आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, वैराग्य से ईश्वर तक अंतरात्मा का संवाद, Vairagya Se Ishwar Tak Antaratma Ka Samvad
जब मनुष्य संसार के स्वार्थ दुःख अकेलेपन और दिखावे से थक जाता है तब उसके भीतर वैराग्य जागृत होता है और वही उसे ईश्वर की खोज की ओर ले जाता है। एकांत आत्मचिंतन और भीतर उठते प्रश्न वास्तव में ईश्वर से संवाद का प्रारंभ हैं दुःख और अभाव के बीच भी श्रद्धा जीवित रहती है क्योंकि मनुष्य को अंततः ईश्वर और माँ की करुणा ही अंतिम सहारा प्रतीत होती है। संसार में पीड़ा अमानवीयता और स्वार्थ होने पर भी आशा समाप्त नहीं होती क्योंकि करुणा माँ का प्रेम और भक्ति मानवता को जीवित रखते हैं जब जीवन अधूरा और ईश्वर दूर महसूस होता है तब आत्मा अपने अस्तित्व से प्रश्न करती है मैं कौन हूँ? यही गहन पीड़ा वास्तव में आत्मजागरण और ईश्वर की सबसे तीव्र खोज बन जाती है।
जीवन क्षणभंगुर है, शरीर मिट्टी का है और साँसें उधार हैं; इसलिए मनुष्य को दुःख में भी भक्ति, आशा और आत्मचिंतन नहीं छोड़ना चाहिए। जब संसार से मन टूटता है, तब ईश्वर सबसे निकट होता है, और माँ की कृपा मनुष्य को सद्बुद्धि, शक्ति और आगे बढ़ने का संबल देती है।
इस दुनियां में जब दिल संसार के दिखावे से और मनुष्य के स्वार्थ से ऊब जाता है तो वह अपनी पुरानी आदतों आशा भरोसा लगाव से भी पराया हो जाता है और वैराग्य की दुनियां में ईश्वर की खोज में निकल जाता है!
जीवन में वैराग्य का प्रथम स्वर ही ईश्वर से संवाद है जब साधक एकांत में आत्म चिन्तन करता है और अपने मन आत्म द्वंद्वों के संग्राम में ईश्वर को साक्षी बनाकर ईश्वर से संवाद करता है जिसे रात का एकांत और आत्मचिंतन का प्रतीक कहा जाता है।
दुख में भी श्रद्धा जीवित रहता है मरता नहीं क्योंकि दिव्य माँ और भगवान ही अंतिम सहारा हैं मनुष्य जब दुःख पीड़ाओं से घिर जाता है तो मनुष्य की जीवित श्रद्धा कहता है कि मैं गरीब हूँ अकेला हूँ जीवन मशीन की तरह चल रहा है फिर भी मैं पूजा भक्ति और आस्था नहीं छोड़ता तेरा ही गुणगान करता हूँ!
जब प्रेम मजबूरी बन जाता है आँसू बाढ़ बन बन जाती हैं जिन्दगी अधूरी है साँसे भी अधूरी है जिसने जीवन दिया उसका साया भी महसूस नहीं होता तब यह जीवन प्रश्न करता है मालिक कौन है? जीवन खुद जीवन से पूछता है जैसे ईश्वर-वियोग और आस्था की परीक्षा हो रही होती है और यहीं गहन पीड़ा है यहीं जीवन की अपूर्णता है !
