इस गीत का सारांश यह है कि मनुष्य का चंचल मन जब काम क्रोध लोभ और मोह जैसे विकारों में फँस जाता है तब वह धीरे-धीरे ईश्वर भक्ति ज्ञान शांति और सत्य के मार्ग से दूर हो जाता है क्योंकि काम मन को भोग-विलास में उलझाकर भक्ति से दूर करता है क्रोध बुद्धि और विवेक को नष्ट कर देता है लोभ मनुष्य को लालच और असंतोष के बंधन में बाँध देता है तथा मोह साधना और ध्यान को भंग करके मन को माया में फँसा देता है।इस गीत में समझाया गया है कि ये चारों विकार मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। इनके कारण जीवन में दुःख अशांति और भ्रम उत्पन्न होता है। यदि मनुष्य इन पर नियंत्रण रखे और गुरु तथा ईश्वर की भक्ति में मन लगाए तभी सच्ची शांति ज्ञान और आत्मिक शक्ति प्राप्त हो सकती है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, #Dil Ko Bigaad Deta Hai Dheere Dheere Chanchal Man Viyog Guruji, Writer ✍️ #Halendra Prasad
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मन के दुश्मन है ये काम क्रोध मोह लोभ गुरुजी
दिल को बिगाड़ देता है धीरे धीरे चँचल मन वियोग गुरुजी
फंस जाता जब भोग में मनवा भूल जाता है ईश्वर को
भक्ति ना कर पाता वो तो बिखर जाता मौज मस्ती पर
सुखभोग की इच्छा अजब निराली मानकों भ्रम में डाले
नष्ट करे प्रभु भक्ति को दिल को मन में जारे
सुख सुविधा का भोग प्रचंड है मन को बदल देता है
तोड़ देता है दिल को देव से सुख को हर लेता है
मन के दुश्मन है ये काम क्रोध मोह लोभ गुरुजी
दिल को बिगाड़ देता है धीरे धीरे चँचल मन वियोग गुरुजी
क्रोध बिगाड़े ज्ञान को गुरुवर ढक देता है बुद्धि को
सही गलत का फर्क भुलाकर क्रोध दिखाता शक्ति को
मन का ज्ञान व्यर्थ में जाता भूल जाता जब सत्य को
निर्णय लेता गलत काम में फंसा देता है दिल को
गुस्सा रोष उग्र बनाता मानकों भी भरमाता है
काजल की डिबिया पर जाकर काजल फुसलाता है
धोखा खाता दर्द उठाता कहीं नहीं कुछ कहता
फांस लेता जब मनवा तो पोरे पोर लुढ़कता
मन के दुश्मन है ये काम क्रोध मोह लोभ गुरुजी
दिल को बिगाड़ देता है धीरे धीरे चँचल मन वियोग गुरुजी
लोभ लालच की दुनियां ऐसी बांध देती बन्धन में
इच्छा को प्रचंड बनाती जार देती है दीक्षा में
लालच है एक रोग बुरा दिल को दिल में जारे
चँचल मनवा रास्ता देकर दिल को दिल से निकाले
नष्ट करता है त्याग की भावना टिकने ना देता
त्याग गुण को नष्ट करता है आने ना देता
लोभ जलाता तन मन को जब जीवन बिखर जाती
आँख में आँसू भरता है ये जीवन संवर ना पाती
मन के दुश्मन है ये काम क्रोध मोह लोभ गुरुजी
दिल को बिगाड़ देता है धीरे धीरे चँचल मन वियोग गुरुजी
मोह की शक्ति मन को मारे दिल को भी उलझा कर
भंग करता है साधना को साधक को लड़खड़ा कर
नष्ट करती जब ध्यान को मोह बार बार आ जाती
रूप दिखाती माया का बार बार विचलाती
काम क्रोध मोह माया लोभ बन जाते है दुश्मन
बुद्धि गुण को नष्ट करके बन जाते है शक्ति
शांति ज्ञान ना भक्ति मिलती ना मिलती है शक्ति
टूट जाता है दिल जीवन में ना रहता कोई शक्ति
मन के दुश्मन है ये काम क्रोध मोह लोभ गुरुजी
दिल को बिगाड़ देता है धीरे धीरे चँचल मन वियोग गुरुजी
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