आदिशक्ति चेतना प्रकृति और संरक्षण का ब्रह्मांडीय दर्शन Aadishakti Chetana Prakrti Aur Sanrakshan Ka Brahmaandeey Darshan
आदिशक्ति ऊर्जा चेतना ज्ञान संरक्षण सृजन और संरक्षिका के रूप में विद्यमान है जिसे देवी को मूर्ति नहीं बल्कि ब्रह्मांडीय सिद्धांत मानता है। शक्ति ईश्वर की क्रियात्मक सत्ता है।
सृष्टि दर्शन कहता है की शक्ति स्वयंभू है शक्ति की उत्पत्ति का आविष्कार किसी ने नहीं किया जैसे अग्नि की ऊष्मा सूर्य का प्रकाश है उसी प्रकार क्योंकि पुरुष चेतना और प्रकृति शक्ति मिलकर सृष्टि बनाते हैं।
जैसे-जैसे मनुष्य विकसित हुआ वैसे-वैसे उसने शक्ति कोमाँ देवी संरक्षिका गुरु के रूप में अनुभव किया क्योंकि देवी बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक अनुभूति है इसीलिए मानव चेतना का वृद्धि अध्यात्म को जगाता है।
त्रिदेवी सिद्धांत सरस्वती गायत्री सृजन ज्ञान प्रज्ञा लक्ष्मी पालन संतुलन शांति है और काली दुर्गा चंडी संरक्षण संरक्षिका विनाश से रक्षा है। यानी देवी ज्ञान करुणा शक्ति तीनों का संतुलन।
शक्ति किसी धर्म की खोज नहीं बल्की प्रकृति का नियम हैगुरुत्वाकर्षण की तरह और चेतना की तरह देवी नियम नहीं कल्पना है और रूप स्वरूप ब्रह्मांड के नियम से आया है
नारी शक्ति जीवंत रूप है न कि केवल पूजा की वस्तु।जिसे नारी-सम्मान का आध्यात्मिक घोष भी कहते है क्योंकि भारत माँ नदियाँ गंगा-जमुना स्त्री माता बहन बेटी भार्या के रूप में देखते हैं।
माँ सुरक्षा का भाव है सुरक्षा भय का क्षय है भय का क्षय मानसिक शांति है और मानसिक शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति है आधुनिक दृष्टि से मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक स्तर पर
संरक्षिका मानव का मनोवैज्ञानिक पद्धति माँ और देवी मानसिक संतुलन भी है। शरणागति स्तुति नहीं दर्शन है दर्शन कविता नहीं साधना है जो देवी को मंदिर से निकालकर मन प्रकृति और चेतना में स्थापित करता है।
देवी को किसी मानव-कल्पना या आविष्कार का परिणाम नहीं है बल्कि स्वयंभू ब्रह्मांडीय शक्ति माना गया है जो सृजन पालन और संरक्षण के रूप में कार्य करती है क्योंकि आदिशक्ति को सृष्टि की मूल ऊर्जा चेतना और नियम के रूप में प्रस्तुत होती है।
मानव चेतना के विकास के साथ अध्यात्म जागृत हुआ और शक्ति को माँ गुरु और संरक्षिका के रूप में अनुभव किया गया। सरस्वती लक्ष्मी और काली दुर्गा के त्रिरूप में देवी ज्ञान संतुलन और संरक्षण का प्रतीक बनती हैं। देवी को प्रकृति नदियों भारत माँ और नारी के रूप में देखा गया है जिससे नारी को सजीव शक्ति का स्वरूप बताया गया है।
संरक्षिका शक्ति मानव के मनोवैज्ञानिक संतुलन नैतिकता करुणा और अनुशासन को जाग्रत करती है। अंततः पूर्ण शरणागति भाव से माँ से बल बुद्धि ज्ञान और संरक्षण की प्रार्थना होता है यह केवल भक्ति नहीं बल्कि आध्यात्मिक दर्शन और चेतना की साधना है।
जीवन के उस आंतरिक उल्लास का संकेत जो प्रेम या दिव्य अनुभव से प्रकृति में भी झलकने लगता है जैसे प्रकृति के प्रत्येक पत्ते पर मानो आनंद और मुस्कान बिखर रही है और हर पत्ता हँसी की चमक से भर गया है।
मन पूर्ण तृप्ति प्रेम और रस से जब भर उठा हो तो शब्दों में बांधना कठिन है। हे ईश्वरीय शक्ति तुम्हारी उपस्थिति से अनंत आनंद का उत्सव फूटने लगता है। जीसे प्रियसि असीम आनन्द उल्लास कह सकते है।
प्रेमी-प्रेमिका या साधक-ईश्वर के दो तटों का प्रतीक है जैसे आकाश मानो दो तटों के बीच बहती किसी दिव्य नदी की तरह डूबता-उभरता प्रतीत हो रहा है जिसे युगल कूल कह सकते है क्योंकि आकाश की विशालता उस मिलन की अनुभूति को गाढ़ा करती है जहां मानो दोनों पक्ष एक-दूसरे में विलीन होने चले हों।
जब मन प्रकृति भाव से सब जगह हर्ष और उल्लास का खेल विलास खुलकर प्रस्फुटित हो रहा होता है तो हर दिशा में आनंद की बाढ़-सी उमड़ पड़ी होती है।
जीवन एक ऐसे क्षण का चित्रण करता है जब प्रेम प्रकृति और आध्यात्मिक चेतना का संगम हो जाता है मनुष्य का अंदरूनी आनंद इतना गहरा हो जाता है कि पत्तों से लेकर आकाश तक सब कुछ मुस्कुराता हुआ प्रतीत होता है इस पवित्र मिलन-क्षण में हर्ष की लहरें हर दिशा में फैल जाती हैं।
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