हे माँ यह कैसी क्षण की आवाज़ है अब मन भी अपने ही अस्तित्व से ही प्रश्न करता है प्रेम है पर पूर्णता नहीं जीवन है पर अनुभूति अधूरी है साँसें चल रही हैं पर भीतर उपस्थिति नहीं ईश्वर का विचार है पर उसका साया महसूस नहीं होता यह कौन सी अवस्था है जहाँ हम अपने सबसे सच्चे प्रश्नों से मिल रहे है ईश्वर-वियोग का अनुभव है या ईश्वर की सबसे तीव्र खोज है क्यों अँधेरे में ही प्रकाश की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
तेरी आशा भी अजीब सशक्त है भगवन समाज का यथार्थ यह है कि दुख सर्वत्र हैं फिर भी मनुष्य हँसना सीख गया है समाज में अंधापन रोग चोरी अमानवीयता फैली है फिर भी माँ की कृपा से माँ की अस्तित्व बची है दुख सर्वत्र हैं, यह सत्य है पर मनुष्य का मुस्कुराना भी उतना ही बड़ा सत्य है। शायद यही आशा की सबसे बड़ी विजय है।
जब आत्मा थककर बैठ जाती है तब प्रार्थनाएँ भी मौन हो जाती हैं और जब प्रार्थनाएँ मौन हो जाती हैं तब भीतर कहीं एक सूक्ष्म स्वर उठता है मैं कौन हूँ मैं अभी भी यहाँ हूँ शायद वही ईश्वर है जो अनुपस्थिति में भी उपस्थित रहता है प्रश्नों के माध्यम से अपने को अनुभूति कराता है।
दुख सर्वत्र हैं यह सत्य है पर मनुष्य का मुस्कुराना भी उतना ही बड़ा सत्य है। शायद यही आशा की सबसे बड़ी विजय है माँ को जिस रूप में देखा जाता है वह उसी रूप में विद्यमान रहती है वह केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि करुणा संरक्षण और अस्तित्व की अंतिम शरण जैसी प्रतीत होती है जब समाज में अंधापन अमानवीयता और स्वार्थ फैलते हैं तब भी कहीं न कहीं एक माँ अपने बच्चे को प्रेम सिखा रही होती है और वही संसार को पूरी तरह टूटने नहीं देता।
माँ कि आशा भी एक अद्भुत शक्ति है प्रभु, टूटे हुए मन में भी दीप जला देती है संसार में पीड़ा का अंधकार बहुत है फिर भी कोई माँ अपने आँचल में मानवता बचाए बैठी है चोरी क्रूरता और स्वार्थ के बीच यदि करुणा अब भी जीवित है तो वह किसी माँ की प्रार्थना का ही परिणाम है।
देने वाला जुआरी नहीं, कर्म का न्यायाधीश है कोई भी पूर्णतः अच्छा या बुरा तय नहीं कर सकता क्योंकि समय बदल रहा है और भ्रम फैल रहा है यह कर्म समय और माया का गहन चिंतन है यह शरीर मिट्टी का है, साँसें उधार हैं फिर भी मनुष्य उसकी परछाई को स्थायी समझ बैठता है यही जीवन का दर्शन है और यही जीवन का सत्य भी।
दुःख में भी भक्ति मत छोड़ो सुख में संसार साथ चलता है दुःख में केवल ईश्वर साथ रहता है संसार से मन टूटे तो माँ को याद करो क्योंकि टूटे हुए मन के सबसे पास वही खड़ी होती है जो इस तन मन का निर्माण करती है जीवन प्रश्न पूछे तो उत्तर अंतरात्मा देगी जब दिल बेगाना हो जाए, तब ईश्वर सबसे निकट होता है क्योंकि माँ सद्बुद्धि स्वास्थ्य और निरंतर सृजन का वर दे देती हैं!
मनुष्य संसार की कठोर वास्तविकताओं गरीबी अकेलापन दुःख सामाजिक विषमता और जीवन की अनिश्चितता से व्यथित होकर अपने मन की बात ईश्वर और माँ से इबादत के रूप में कहता है। संसार से विरक्त हो जाना आस्था के सहारे जीवन जीना और कर्म व समय के बदलते स्वरूप पर गहन चिंतन करना दुःखों के बीच भी माँ की भक्ति कर मुस्कान भरना आशा जीवन को आगे बढ़ाती है। और यह सिखाती है कि जीवन क्षणभंगुर है पर श्रद्धा विश्वास और आत्मचिंतन मनुष्य को संबल देते हैं।
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