कविता, जीवन की सच सत्य की खोज,
||जीवन की सच में सत्य की खोज||
सोचा करो उम्र की दहलीजों पे अपने को टोका करो
फैसला तो एक दिन लेना ही पड़ेगा
कभी कभी पड़ाव को भी रोक करो
ना समझ है ये जिन्दगी क्यों समझाते हो
पत्थरों पे सिर पटक कर क्यों मनाते हो
क्या लाया था जो खतम हो गया
इज्जत की दहलीजों पे क्यों चिल्लाते हो
किसका कौन सहारा है सबको माँ अकेले ही लाया है
झूठों का पर्दा है ये रिश्ते सबने केवल दिल बहलाया है
झूठा प्रेम झूठी कहानी सबकी अपनी मनमानी
आकर सामने देख जरा तो सबकी अपनी अपनी कहानी
रोने चिल्लाने से सच को सच कौन मानता
मन को भी अपनी अदा है उसको बेमन कौन मानता
अगर कुछ चाहो तो अकेले रहो
आसमाओं से रूबरु होकर घिरे रहो
खोजों कुछ सत्य को जो अमर कर दे
आंख की पानी को भी खत्म कर दे
किससे मांगते हो ये अच्छी जिंदगियों का सफर
कुछ करों तो अब इधर उधर
ये जिगर को जख्म क्यों बनाए हो
मंजिल की चाहत में अपने को क्यों भुलाए हो
खरीद सकते हो दुनिया की सारी सुख
सुकून की दाम पे इतना क्यों घबराए हो
गलतियां इंसान को सिखा देती
जो सिखता नहीं उसको वक्त बता देती
ये माया की दुनिया अज्ञानियों की दुनिया है
जिसको पकड़ता उसको निगल जाता
निर्दोष मन को दोषों में मढ़ जाता
कमाओ पैसे को सम्मान में क्या रखा
खबर
दिल का रखो आवाजों में क्या रखा
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