यह गीत एक विनम्र शिष्य की आत्मस्वीकृति और गुरु से मार्गदर्शन की प्रार्थना है। कवि स्वयं को जीवन-सागर में उतरा हुआ अज्ञान, अनुभवहीन और असहाय व्यक्ति मानता है, जिसके पास न ज्ञान है, न कौशल, न विवेक। वह स्वीकार करता है कि वह बार-बार असफल होता है और जीवन की उलझनों से डरता है। गुरु से वह निवेदन करता है कि उसे तराश कर योग्य बनाएँ, उसे हुनर, परिश्रम और कर्म का मार्ग सिखाएँ। कवि समाज के कर्मशील लोगों से प्रेरणा लेकर समझता है कि छोटे अवसर, निरंतर श्रम और कौशल से ही जीवन में सफलता और सम्मान प्राप्त होता है। यह गीत का केंद्रीय संदेश है यह है कि गुरु के मार्गदर्शन, भक्ति, परिश्रम और कौशल के माध्यम से ही जीवन-सागर पार किया जा सकता है। भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, उतरा जीवन के सागर में ना मैं केवट खेवना, #Utara Jeevan Ke Saagar Mein Na Main Kevat Khevana , Writer ✍️ #Halendra Prasad,
गीत =} #उतरा जीवन के सागर में ना मैं केवट खेवना
#Utara Jeevan Ke Saagar Mein Na Main Kevat Khevana
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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गुरवर देख मेरी ओर मैं हूँ अपढ़ अनाड़ी बावला
उतरा जीवन के सागर में ना मैं केवट खेवना
बुद्धि विवेक ना है एहसास ना तजुरबा
अनुभव के जाल में फंसा हूँ मैं केवड़ा
मुझमें कोई कला ना संयम ना प्रयास है
तेरी भक्ती में गुरुवर जीवन ये बिंदास है
कौशल ना महारत मुझमें नाही कोई हुनर
ज्ञान ना अध्ययन है मुझमें घूरता हूँ तेरी सूरत
गुरवर देख मेरी ओर मैं हूँ अपढ़ अनाड़ी बावला
उतरा जीवन के सागर में ना मैं केवट खेवना
बार बार डूबता हूँ मैं उभ चुभ करत हूँ
उलझकर जीवन में मैं जीवन से अब डरता हूँ
कारीगर बनादे मुझको काम तू सिखा दे
छेनी हथौड़ी से मुझे छांट काटकर मिला दे
देखता हूँ मैं जब दुनियां जहां में
रत्न ढूंढ लालते लोग समन्दर नहाके
मेरी क्षमता को तू हुनर और कला दे
कलम देदे हाथों में कौशल की फिजाओं में
गुरवर देख मेरी ओर मैं हूँ अपढ़ अनाड़ी बावला
उतरा जीवन के सागर में ना मैं केवट खेवना
नाविक को देखा जब मैं नाव को चलाते
माझी केवट था उसका मैरीन बीच सागर में
रत्न ढूंढ लाता था सागर तल में जाकर
कौशल का वो ज्ञान लाता निकालकर समन्दर से
खोजता व्यापार वो तिजारत करता
करता है करोबार नौकरी करता
रोजमर्रा के काम से वो सागर बीच में जाता
लाता रतन ढूंढकर जीविका चलता
गुरवर देख मेरी ओर मैं हूँ अपढ़ अनाड़ी बावला
उतरा जीवन के सागर में ना मैं केवट खेवना
परिश्रम योग्य मुझे अब तू बना दे
देदे काम मुझको तू हुनर को सिखा दे
नौका चलाऊंगा मैं सागर बीच जाऊंगा
पारकर महासागर को मैं अर्जित धन कमाऊंगा
करतब दिखाकर मैं धन को कमाऊंगा
कर्म की सफलता को मैं सलाखों पे सजाऊंगा
विजई कारनामा होगा परिश्रम कौशल का
दिल का ईनाम होगा प्रदर्शन सफलता का
गुरवर देख मेरी ओर मैं हूँ अपढ़ अनाड़ी बावला
उतरा जीवन के सागर में ना मैं केवट खेवना
सूरज के उजाला में मैं देखा चांद सितारा
अवसरो की आग पे मैं देखा काम फुहारा
कुछ मनोरंजन करते कंकड़ चुनी चुनी गाते है
रास्ते बनाते अपना कितना धन कमाते है
आस्था स्थान और अवस्था महान है
देता फल गुलाब जैसा बड़ी शुभ काम है
छोटे छोटे शगलों से आगे बढ़ते जाते लोग
मौज मस्ती हँसी सुखी धन को कमाते लोग
गुरवर देख मेरी ओर मैं हूँ अपढ़ अनाड़ी बावला
उतरा जीवन के सागर में ना मैं केवट खेवना
गीत =} #उतरा जीवन के सागर में ना मैं केवट खेवना
#Utara Jeevan Ke Saagar Mein Na Main Kevat Khevana
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