जीवन जन्म और मृत्यु के बीच सीमित घटना नहीं, बल्कि आत्मा की अनंत यात्रा है। शरीर बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, पर चेतना का प्रवाह निरंतर बना रहता है। जन्म प्रवेश है और मृत्यु परिवर्तन, अंत नहीं। कर्म जीवन की दिशा तय करते हैं और प्रत्येक अनुभव उसका फल है। गति ही जीवन का स्वभाव है, ठहराव जड़ता। जो इस सत्य को समझ लेता है, वह भय से मुक्त होकर जीवन का साक्षी बन जाता है और उसे सार्थक रूप से जीता है। आध्यात्मिक मंथन दृष्टिकोण जीवन-धारा में जन्म मृत्यु और आत्मा की अनंत यात्रा Adhytmik Manthan Drishtikon Jivan-Dhara Mein Janm Mrtyu Aur Aatma Kee Anant Yatra
इस जीवन में जन्म और मृत्यु कोई अंत नहीं बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है क्योंकि जीवन मृत्यु के शाश्वत चक्र आत्मा की यात्रा और कर्म फल के सिद्धांत पर आधारित एक गूढ़ दार्शनिक चिंतन है। सागर और झूला निरंतर गतिमान रहते उसी प्रकार यह जीवन निरन्तर गति करता है !
शरीर बदलता है परिस्थितियाँ बदलती हैं पर चेतना का प्रवाह निरंतर चलता रहता है जन्म और मृत्यु अंत नहीं, वे तो द्वार हैंआत्मा यात्री है शरीर साधन कर्म बीज है फल समय पर प्रकट होता है!
इस जीवन में जन्म और मृत्यु कोई अंतिम बिंदु नहीं बल्कि एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जीवन और मृत्यु का यह शाश्वत चक्र आत्मा की अनवरत यात्रा और कर्म-फल के सिद्धांत पर आधारित एक गूढ़ दार्शनिक सत्य है !
जन्म केवल एक प्रवेश है और मृत्यु एक परिवर्तन है अंत नहीं एक नए आरंभ की देहलीज पर जिस प्रकार सागर की लहरें न थमती हैं न रुकती हैं और झूला गति में ही अपने अस्तित्व का अर्थ पाता है उसी प्रकार जीवन भी निरंतर गति में रहता है रुक जाना जीवन नहीं ठहराव मृत्यु नहीं गति ही जीवन का स्वभाव है और परिवर्तन ही उसका सत्य।
आत्मा समय की सीमाओं से परे अपने कर्मों के भार और प्रकाश को लिए एक देह से दूसरी देह और एक अनुभव से दूसरे अनुभव की ओर अविराम यात्रा करती रहती है मिटती नहीं मृत्यु भय नहीं विश्राम भी नहीं केवल जीवन-धारा का एक मोड़ है।
तूफ़ान मनुष्य का जीवन है जो भावना सुख दुख जन्म मृत्यु और परिवर्तन से भरा हुआ है उलझा होना अज्ञान और जिज्ञासा का प्रतीक है जीवन तत्व का संकेत हैं कि जो इस उलझन को सुलझा सकता है वही जीवन चक्र को समझ सकता है क्योंकि
जैसे सागर गहरा और अथाह है वैसे ही जन्म और मृत्यु का विधान भी रहस्यमय है। कोई भी जीव इस विधान से बच नहीं सकता। आत्मा पालने से श्मशान तक इसी चक्र में झूलती रहती है।
जीवन चक्र में सुख का सफलता और जीवन कभी रुकता नहीं निरंतर गतिमान है कष्ट असफलता सुख दुख लाभ हानि उन्नति विनाश परिवर्तन अनिवार्य है क्योंकि जीवन चक्र टाला नहीं जा सकता!
