं। जिस सत्य को हम अनंत आकाश में खोजते हैं उसकी झलक हमारे अपने अंतर्मन में मिल सकती है। बाहर संसार दिखाई देता है पर सत्य का अनुभव भीतर होता है। आत्मा ही वह केंद्र है, जहाँ से अस्तित्व चेतना और सत्य को समझने की यात्रा आरंभ होती है।
जिसे हम बाहर ढूंढते हैं वो पहले से ही हमारे अंदर मौजूद है। इंसान की भूल लोग सच को ढूंढे गली गली लोग मंदिर पहाड़, जंगल हर जगह भगवान को खोजते हैं लेकिन उन्हें नहीं मिलता, क्योंकि वे अपने अंदर झाँकना भूल जाते हैं यह बहुत गहरा आध्यात्मिक संदेश है सत्य बाहर नहीं, आत्मज्ञान में है।
आत्मज्ञान और मुक्ति झाँककर देख अपने भीतर मन से कुछ पल बात कर तेरा मन ही तुझे बताएगा कौन-सा रास्ता सही है किस राह पर चलना है। अपने भीतर खोज।वहीं भगवान है।वहीं शांति है वहीं सच्चा ज्ञान है। जब इंसान मोह और भ्रम का त्याग करता है तब उसके भीतर सत्य का प्रकाश जागता है।
मोह छूटता है तो मन शांत होता है।भ्रम मिटता है तो ज्ञान प्रकट होता है। और जब मन सत्य को पहचान लेता है। तभी जीवन में सच्चा सुख शांति और मुक्ति का अनुभव होता है।
माँ प्रेम शांति और ईश्वर माँ प्रेम है। माँ ममता है माँ ही शांति और ईश्वर का स्वरूप है। भगवान को बाहर मत खोजो वह हमारे भीतर ही विराजमान हैं। ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से जब हम अपने भीतर उतरते हैं तभी सच्चे सुख का अनुभव होता है।
बाहरी दुनिया माया है जो हमें मोह और भ्रम में बाँधती है। असली सत्य हमारे भीतर है हमारी आत्मा में हमारे शांत मन में। जब मन की हलचल थम जाती है जब इच्छाएँ और मोह शांत हो जाते हैं, तब भीतर एक दिव्य प्रकाश दिखाई देता है। उसी शांति में हमें एहसास होता है कि माँ का प्रेम और भगवान की उपस्थिति हमसे कभी दूर थी ही नहीं।
अपने भीतर झाँको।मन को शांत करो सत्य को पहचानो वहीं माँ है वहीं भगवान हैं और वहीं सच्ची शांति और मुक्ति है।चाहें तो इसे मैं भक्ति-भाव वाली कविता प्रवचन शैली या सोशल मीडिया पोस्ट के रूप में भी बना सकता हूँ।
माँ को शांति प्रेम और ईश्वर के स्वरूप के रूप में माना गया है। जब मन शांत होता है तब मनुष्य के भीतर ईश्वर का अनुभव स्वयं होने लगता है। इंसान अक्सर बाहर की दुनिया में भगवान और सत्य को खोजता रहता है जबकि वास्तविक सत्य उसके अपने भीतर उसकी आत्मा में ही विद्यमान होता है।
बाहरी संसार केवल माया और भ्रम का स्वरूप है। सच्चा सुख और स्थायी शांति बाहरी वस्तुओं में नहीं बल्कि आत्मज्ञान में निहित है। जब मनुष्य अपने भीतर झाँकता है अपने मोह और भ्रम को त्यागता है और स्वयं को जानने का प्रयास करता है तब उसके भीतर छिपे ईश्वर का साक्षात्कार होने लगता है।
यही आत्मज्ञान जीवन का वास्तविक सत्य है। जब मन भीतर से निर्मल और शांत हो जाता है, तब ईश्वर कहीं बाहर नहीं बल्कि अपने ही अंतर्मन में अनुभव होता है। उसी क्षण जीवन में सच्ची शांति, आनंद और प्रेम का उदय होता है।
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