तेरे प्रेम की सच्चाई में मैं अपने को सजाया मईया,इस भक्ति-गीत में कवि ने माँ के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा निष्काम प्रेम और पूर्ण आत्मसमर्पण का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया है। कवि कहता है कि माँ की भक्ति में वह इतना लीन हो गया है कि उसे अपने अलग अस्तित्व का भी बोध नहीं रहता। उसका मन हृदय और आत्मा हर समय माँ के स्मरण में रमे रहते हैं। माँ के प्रेम ने कवि जीवन से अहंकार सांसारिक मोह इच्छाएँ भोग-विलास और आकर्षण का अंत कर दिया है। अब उसे हर स्थान और हर रूप में केवल माँ की ही दिव्य उपस्थिति दिखाई देती है। वह माँ को समस्त शक्तियों का मूल स्वरूप मानते हुए गंगा यमुना सरस्वती सीता गीता महाकाली तारा चंडी मुंडेश्वरी वैष्णवी और शारदा के रूप में नमन करता है। जहाँ वह माँ से प्रार्थना करता है कि वे कभी उसका साथ न छोड़ें क्योंकि उनका वियोग उसके लिए असहनीय है। अंततः यह गीत संदेश देता है कि सच्ची भक्ति मनुष्य को आत्मिक शांति वैराग्य प्रेम और परमात्मा से एकत्व का अनुभव कराती है। माँ का प्रेम ही जीवन का सबसे बड़ा आधार सबसे बड़ा सौभाग्य और सच्चा आध्यात्मिक श्रृंगार है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, तेरे प्रेम की सच्चाई में मैं अपने को सजाया मईया, #Tere Prem Ki Sachchai Men Mai Apne Ko Sajaya Maiya, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
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Writer ✍️ #Halendra Prasad
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कैसे देखूं मैं अपने को तेरी भक्ति में भुलाया मईया
तेरे प्रेम की सच्चाई में मैं अपने को सजाया मईया
हर समय तुझे याद करु मैं दिल में तुझे बसाया हूँ
आठों पहर की घड़ियां में माँ यादों में बुलाया हूँ
मन मेरा अब लिन रहता माँ तेरी प्रेम की यादों में
सारी दुनियां भूल जाता मैं रम जाता तेरी बातों में
कितनी गहरी प्रेम तेरी माँ स्वयं का ध्यान भुलाया मैं
डूब गया तल्लीनता में मैं तुझको खबर पेठाया मैं
कैसे देखूं मैं अपने को तेरी भक्ति में भुलाया मईया
तेरे प्रेम की सच्चाई में मैं अपने को सजाया मईया
मिट गया मेरा सब कुछ माता ना कोई अस्तित्व
दिल मेरा तुझमें ही रहता ना कोई अब चीज है
आत्मा की आँखों ने माता तेरी छवि बनाई है
बस गई है दिल के जैसा दिल को भी बताई है
सारे भोग विलास भूले सुख दुःख भूल गया है
आकर्षण प्रलोभन भुला कोशिश भूल गया है
ये मनवा अब डूब गया है तेरे प्रेम की आंचल में
तूही दिल की धड़कन मईया स्वरूप दिखे है बादल में
कैसे देखूं मैं अपने को तेरी भक्ति में भुलाया मईया
तेरे प्रेम की सच्चाई में मैं अपने को सजाया मईया
छोड़ ना जाना मुझको माता मैं तेरा खिलवना हूँ
तेरी वियोग की पीड़ा सह ना पाऊं मैं छोटा सा बालक हूँ
वियोग योग से कठिन है माता साधना आत्मसंयम है
गहरी पीड़ा सह ना पाऊं तेरे संग ही जीवन खिला है
जैसे योगी विरक्त हो जाता इस दुनियां से
कठिन तपस्या करने लगता खुशियां पाता तुझसे
तेरे प्रेम में दिल मेरा भूल गया सारी दुनियां को
बिछड़न का दुःख दुनियां से ना याद करता है तुझको
कैसे देखूं मैं अपने को तेरी भक्ति में भुलाया मईया
तेरे प्रेम की सच्चाई में मैं अपने को सजाया मईया
मिट गई सारी ईच्छा मईया ना कोई चाहत है
तेरे साथ में जीने का तेरे से ही राहत है
ममता की सागर है तू माँ तूही सृष्टि विधाता
सारी ईच्छा तुझमें है माँ तुहि प्रेम की दाता
तूही गंगा तूही यमुना तुहि है सरस्वती
तूही सीता तूही गीता तूही है महाकाली
तारा चंडी माँ मुंडेश्वरी तूही वैष्णव भवानी
मैहर वाली शारदा मईया आल्हा ऊदल की माई
बिछड़न का दुःख दुनियां से ना याद करता है तुझको
कैसे देखूं मैं अपने को तेरी भक्ति में भुलाया मईया
तेरे प्रेम की सच्चाई में मैं अपने को सजाया मईया
गीत=} #तेरे प्रेम की सच्चाई में मैं अपने को सजाया मईया
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