इस गीत का मुख्य संदेश यह है कि श्रम ही जीवन का आधार है और ईमानदार कर्म ही मनुष्य की सच्ची पहचान है। शारीरिक हो या बौद्धिक हर प्रकार का श्रम सम्माननीय है। इसलिए मनुष्य को अपने श्रम पर गर्व करना चाहिए और प्रत्येक श्रमिक की गरिमा को स्वीकार करना चाहिए। इस गीत में मैंने श्रम की गरिमा, कर्म की महत्ता और श्रमिक के आत्मसम्मान को प्रमुखता से व्यक्त किया है। मैं अपनी माता से प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझे जीवनभर ईमानदारी और निष्ठा से श्रम करने वाला मनुष्य बनाए रखें। मेरे लिए श्रमिक होना कोई हीनता नहीं, बल्कि गर्व और सम्मान की बात है। संघर्ष और संकट मनुष्य को कर्म का महत्व सिखाते हैं। किसान दिन-रात मेहनत करके धरती को सींचता है और समाज के लिए अन्न पैदा करता है, फिर भी उसे कई बार अपने श्रम का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इसी प्रकार मजदूर अपनी कुदाल से, लेखक अपनी कलम से और शिक्षक अपने ज्ञान से समाज के निर्माण और विकास में योगदान देते हैं। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कर्म और साधन के माध्यम से समाज की उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गीत में धन-दौलत और सत्ता के कारण उत्पन्न सामाजिक असमानता की ओर भी संकेत किया गया है। साथ ही, यह संदेश दिया गया है कि श्रमिकों को उचित सम्मान तथा उनके परिश्रम का उचित मूल्य मिलना चाहिए। विशेष रूप से किसान को ‘धरती पुत्र’ और ‘अन्नदाता’ के रूप में सम्मान दिया जाना चाहिए। अतः यह गीत हमें सिखाता है कि ईमानदार श्रम कभी छोटा नहीं होता। मनुष्य की वास्तविक महानता उसके धन या पद में नहीं, बल्कि उसके कर्म, परिश्रम और आत्मसम्मान में होती है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,मेरी मईया मुझे बना दे मैं श्रमिक ही रहु, #Meri Miya Mujhe Bana De Mai Srmik Hi Rahu,
गीत=} #मेरी मईया मुझे बना दे मैं श्रमिक ही रहु
#Meri Miya Mujhe Bana De मैं Srmik Hi Rahu
Writer ✍️ #Halendra Prasad
BLOGGER=} 🙏♥️ #मेरी_हृदय_मेरी_माँ ♥️🙏
🙏❤️ #Meri_Hriday_Meri_Maa❤️🙏
करु क्या मैं इस जग में अब श्रम ही करु
मेरी मईया मुझे बना दे मैं श्रमिक ही रहु
संघर्ष करम की गरिमा माता संकट ने बनाया
पहचान दिया है कर्मों से कर्मों को ज्ञान बताया
श्रम मेरा शारीरिक ना है ना है दैहिक देह
बौद्धिक है मेरे श्रम की बातें लिखता है सन्देश
कलम हमारी अस्त्र शस्त्र है श्रम बड़ा प्रधान
ना मिलता है उचित मूल्य फिर भी श्रमिक ही मेरा प्यार
करु क्या मैं इस जग में अब श्रम ही करु
मेरी मईया मुझे बना दे मैं श्रमिक ही रहु
जैसे किसान तपता है रातों दिन में जलकर
हल कुदाल को कलम बनाया धरती की पन्ना सींचकर
देता ना कोई उचित मूल्य पेट जिसका है भरता
तपकर पीड़ा सुख जाती है फिर भी पीछे ना हटता
पीड़ा के साथ आत्मगौरव की घोषणा को दर्शाता है
संघर्ष करता है देख हालत को सृजन संकल्प दिखाता है
बपूंजीपति मालिक है मालिक है सारी पद
सत्ता का चकाचौंध मालिक है मालिक है धन दौलत
करु क्या मैं इस जग में अब श्रम ही करु
मेरी मईया मुझे बना दे मैं श्रमिक ही रहु
धन दौलत से निर्भर इतना की आदेश सबका है मानना
काम करना आदेश मुझको आदेश जीवन पालना
जैसे खेतिहर को हल की जरूरत होती
वैसे मज़दूरों को कुदाल जीविका होती
जैसे लेखक का श्रम कलम है होता
वैसे रोजी रोटी का का सबका कर्म होता
ज्ञान सृजन करता है गुरुवर रातों दिन पढ़ा कर
सम्मान सुरक्षा मिलती ना समय के मेहनत को बतलाकर
करु क्या मैं इस जग में अब श्रम ही करु
मेरी मईया मुझे बना दे मैं श्रमिक ही रहु
सोच रहा है आत्मा मेरी बोल रहा है दिल
लब डब लब डब करता है धड़कन की तस्तुर
श्रम करनेवाला मजदूर है किसान है
काम करता खेत में जो क्या धरती पुत्र बनाम है
करता जो जमीन पर किसानी काश्तकार कहलाता
अन्न दाता अनाज देता है खेतिहर है कहलाता
श्रम की गरिमा पहचान हमारी श्रमिक कहलाते हैं
पानी पीकर कर्म करते है तनिक नहीं झुंझलाते है
करु क्या मैं इस जग में अब श्रम ही करु
मेरी मईया मुझे बना दे मैं श्रमिक ही रहु
गीत=} #मेरी मईया मुझे बना दे मैं श्रमिक ही रहु
#Meri Miya Mujhe Bana De मैं Srmik Hi Rahu
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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