झूला जीवन का एक सुंदर प्रतीक है कभी ऊपर सुख कभी नीचे दुख आत्मा गुरु से प्रश्न करती है सत्य को जब जानना होता है सत्य क्या है? मन को स्थिर कैसे किया जाए? जीवन को सार्थक कैसे बनाया जाए? जिसे गुरु-शिष्य संवाद का भाव कहा जाता है।
गति है जीवन तो गति क्या होती है गति केवल शरीर की चाल नहीं है। गति का अर्थ है परिवर्तन प्रवाह क्षण-क्षण नया होना। विचार बदलते हैं भावनाएँ उठती- डूबती हैं कोशिकाएँ जन्म लेती हैं.नष्ट होती हैं श्वास भीतर जाती है बाहर आती है जहाँ परिवर्तन है वहीं जीवन है।और जहाँ परिवर्तन रुक जाए वहीं जड़ता है।
यदि जीवन गति है तो वह रुकता क्यों नहीं? क्योंकि रुकना जीवन के स्वभाव के विरुद्ध है। नदी बहती है इसलिए नदी है यदि वह रुक जाए।तो वह तालाब बन जाती है और अंततः सड़ने लगती है। जीवन भी ऐसा ही है रुकना जड़ता है जड़ता विघटन है और इसलिए जीवन रुक नहीं सकता वह या तो रूप बदलता है या स्तर बदलता है!
मृत्यु क्या है? क्या वह स्थिर अवस्था है? नहीं मृत्यु कोई विराम नहीं है वह सीमा-रेखा है जिसे हम मृत्यु कहते हैं मृत्यु है शरीर की गति का समाप्त होना लेकिन अस्तित्व की गति का नहीं बीज मिट्टी में टूटता है क्या वह मरता है? या वृक्ष बनने की प्रक्रिया में प्रवेश करता है? मृत्यु भी वैसी ही है एक रूप का अंत दूसरे रूप की शुरुआत।
स्थिरता कहाँ है? स्थिरता बाहर नहीं है स्थिरता दृष्टा में है जो देख रहा है वह जन्म मरण से परे है वह गति में नहीं है पर गति को जानता है शरीर चलता है मन बदलता है पर मैं जो देख रहा है वह साक्षी है वही एकमात्र स्थिर तत्व है जो स्थिरता है!
जीवन परिवर्तन मृत्यु परिवर्तन का द्वार है गति कभी रुकती नहीं केवल रूप बदलती है जो रुकता हुआ दिखता है वह दृष्टि का भ्रम है और जो इसे समझ लेता है वह जीवन से नहीं डरता और मृत्यु से मुक्त हो जाता है।
प्रकृति ही न्यायाधीश है कोई राजा हो या चोर सबको अपने कर्मों का फल भोगना ही है। जाने वाला ज्ञान देकर जाता है आने वाला प्रेम लेकर आता है। जिसे कर्म और न्याय का सिद्धांत और जो जैसा वैसा फल उसको चलाएगा
जीवन और मृत्यु एक ही यात्रा के दो पड़ाव हैं आत्मा अमर है और शरीर परिवर्तनशील है और गुरु ही वह प्रकाश हैं जो इस चक्र का बोध कराते हैं कि कर्म ही मनुष्य का वास्तविक परिचय है जो मनुष्य को बोध करता की मनुष्य जैसा करता है वैसा भरता है!
जीवन को सागर और झूले के रूपक से समझते हैं कि जहाँ जन्म और मृत्यु निरंतर आते जाते रहते हैं। आत्मा इस चक्र में बंधी हुई सुख दुख लाभ हानि सफलता असफलता का अनुभव करती है क्योंकि कि परिवर्तन जीवन का स्वभाव है, उसे रोका नहीं जा सकता। जीवन निरंतर गतिमान है और कर्म के अनुसार ही फल प्राप्त होता है। कोई भी इस प्रकृति के विधान से बच नहीं सकता।
आत्मा की जिज्ञासा के माध्यम से गुरु से सत्य स्थिरता और जीवन-बोध की शिक्षा शिष्य चाहता है। और गुरु से संदेश मिलता है कि गुरु-कृपा और कर्म-बोध से ही जीवन के रहस्य को समझा जा सकता है तथा मानव अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
यदि भय से मुक्त होना है, तो जीवन को किसी एक घटना के रूप में नहीं बल्कि एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में देखना होगा। मृत्यु विराम है समाप्ति नहीं। आत्मा की निरंतरता देह का परिवर्तन और चेतना की यात्रा ही जीवन का सत्य है। कर्म का न्याय प्रत्येक अनुभव को उसका कारण और परिणाम प्रदान करता है। क्योंकि दृष्टि भय को ज्ञान में और अनिश्चितता को स्वीकार में रूपांतरित कर देती है और यही मृत्यु भय को शांत करता है और को अर्थ देता है तथा मनुष्य को जागरूक कर सहभागी बनाता है पीड़ित नहीं !
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें