यह रचना गुरु के प्रति श्रद्धा, अपनी सीमाओं की विनम्र स्वीकृति तथा सांसारिक दायित्वों के साथ आत्मचिंतन और जीवन-मूल्यों को अपनाने का सुंदर संदेश देती है। रचनाकार ने गुरु की विराट महिमा के सामने अपने सीमित सामर्थ्य को अत्यंत विनम्रता से स्वीकार किया है। वह स्वयं को गुरु की विशाल दुनिया का एक छोटा-सा परिंदा मानते हुए स्वीकार करता है कि गुरु के व्यक्तित्व, गौरव, यश और महत्ता का पूर्ण वर्णन हमारी बुद्धि, वाणी और लेखनी के लिए संभव नहीं है। रचना में गुरु के सम्मान और कीर्ति की तुलना हिमालय की ऊँचाई तथा अथाह सागर की विशालता से की गई है। इसके साथ ही सामान्य मनुष्य के जीवन की व्यावहारिक कठिनाइयों का भी मार्मिक चित्रण मिलता है। रोटी-रोजगार, परिवार, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की चिंताओं में मनुष्य अपना अधिकांश समय व्यतीत कर देता है। आजीविका और पारिवारिक दायित्व जीवन के आवश्यक अंग हैं किंतु केवल धन कमाना ही जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं होना चाहिए। रचना का मुख्य संदेश यही है कि गृहस्थ जीवन के दायित्वों को पूरी निष्ठा से निभाते हुए मनुष्य को आत्मचिंतन ज्ञान और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने के लिए भी समय निकालना चाहिए। गुरु का मार्गदर्शन मनुष्य को सांसारिक जिम्मेदारियों के साथ जीवन के गहरे मूल्यों को समझने आत्मबोध प्राप्त करने और अपने जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार यह रचना गुरु-भक्ति के साथ संतुलित सार्थक और मूल्यपरक जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करती है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,मेरी बुद्धि बाणी लेखनी ना सक्षम हो पाती, #Meri Buddhi Vani Lekhani Na Saksham Ho Pati, Writer ✍️ #Halendra Prasad
#Meri Buddhi Vani Lekhani Na Saksham Ho Pati
Writer ✍️ #Halendra Prasad
BLOGGER=} 🙏♥️ #मेरी_हृदय_मेरी_माँ ♥️🙏
मैं छोटा परिंदा तेरी दुनियां का मेरा छोटा दायरा
मेरी बुद्धि बाणी लेखनी ना सक्षम हो पाती
कैसे तेरे गुणों का मैं चित्रण करु कैसे यश बताऊं
देख रहा व्यक्तित्व को मैंने कैसे उसे दिखाऊं
हे गुरुवर तेरी कीर्ति ऐसी व्यक्तित्व असीम मुझे दिखती
तेरे गौरव का वर्णन जो सारी दुनियां में फैली
सम्मान तेरी हिमालय जैसा सर्वोच्च समान ऊंचाई है
महत्ता है विशाल दुनियां में अन्नत तेरी परछाई है
मैं छोटा परिंदा तेरी दुनियां का मेरा छोटा दायरा
मेरी बुद्धि बाणी लेखनी ना सक्षम हो पाती
पर्वत के शिखर पर लहरे तेरी ध्वज पताका
गरिमा श्रेष्ठ महान है गुरुवर सर्वोच्च प्रतिष्ठा
यश का सागर असीम अथाह है कीर्ति जग में फैली
अग़ जग चारों धरती पर बिखर पड़ी है रैली
कोई अंत तुम्हारी ना अनन्त धारा है बहते
हिमगिरि के ऊपर जैसे हिम है फैले
मेरा व्यक्तित्व बड़ी छोटा है गुरुवर पहुंच नहीं पाता
सीमित क्षमता है इस जग में सिमट कर ही रह जाता
मैं छोटा परिंदा तेरी दुनियां का मेरा छोटा दायरा
मेरी बुद्धि बाणी लेखनी ना सक्षम हो पाती
जीवन की मूलभूत जरूरत मुझको समय ना देती
आटा दाल नमक और लकड़ी तुझमें जाने ना देती
रोजी रोटी के चक्कर में उलझा मेरा प्राण है
भरण पोषण की व्यवस्था में उलझा मेरा संसार है
आजीविका से बचती समय तो देख भाल में खत्म होती
शिक्षा स्वास्थ्य भविष्य की चिन्ता घेर आती
जिम्मेदारियों का बोझ है ऐसा जैसे बादल गरजे
गृहस्थ जीवन जीविका में ये मनवा है तरसे
मैं छोटा परिंदा तेरी दुनियां का मेरा छोटा दायरा
मेरी बुद्धि बाणी लेखनी ना सक्षम हो पाती
हे गुरुवर इस दुनियां इन्सान बड़ा है तरसे
पूरा जीवन बीता देता है रोटी कमाने में
जीवन का वो मूल्य ना समझे जीवन का उद्देश्य है क्या
निकाल देता है पूरा समय वो कार्यभार है प्या
आजीविका का महत्व सर्वोपरि सबसे ऊंचा दायित्व
चाहत में चाहे व्यक्ति तो निकाल लेता है वक्त
दायित्वों के साथ साथ आत्मचिंतन बड़ी जरूरी
ज्ञान सांसारिक मूल्यों को जानना बड़ी जरूरी
मैं छोटा परिंदा तेरी दुनियां का मेरा छोटा दायरा
मेरी बुद्धि बाणी लेखनी ना सक्षम हो पाती
गीत=} #मेरी बुद्धि बाणी लेखनी ना सक्षम हो पाती
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