इस गीत में पुत्र-वियोग से व्याकुल एक वृद्ध पिता के हृदय की गहरी पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया गया है। पुत्र के गृह-त्याग के बाद राजमहल में सब कुछ होते हुए भी पिता का जीवन सूना और दुःखमय हो जाता है। वृद्धावस्था कमजोरी आँसू झुर्रियाँ और टूटते शरीर के माध्यम से कवि ने विरह की मानसिक और शारीरिक यातना को अभिव्यक्त किया है। राजा अपने राजधर्म और शासन को तो निभा सकता है लेकिन पुत्र-वियोग की पीड़ा उसे भीतर से तोड़ देती है। सिंहासन वैभव और सत्ता भी उसे सुख नहीं दे पाते। पुत्र की स्मृतियाँ बार-बार उसके हृदय में टीस पैदा करती हैं और वह अपने दुःख को किसी से कह भी नहीं पाता। गीत के अंतिम भाग में यह व्यक्तिगत पीड़ा पूरे शाक्य वंश और गणराज्य की चिंता बन जाती है। सभा में बैठे वृद्ध एवं अनुभवी विद्वान भी इस संकट से चिंतित दिखाई देते हैं। इस प्रकार यह गीत पुत्र के त्याग और माता-पिता के विरह राजधर्म और पितृधर्म तथा खुशी और दुःख के मार्मिक द्वंद्व को प्रस्तुत करता है। गीत का मूल संदेश है कि संतान के वियोग में संसार का धन पद सत्ता और वैभव भी माता-पिता के हृदय के खालीपन को नहीं भर सकते। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,आई खुशियों को लेकर गम बे सुमार दे गई, #Aai Khushiyo Ko Lekar Gum Be Sumar De Gai, Writer ✍️ #Halendra Prasad
#Aai Khushiyo Ko Lekar Gum Be Sumar De Gai
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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उदासी व्याकुलता ने जब शरण लिया शाक्य वंश गणराज्य में
पिता पुत्र को अलग किया विधि की विधान ने
बुढ़ापे में जर्जर वृद्धा अवस्था कमजोरी की तान पे
पुत्र वियोग में टूट गया बाप बेटा के स्वाभिमान में
बड़ी जोर जोर की गर्जन तड़पन एक बयार में आई
आई खुशियों को लेकर गम बे सुमार दे गई
दुःख चिन्ता चिन्तित करता राजा के रजवाड़ी में
वृद्धावस्था बोल रहा है कमजोरी की कहानी में
जर्जर तनमन जर्जर जीवन जर्जर बुढ़ापा आया
दुबला पतला तन हुआ आँख में पानी छाया
चेहरे में झुर्रियां छा गई चेहरे की रौनक खा गई
पड़ गया फीका रंग चेहरे का आँख में आँसू आ गई
बड़ी जोर जोर की गर्जन तड़पन एक बयार में आई
आई खुशियों को लेकर गम बे सुमार दे गई
विरह की ऐसी लरी छाई थी आँख से वोझल होता ना
बिछड़न का दुःख ऐसा था जो तड़प का दुख जाता ना
मात पिता सन्तान बिछड़ गए छोड़ गई वो जीवन
राज सिंहासन पर बैठा हूँ तड़प रही है आसन
मन जोर पीड़ा है ऐसी कह नहीं पाता
कौन सुने इस दुनियां अब रो नहीं पाता
घोर उदासी छाई है मन में घर बनाई है
टीस मारे मेरे दिल को ना जाने कौन विपत्ति आई है
बड़ी जोर जोर की गर्जन तड़पन एक बयार में आई
आई खुशियों को लेकर गम बे सुमार दे गई
व्याकुलता की घड़ियों में ये दुःख की घड़ी ना देखी जाती
अलग किया कुदरत ने मुझको आँख की आँसू गिर ना पाती
त्याग दिया है जिगर हमारा जो मेरा दुनियां था
पिता धर्म का कैसा खेल है जो अपना पराया था
शासना और प्रशासन को मैं कुशल चला पाता हूँ
पुत्र वियोग ने जीने ना दे कारण में रो जाता हूँ
व्यक्तित्व निराशा पड़ते जाते दुःख स्पष्ट दिखाई दे
कमल के जैसा सुन्दर चरण फिर भी ब्वॉय दिखाई दे
बड़ी जोर जोर की गर्जन तड़पन एक बयार में आई
आई खुशियों को लेकर गम बे सुमार दे गई
अत्यन्त उदासी छाई है तन से शक्ति भुलाई है
पुत्र विरह की याद ना जाती दर्द उड़कर आई है
पहले जैसा शक्ति ना है बोल नहीं मैं पाता
भटक जाती जिगर से डोल नहीं पाता
बैठ सिंहासन पर दुःख में डूब गया है जीवन।
दुःख चिन्ता से भीतर भरकर टूट गया है जीवन
हृदय को गहरी पीड़ा दिया है गृह त्याग की बातों ने
भर दिया है पुत्र विरह में आंखों के काजल में
बड़ी जोर जोर की गर्जन तड़पन एक बयार में आई
आई खुशियों को लेकर गम बे सुमार दे गई
अंतरा
ज्ञान वृद्ध है उम्र वृद्ध है बैठे सभा बीच विद्वान है
अर्धचंद्र में बैठी सभा है चिन्ता में संसार है
ऐसी चिंता आन पड़ी है जिसकी कभी कल्पना ना की जाए
शाक्य वंश की गणराज्य में ज्ञान आयु विद्वान
अनुभव में अनुभवी विद्वान सभा बीच बैठे हैं
गंभीर चिंता में डूबकर अपना सुध बुध खोए हैं
राजा राज्य पर ऐसी संकट आई गहन चिंता में डाली
वेद पुराण की गाथा भुलाई हृदय में आग लगाई
बड़ी जोर जोर की गर्जन तड़पन एक बयार में आई
आई खुशियों को लेकर गम बे सुमार दे गई
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