यह रचना जीवन को राम और रावण के बीच चल रहे संघर्ष के रूप में दर्शाती है। आज का मनुष्य दुख भय और असुरक्षा से घिरा है जहाँ उसे चुनना पड़ता है कि वह करुणा सत्य और संयम का मार्ग अपनाए या अहंकार क्रोध और स्वार्थ का। राम और रावण बाहरी पात्र नहीं बल्कि मनुष्य के भीतर की प्रवृत्तियाँ हैं। सच्ची मुक्ति प्रेम करुणा विवेक और आत्मचिंतन से ही संभव है। आध्यात्मिक दर्शनिक दृष्टिकोण अमूल्य रचना जीवन राम और रावण के बीच मनुष्य का अंतहीन धर्मयुद्ध, Adhytmik Darshnik Amuly Rachana, Jeevan Raam Aur raavan ke Beech Manushy Ka Antaheen Dharmayuddh

  जीवन राम और रावण के बीच मनुष्य का अंतहीन धर्मयुद्ध Jeevan Raam Aur raavan ke Beech Manushy Ka Antaheen Dharmayuddh

 आज का जीवन एक धर्मयुद्ध बन चुका है जहाँ परिस्थितियाँ मनुष्य को मजबूर कर देती हैं कोई सत्य त्याग और मर्यादा का पथ चुनकर राम बन जाता है तो कोई अहंकार क्रोध और स्वार्थ में वशीभूत होकर रावण बन जाता है जीवन जीने की लड़ाई चलती रहती है और मनुष्य बिखर जाता है!

इस सृष्टि में चारों ओर दुख भय भटकाव और असुरक्षा है असुरक्षा के कारण जीवन एक संग्राम बन गया है जहाँ कमजोर और मजबूत के बीच निरंतर टकराव है। समझ में नहीं आता कि कौन क्या लेकर आया था जो खो दिया और क्या लेकर जाएगा जिसे पकड़ना चाहता है किसने किसे मारा? किसने किसे उबारा? यह समाज की उस अराजकता को दर्शाता है जहाँ नैतिकता धुँधली पड़ गई है।

 इस जहां में दुख-दर्द केवल शरीर तक सीमित नहीं रह गया बल्कि मन और बुद्धि को भी अग्नि की तरह जला दिया है ज्ञान विवेक हुनर सब जलने लगे हैं और मनुष्य भीतर से टूटने लगा है और जीवन के अनेक रूप में बदलते जा रहा हैं जहां मानसिक और आत्मिक संकट घोर विडम्बना खड़ी है!

 जब मनुष्य की दुःख पीड़ा असहनीय हो जाती है तो मानव विरक्ति की ओर बढ़ता है घर-बार छोड़कर जंगल वन की ओर अग्रसित होने लगता है और आत्मचिंतन की शरण लेता है। जिसे हम भक्ति साधना ध्यान और आत्मशुद्धि से ईश्वरीय प्रेम को पाकर जीवन जीते है जिसे असहाय मानव और वैराग्य का मार्ग का पथ प्रदर्शन कहा जाता है!

जैसे नफरत की बीज बोने से मुक्ति नहीं मिलती वैसे ही जीवन में अहंकार द्वेष घमंड लोभ को पालने प्रेम नहीं मिलता क्योंकि अब जीवन जीने का नहीं बल्कि सोचने का समय बन गया है जीवन कैसे जिया जाए? राम बनकर जिया जाय कृष्ण बनकर जिया जाय बुद्ध बनकर जिया जाए या रावण बनकर जिया जाय !

जीवन जीने के लिए हमें चुनाव की आवश्यकता पड़ गई है कि जीवन में करुणा प्रेम संयम और धर्म का मार्ग कैसे प्राप्त होगा परमात्मा की बनाई हुई सृष्टि में सब कुछ है पर स्वयं को मालूम नहीं हो पा रहा है कि किसकी चुनाव किया जाए ताकि जीवन सुखमय बन जाए और परिस्थितियों के अनुसार आवश्यकताओं की पूर्ति भी हो जाए!

उच्च कोटि की हृदय बनाने के लिए और समाज की दिशा निर्देश देने के लिए कौन सी शक्ति सार्थक है और कौन सी शक्ति निरर्थक है और किसकी रचनाएँ शक्ति दें सकती है और और कौन जीवन को सुखमय बना सकता है तथा जन-जन के हृदय को जागृत कर सकता है और मन क्या चाहता है और क्यों चाहता है यह तथ्य बहुत ही व्यग्रता को जन्म देने लगता है आत्मचिंतन बढ़ती जाती है समय घटती जाती है और समस्या का रूप धारण कर लेती है!

हमारा जीवन एक रणभूमि का रूप बन गया है जहाँ हर व्यक्ति संघर्षों से घिरा हुआ है। दुख पीड़ा भय और संकट ने मानव जीवन को कठिन बना दिया है। इन परिस्थितियों में मनुष्य की वास्तविक प्रकृति सामने आती है तो कोई धर्म सत्य और करुणा का मार्ग अपनाकर राम बन जाता है तो कोई अहंकार क्रोध और स्वार्थ के वशीभूत होकर रावण बन जाता है। 

इस जीवन में लगातार संघर्ष मन बुद्धि और आत्मा को झुलसा देता है। जब पीड़ा असहनीय हो जाती है तब मानव वैराग्य और भक्ति की ओर मुड़ता है। राम-नाम तप और साधना के माध्यम से जीवन को प्रेम और शांति का मार्ग चुन लेता है।

 इस जीवन में नफरत और हिंसा से मुक्ति संभव नहीं। जीवन की इस लड़ाई में मनुष्य को स्वयं चुनना है कि वह राम का मार्ग अपनाए या रावण की वृत्ति। करुणा संयम और प्रेम ही सच्ची मुक्ति का मार्ग हैं जीवन नदी की माफिक निरन्तर गतिशील है जैसे नदी अपनी गति से निरन्तर बहती है वैसे ही यह जीवन अपनी गति से नूरंतर बहते रहता है!

राम केवल कोई व्यक्ति नहीं बल्कि करुणा संयम सत्य और विवेक है और रावण कोई शत्रु नहीं बल्कि अहंकार भय भ्रम क्रोध और असुरक्षा है आजका दुख केवल शारीरिक नहीं है बल्कि मन थका है बुद्धि भ्रमित है आत्मा घायल है जिसके कारण जीवन जीने से ज्यादा सोचने का बोझ बन गया है!

जीवन जीने का उपदेश मनुष्य को आईना दिखाता है कि राम बनना कोई भूमिका नहीं कृष्ण बनना कोई चालाकी नहीं और बुद्ध बनना कोई पलायन नहीं, जहाँ करुणा दया भाव संभव हो वहाँ राम है, जहाँ बुद्धि विवेक ज्ञान निर्णय क्षमता सूझबूझ अन्तर्दृष्टि है वहाँ कृष्ण है और जहाँ आसक्ति चाह मोह प्रेम अनुराग जल रही हो वहाँ बुद्ध है!


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