यह गीत लंबे समय तक रहने वाले बंधन विपरीत परिस्थितियों बीमारी अकेलेपन और मानसिक कष्ट से मनुष्य के शरीर और मन पर पड़ने वाले प्रभाव को व्यक्त करता है। निरंतर बंधन के कारण धीरे-धीरे व्यक्ति की शारीरिक शक्ति उत्साह आत्मविश्वास साहस कार्यक्षमता और संघर्ष करने की भावना कमजोर होने लगती है।कवि बताते हैं कि जो मनुष्य कभी कठिन परिस्थितियों का दृढ़ता से सामना करता था और दूसरों को प्रेरणा देता था वह भी लंबे समय के कष्ट और बंधन से थककर अपना मनोबल खो सकता है। स्वतंत्रता के अभाव में व्यक्ति अपने व्यक्तित्व और आत्मविश्वास को भी खोने लगता है। यह गीत हमें बताता है कि मनुष्य को स्वस्थ शरीर के साथ-साथ स्वतंत्रता प्रेम सम्मान आशा उत्साह और मानसिक सहारा भी आवश्यक है। निरंतर बंधन मनुष्य को भीतर से तोड़ सकता है इसलिए टूटते हुए मनुष्य को दमन नहीं बल्कि सहानुभूति और संबल देना चाहिए। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,क्षीण हो गई है भावना और कर्मठ का जोर भगवन, #Kshin Ho Gai Hai Bhawana Aur karmath Ka Jor Bhgavan, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
#Kshin Ho Gai Hai Bhawana Aur karmath Ka Jor Bhgavan
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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करता धीरे धीरे मनोबल को अब कमजोर बन्धन
क्षीण हो गई है भावना और कर्मठ का जोर भगवन
दुर्बल कमजोरी ने बीमारी में डाला
शक्ति में गिरावट आई बल को भी मारा
जैसे भूखे रहने पर आवाज क्षीण हो जाती है
बुढ़ापे के जैसा तन को मन में दिखाती है
कार्यकुशलता और परिश्रम को जलाया
धीरे धीरे भाव को मारा आत्मा झुलसाया
लगन और संघर्ष की भावना क्षीण हो कर टूटी
दमन और बन्धन की ठोकर आत्मा को तोड़ी
करता धीरे धीरे मनोबल को अब कमजोर बन्धन
क्षीण हो गई है भावना और कर्मठ का जोर भगवन
परिस्थितियों की प्रभाव ने साहस को तोड़ा
छीन लिया उत्साह को समाप्त कर छोड़ा
जैसे कारावास में मानव टूट जाता हैं
अपने व्यक्तित्व को खोकर पागल बन जाता है
मानव मन की भावना को गहराइयों देखो
महसूस करो क्षमता भावुकता को देखो
स्वतंत्रता की महत्व को मार दिया बन्धन
मन के विचारों को जार दिया बन्धन
आत्मविश्वास और उत्साह नष्ट हुए
आशा साहस को प्रभावित किए
करता धीरे धीरे मनोबल को अब कमजोर बन्धन
क्षीण हो गई है भावना और कर्मठ का जोर भगवन
मन को थकाया है निरन्तर बन्धन की बांध ने
डाह दिया अकेलापन कष्टों की मार ने
पहले जैसा ऊर्जा ना है ना है कर्मों की चाहत
थक गया तन मन शान्त हुआ डांगर
अटल संकल्प मन का टूट कर चूर हुआ
साहस को थका कर पराजित किया
साक्षात् रूपों में उपस्थित विध्वंस था
जार दिया दुखों ने पागल किया
लंबे समय का बन्धन कारावास होता
कैद जैसा जीवन उदास होता
करता धीरे धीरे मनोबल को अब कमजोर बन्धन
क्षीण हो गई है भावना और कर्मठ का जोर भगवन
अडिग निश्चय पर जो अजेय था साहस पर
दूसरों को प्रेरणा देता जीवन का स्रोत बनकर
ऐसे मानव को भी मार दिया बन्धन
कठिन से कठिन हालातों में विचलित ना होता ददन
चुनौतीयों का साहस पूर्ण जो सामना किया था
कार्य और व्यवहार से जों अपने को सिद्ध किया था
असंभव हुआ अब दृढ़ निश्चय और साहस
हार कर वो बैठ गया मार दिया बन्धन
साहस को दबाया उसके जैसे कारावास में पड़ा हो
बुद्धि बल क्षीण हुए जैसे आग में जला हो
करता धीरे धीरे मनोबल को अब कमजोर बन्धन
क्षीण हो गई है भावना और कर्मठ का जोर भगवन
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