यह गीत माँ के प्रति गहन प्रेम भक्ति और आत्मिक अनुभूति का काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। कवि कहता है कि जब संसार की दृष्टि धुंधली हो जाती है और चारों ओर कुछ दिखाई नहीं देता तब भी उसे माँ का दिव्य रूप स्पष्ट दिखाई देता है। माँ उसकी चेतना हृदय और अंतर्मन में विराजमान हैं। रचना में रात तारे चाँद सागर नदी और बादल जैसे प्राकृतिक दृश्य आत्मिक जागरण के प्रतीक हैं। इन सबके माध्यम से कवि माँ के सान्निध्य में मिलने वाले आनंद परमानंद और संतोष को अनुभव करता है। यह आनंद सांसारिक नहीं बल्कि आत्मा को तृप्त करने वाला दिव्य सुख है।माँ के प्रेम से कवि का मन प्रसन्न संतुलित और जागृत हो जाता है। जीवन की लहरें दुख-सुख और उतार-चढ़ाव भी माँ की कृपा से सहज और मधुर लगने लगते हैं। अंततः कवि पूर्ण शरणागति भाव से स्वीकार करता है कि माँ के चरणों की धूल से उसकी चेतना जागृत हुई है और वही उसका सत्य शक्ति और प्रकाश हैं।यह गीत माँ के साथ आत्मा के पवित्र मिलन भक्ति समर्पण और आध्यात्मिक जागरण का सार प्रस्तुत करता है। भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, ये रातों को भी मैं तेरी अलखों की गीत गाता हूँ, #Ye Raaton Ko Bhee Main Teree Alakhon Kee Geet Gaata Hoon, Writer ✍️ #Halendra Prasad
#Ye Raaton Ko Bhee Main Teree Alakhon Kee Geet Gaata Hoon
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BLOGGER=} 🙏♥️ #मेरी_हृदय_मेरी_माँ ♥️🙏
🙏❤️ #Meri_Hriday_Meri_Maa❤️
ये रातों को भी मैं तेरी अलखों की गीत गाता हूँ
दिखता कुछ ना जहां पे मैं वहां पे तेरी रूप देखता हूँ
मेरे अंदरूनी का आनन्द बड़ी गहरा है
हृदय में विराजे तू मन की ककहरा है
देखता हूँ मैं सारा जग मुस्कुराता है
पत्तों से लेकर अब तो नभ तक गुनगुनाता है
कैसा है मिलन ये मेरी कैसी तेरी लहरे
क्षण भर की खुशियों खिलता मेरी डहरि
ये रातों को भी मैं तेरी अलखों की गीत गाता हूँ
दिखता कुछ ना जहां पे मैं वहां पे तेरी रूप देखता हूँ
कुदरत की रातों में फ़िदरत समाई
तारों के बीच में चांद अजब मुस्कुराई
खुशियों का मुस्कान बिखरते थे आसमा में
बैठा अकेला मैं देखता था रास्ते में
कैसी खुशी थी कैसा उल्लास था
परमानन्द के हर्ष में ये कैसा आमोद था
सुखद अनुभूति थी गहरी प्रशांत
खुशियों की सागर में खुशी था आकांक्षा
ये रातों को भी मैं तेरी अलखों की गीत गाता हूँ
दिखता कुछ ना जहां पे मैं वहां पे तेरी रूप देखता हूँ
उत्साहों से भरकर दिल भावना से बोला
प्रसन्न में आनन्द है आनन्द में दिल डोला
मोज मस्ती की राते तारों के साथ है
खुशियों की बारात में धरती भी पास है
कैसा संतुष्टि है संतुष्ट ना होता
मांगता जीवन भर ये दुखी ना होता
दिखता है मुझको ऐसा जैसे हँसी में चमकते है सागर
तारों से मिलकर बहकते है बादल
ये रातों को भी मैं तेरी अलखों की गीत गाता हूँ
दिखता कुछ ना जहां पे मैं वहां पे तेरी रूप देखता हूँ
मेरे अन्तर्मन में तेरी खुशियों की सागर छा रहा है
प्रेम की पवित्र अनुभव कुदरत से आ रहा है
झलकता है मोती जैसा हीरा सा चमकता
जहां जाती नजरे मेरी वहां वो जाता
तेरी शक्ति का मुझको धीरे धीर आभास हो रहा है
आन्नत आनन्द का उत्सव फूट रहा है
मन तृप्त होकर दिल से बोलने लगा
आंखों को बोलकर पलकों से कहने लगा
ये रातों को भी मैं तेरी अलखों की गीत गाता हूँ
दिखता कुछ ना जहां पे मैं वहां पे तेरी रूप देखता हूँ
प्रेम रस में भरकर दिल ये शब्दों से बंध ना पाता
कठिन है डगर इसकी अब बिछड़ ना पाता
बहती नदी के जैसा आसमा है दिखता
दो तटों की दिव्य नदिया गंगा सी है बहता
डूबता उभरता ये तरंगों की लहरे
बादलों की आहंटो से बरसता ये बारिशे
नभ की विशालता ने अनुभूति जगाई
तू मुझसे मिलने आई माँ रातों ने दिखाई
ये रातों को भी मैं तेरी अलखों की गीत गाता हूँ
दिखता कुछ ना जहां पे मैं वहां पे तेरी रूप देखता हूँ
चारों दिशाओं से जब खुशियां दौड़कर आई
बाढ़ सी बरशकर उमड़ कर भिंगाई
मन का स्वभाव भाव अजब मुस्कुराया
अंधेरी रातों में जुगुनू सा जगमगाया
सब जगह खुशियां थी हर्ष और उल्लास था
खेलता था खुलकर खेल जैसे कोई साथ था
मेरी चेतना का संगम जागृत हुआ था
तेरे चरणों की धूल से जागरूक हुआ था
ये रातों को भी मैं तेरी अलखों की गीत गाता हूँ
दिखता कुछ ना जहां पे मैं वहां पे तेरी रूप देखता हूँ
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