यह गीत मनुष्य के शरीर में प्रवाहित होने वाली ऊर्जा प्राणशक्ति और ब्रह्मांडीय चेतना के बीच गहरे सामंजस्य को व्यक्त करता है। कवि अपने अनुभव के आधार पर यह प्रश्न करता है कि क्या तन की नस–नस में बहने वाली ऊर्जा वही शक्ति है जो पूरी सृष्टि को संचालित करती है।रचना में बताया गया है कि जैसे सृष्टि एक निश्चित नियम, संतुलन और लय में चलती है, वैसे ही मनुष्य का शरीर, मन और चेतना भी उसी लय से बंधे हैं। यह ऊर्जा शरीर को गतिशील रखती है, मन को प्रेरित करती है और आत्मा को जागृत करती है। कभी यह शक्ति स्पष्ट अनुभव होती है, तो कभी मन उसे समझ नहीं पाता और भ्रमित हो जाता है।कवि अनुभव करता है कि आत्मा रूप और पदार्थ से परे है, सत्य को किसी मूर्ति या आकार की आवश्यकता नहीं होती। शरीर की रचना, मस्तिष्क की संरचना और चेतना की गति—सब कुछ ब्रह्मांड से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।अंततः यह गीत इस अनुभूति पर पहुँचता है कि मनुष्य और ब्रह्मांड अलग नहीं हैं। जो शक्ति सृष्टि को चलाती है, वही शक्ति मनुष्य के भीतर भी प्रवाहित है। यह रचना बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव और आत्मबोध की अभिव्यक्ति है। भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, तनके नस नस में बहे जो ऊर्जा वो ब्रम्हांड है क्या, #Tanake Nas Nas Mein Bahe Jo Oorja Vo Bramhaand Hai Kya, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
गीत=} #तनके नस नस में बहे जो ऊर्जा वो ब्रम्हांड है क्या
#Tanake Nas Nas Mein Bahe Jo Oorja Vo Bramhaand Hai Kya
Writer ✍️ #Halendra Prasad
BLOGGER=} 🙏♥️ #मेरी_हृदय_मेरी_माँ ♥️🙏
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की मेरे अनुभव में आया है जो वो सामंजस है क्या
तनके नस नस में बहे जो ऊर्जा वो ब्रम्हांड है क्या
ताल मेल बैठता जैसे चलता संसार है
एक साथ में काम करता जैसे अनुकूल विधान है
ऐसी है अनुरूपता इसकी जैसे मेल खाता है
जैसे चलता सृष्टि गुरुवर वैसे ये घूमाता
विश्व के प्राणियों में हम भी एक जीव है
जैसे जैसे चलता सृष्टि वैसे हम चलते है
की मेरे अनुभव में आया है जो वो सामंजस है क्या
तनके नस नस में बहे जो ऊर्जा वो ब्रम्हांड है क्या
सृष्टि का नृत्यरत नर्तक करता है
जैसे नाचे सृष्टि वैसे तन को नचाता है
संतुलित रहता है जैसे वैसे स्थिर रखता है
सममित समान है बराबर में दिखता है
जीवन की शक्ति जो ऊर्जा में बहती
प्राण शक्ति का चेतना आत्मा में रहती
होश हो या ज्ञान हो सचेत हो जाता है
जागृत करता है तन को स्थिर हो जाता है
की मेरे अनुभव में आया है जो वो सामंजस है क्या
तनके नस नस में बहे जो ऊर्जा वो ब्रम्हांड है क्या
जैसे चलता श्रृष्टि वैसे निर्देशित करता है
करता है संचालित मन को प्रेरित करता है
इसका प्रोत्साहन हमको समझ में आता ना
कैसा है गति ये मन का कुछ भी बुझाता ना
रातों दिन बीत जाता पगला सा रूप मेरा
देखते रहता रात भर सृष्टि का स्वरूप सपना
कभी पूछे मन से कभी आत्मा को जगाता
काली काली रातों में भूलकर भूल जाता
की मेरे अनुभव में आया है जो वो सामंजस है क्या
तनके नस नस में बहे जो ऊर्जा वो ब्रम्हांड है क्या
मन और अस्तित्व को संचालित करते रहता है
जीवन को बताता है तेरा को अस्तित्व
रूप रेखा सत्ता से शरीर की आवश्यकता ना
आत्मा विचरण का कोई जरुरत ना
दुनियां की वस्तु केवल भावनाओं में रहता
धारणाओं में बहकर विचारों से कहता
सत्य की दुनियां इसकी कोई जरूरत ना
जो वास्तव में झूठ ना हो उसका कोई मूर्त ना
की मेरे अनुभव में आया है जो वो सामंजस है क्या
तनके नस नस में बहे जो ऊर्जा वो ब्रम्हांड है क्या
मन को प्रभावित करता शारीरिक सच्चाई
डर का कोई संगत ना कैसी है जुदाई
शरीर की बनावट जैसा दिखता है सृष्टि
ब्रह्मांड के जैसा तन घूमता है दृष्टि
सब कुछ सम्बंधित दिखता सृष्टि के जैसा
दिखता ब्रम्हांड है मस्तिष्क के जैसा
मुझको समझ में ना आए कैसे क्या होता है
मूर्ख अनाड़ी जैसा दिल मेरा खोता है
की मेरे अनुभव में आया है जो वो सामंजस है क्या
तनके नस नस में बहे जो ऊर्जा वो ब्रम्हांड है क्या
गीत=} #तनके नस नस में बहे जो ऊर्जा वो ब्रम्हांड है क्या
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