यह गीत मनुष्य की उस यात्रा का वर्णन है जिसमें वह बाहरी संसार में स्वर्ग और सत्य खोजते-खोजते अंततः अपने ही मन के भीतर उसकी झलक पाता है। इस गीत में कल्पना और यथार्थ के संबंध को प्रस्तुत किया गया है। कवि कालिदास के मेघदूत जैसी सुंदर कल्पनाओं स्वर्ग जैसी नगरी और प्रकृति के अद्भुत रूप को खोजता है लेकिन उसे वह सुंदर संसार वास्तविक रूप में कहीं दिखाई नहीं देता। खोजते-खोजते उसे जीवन के कठोर सत्य सर्दी तूफान बादल बिजली और संघर्ष का अनुभव होता है। धीरे-धीरे कवि समझता है कि मनुष्य की कल्पना और उसका अनुभव दोनों मिलकर संसार को अर्थ देते हैं। राम लक्ष्मण कृष्ण अर्जुन गंगा यमुना और सरस्वती जैसे चित्र केवल कल्पना नहीं बल्कि मानव चेतना और संस्कृति में जीवित अनुभव हैं। कल्पना और सत्य में क्या अंतर है? रचना का संदेश है कि सुंदरता और सत्य को केवल बाहर खोजने के बजाय अपने हृदय और अनुभव के भीतर भी पहचानना चाहिए। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,#केवल कल्पना की नगरी है कवि के जैसा, #Keval Klpana Ki Nagari Hai Kavi Ke Jaisa, Writer ✍️ #Halendra Prasad
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Writer ✍️ #Halendra Prasad
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सुन्दर स्वर्ग जैसी नगरी का वो दिव्य कैसा
केवल कल्पना की नगरी है कवि के जैसा
सोच विचार सृजन है मनगढ़ंत भावना
मानसिक शक्ति की उलझन में उलझा है खेवना
धन देवता कुबेर की नगरी दिख नहीं मुझे पाती
महाकवि कालिदास की सृजन मन को है उलझाती
वर्णित दिव्य कलपना मुझको दिख नहीं पाता
मेघदूत की सुन्दर रचना नजर नहीं है आता
इस दुनियां का पाता ना चलता सत्य कहा पर बैठा है
खोजत ख़ोजत थक गया हूँ ना जाने कहां छुपा है
अद्भुत मेघ की दर्शन खातिर घूम रहा चारों वोर
कब कैसे विलीन हुआ सोचें मन का जोर
सुन्दर स्वर्ग जैसी नगरी का वो दिव्य कैसा
केवल कल्पना की नगरी है कवि के जैसा
कहता है अब हृदय हमारा मनवा तुम ना भागो
रहने दो अब ढूंढो ना उसको तुम पहचानो
सब कवि कल्पना थी जो तुझको भरमाया
उलझा दिया उलझन में तुमको ना बताया
देखा है मैं इस जीवन में कठोर समय आते है
पानी पत्थर आग लगाकर कैसे जीवन जलाते है
सर्दी में सर्दी है इतना तन मन ठिठुर जाता
जैसे कैलाश पर्वत पर बर्फ बहादुर बनता
काले काले बादल जब तेज हवा को लाते है
गरज गरज कर टकराते है चिंगारी बरसाते है
आँखों से देखा है मैने आधी और तूफान को
तड़क तड़क कर बिजुरी देखा आसमान की प्यार को
सुन्दर स्वर्ग जैसी नगरी का वो दिव्य कैसा
केवल कल्पना की नगरी है कवि के जैसा
हे गुरुवर गुरदेव बतादो दुनियां की कहानी
कौन कलपना सुन्दर है कौन अनुभव है ज्ञानी
कुदरत का वो रूप सत्य है जितना कवि कल्पना
अद्भुत सुन्दर रोमांचकारी भव्य इसकी पूजा
कोई कलपना करता है तो कोई अनुभव से बोले
कवियों की काव्य गाथा आसमान भी दिखे
राम दिखे लक्ष्मण दिखे दिखे कृष्ण अर्जुन
कही युद्ध की कौशल दिया दिखे कही प्रेम तीर
गंगा यमुना सरस्वती का निर्मल निर का प्रेम
धरती माँ को ध्यान करु तो बहने लगे मुझे लोर
इस सृष्टि में क्या नहीं है उसको ढूंढे मन मेरा
ढूंढत ढूंढत भटक जाता है दिखता है उसे भ्रम यहां
सुन्दर स्वर्ग जैसी नगरी का वो दिव्य कैसा
केवल कल्पना की नगरी है कवि के जैसा
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