मनुष्य को मनुष्य का दर्द समझना चाहिए और भेदभाव मिटाकर प्रेम करुणा तथा समानता के साथ जीवन जीना चाहिए। गीत में कवि ने जीवन के संघर्ष गरीबी विवशता और आत्मसम्मान की पीड़ा को व्यक्त किया है। वह समाज में व्याप्त अमीरी-गरीबी भेदभाव उपेक्षा और असमानता से दुखी होकर भगवान से प्रश्न करता है। गीत मनुष्य को प्रेम करुणा समानता और मानवता अपनाने का संदेश देता है। यह केवल ईश्वर से शिकायत नहीं बल्कि सोई हुई मानवता को जगाने वाली एक मार्मिक पुकार है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,काहे को तुझको मैं बताऊं तू क्यों सोया भगवन, #Kahe Ko Tujhako Mai Batanu Too Kyo Soya Bhagawan, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
#Kahe Ko Tujhako Mai Batanu Too Kyo Soya Bhagawan
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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मानव होकर भी मैं मानव के चरणों में बड़ी रोया भगवन
काहे को तुझको मैं बताऊं तू क्यों सोया भगवन
जीवन में संघर्ष दिया तू आत्मसम्मान पीड़ा
व्यक्त करु मैं कैसे तेरे पास तूही ने सब दिया
वंचित रखा मुझको तू मेरे जीवन को भटकाकर
व्यथा सुनाऊं कैसे तुझको दिल में आग लगा कर
निर्भर रखा दूसरों पर मुझे कठिनाइयों को सौप कर
झेलता जीवन काट रहा मैं आँख में पानी डालकर
मानव होकर भी मैं मानव के चरणों में बड़ी रोया भगवन
काहे को तुझको मैं बताऊं तू क्यों सोया भगवन
मैं भी एक मानव हूँ पर हालात मेरी ना पूछो
दिन हीन होकर पीड़ा सुनाया वो रात मेरी ना पूछो
सहयोग करुणा की याचना करता सबके पास में जाकर
टूट जाता था दिल मेरा अपनी व्यथा सुनाकर
चोट लगती थी आत्मसम्मान को धीरे धीरे आत्मा में
गहरी गहरी दर्द देती थी सह ना पाता सदमा में
दिन कर्मों में बीत जाता था रात मुझे रुलाती थी
भटक रहा था उन जगहों पे जहां शासन लहराती थी
मानव होकर भी मैं मानव के चरणों में बड़ी रोया भगवन
काहे को तुझको मैं बताऊं तू क्यों सोया भगवन
इन रातों से पूछो तुम मैं सोता कैसे रजनी में
सारी रात गुजार देता मैं देख जीवन की डहरि में
बेघर जमाना मेरा था गरीबी कि उस चौंकठ पे
लाचार विवशता घेरी थी मुझे हाथ बांधकर डोरी से
कष्टदायक हालात मेरी थी चल नहीं मैं पाता था
पैरों की बेड़ियों में फंसकर मुँह बगल गिर जाता था
सभा बीच मैं रहता था पर उपेक्षित में जीता
अनदेखा की राहों मैं दिन टटोल कर चलता
मानव होकर भी मैं मानव के चरणों में बड़ी रोया भगवन
काहे को तुझको मैं बताऊं तू क्यों सोया भगवन
सामाजिक विषमता देखा तेरी इस मैं सृष्टि में
अधिकारों संसाधनों में मैं फर्क देखा है दृष्टि में
जीवन के स्तर पे देखा भेद भाव का अंतर
शिक्षा हो या अवसर हो तड़पें प्रेम समन्दर
अधिकारों की बोली ने प्रभु कितने घर को तोड़ा
आग लगाकर तन मन में दिल में जहर को घोला
ऊंच और नीच की बात पुरानी अबकी खेल निराली है
मानव लड़ता मानव से धन की रुप जुआरी
मानव होकर भी मैं मानव के चरणों में बड़ी रोया भगवन
काहे को तुझको मैं बताऊं तू क्यों सोया भगवन
कही अमीरी कहीं गरीबी कहीं पुरुष तो कहीं महिला
आसमान व्यवहार को देखा मैने जिधर जिधर मेरा नजर गया
शिक्षा शिक्षित और अशिक्षित सब में अंतर दिखता
धर्म समुदाय की धारणा में भेद भाव सब दिखता
तेरी इस सृष्टि में भगवन उदासीनता और कठोरता है
बेरुखी क्रूरता में लोग प्रेम पर जंग लड़ता है
निष्ठुरता निष्ठिर है दुनियां धन दौलत की चाहत में
हृदय पत्थर का बना लिए है देखा ना पाता सागर में
मानव होकर भी मैं मानव के चरणों में बड़ी रोया भगवन
काहे को तुझको मैं बताऊं तू क्यों सोया भगवन
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