आध्यात्मिक दार्शनिक भक्ति रचना, शरणागति: माँ में ईश्वर का साक्षात्कार- मैं तेरा हूँ माँ, Sharanagati: Maa mein Ishwar ka Saakshatkar-Main Tera Hoon Maa,
आध्यात्मिक दार्शनिक भक्ति रचना, शरणागति: माँ में ईश्वर का साक्षात्कार- मैं तेरा हूँ माँ, Sharanagati: Maa mein Ishwar ka Saakshatkar-Main Tera Hoon Maa,
जब साधक पूर्ण आत्मसमर्पण और निष्कपट प्रेम का भाव व्यक्त करता है तब वह कहता है कि मै तो चाहता हूँ कि माँ चाहे तो हमे इस संसार से भी ले जाए मुझे कोई अफसोस नहीं क्योंकि वह स्वयं को माँ का दुलारा मानता है और वह सोचता है मैं तुम्हारा हूँ जो तुम्हारी इच्छा वही होगा,इसी भाव को भक्ति मार्ग में शरणागति का प्रतीक माना जाता है।
सच्ची शरणागति का मतलब जीवन से भागना या मृत्यु की इच्छा करना नहीं है बल्कि इसका मतलब है अपने अहंकार को छोड़ देना ईश्वर की इच्छा में विश्वास रखना जो भी परिस्थितियाँ आएँ उन्हें प्रसाद मानकर स्वीकार करना और आगे बढ़ना!
जब भक्त कहता है कि माँ चाहे तो मुझे इस संसार से भी ले जाए मुझे कोई अफसोस नहीं तो इसका गहरा अर्थ यह है कि अब उसके भीतर डर और आसक्ति कम हो गई है वह जीवन और मृत्यु दोनों को ईश्वर की इच्छा मानता है उसे भरोसा है कि माँ जो करेगी, मेरे हित में करेगी !
जीवन हमें कर्म करने और साधना करने के लिए मिला है इसलिए जब तक जीवन है, उसे पूरी जिम्मेदारी और सजगता से जीना ही सच्ची भक्ति है जैसे भगवद गीता का संकेत है कर्म करते रहो फल और नियंत्रण ईश्वर को समर्पित करो, शरणागति का मतलब है मैं कुछ नहीं, सब कुछ तू है ईश्वर मतलब समर्पण और विश्वास है न कि त्याग या पलायन सच्चा भक्त जीवन को भी प्रसाद मानता है और मृत्यु को भी!
मातृत्व के त्याग और पालन-पोषण का स्मरण अंगुली पकड़ कर तूने चलना सिखाई कितने दुखों से तूने पाला पोषा माँ के त्याग कष्ट और स्नेह को याद करना माँ ने जन्म दिया पालन किया जीवन जीना सिखाया लेकिन अंत में छोड़ दिया काहे माँ कहकर वह विरह और पीड़ा व्यक्त करने का मतलब माँ पिता जैसा अब इस दुनियां प्रेम असंभव है सम्भव नहीं!
माँ के त्याग उसके स्नेह और अंततः उससे बिछुड़ने की पीड़ा का बहुत सच्चा चित्रण है। यह विरह केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सुरक्षा उस निःस्वार्थ प्रेम के खोने का भी है जो माँ के साथ जुड़ा होता है। अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया यह सिर्फ चलना नहीं बल्कि जीवन जीना सिखाने का प्रतीक है। माँ का प्रेम अक्सर बिना शर्त का होता है और जब वह साथ नहीं रहती तो ऐसा लगता है कि दुनिया में वैसा प्रेम अब संभव ही नहीं।
माँ का प्रेम अद्वितीय जरूर होता है पर वही प्रेम हमें यह भी सिखाता है कि हम दूसरों से जुड़ें स्नेह दें और ग्रहण करें। दुनिया में वैसा ही प्रेम नहीं मिलता लेकिन अलग रूपों में सच्चा स्नेह और अपनापन अब भी संभव है पर किसी को मिलता किसी को नहीं!
अंगुली पकड़ कर तूने चलना सिखाया हर दुख सहकर मुझे हँसना सिखाया। तेरे त्याग तेरे स्नेह का कोई मोल नहीं माँ तेरे जैसा इस जग में कोई और नहीं। अंत में क्यों छोड़ गई तू मुझे यूँ अकेला तेरे बिना ये संसार लगे सूना अधूरा मेला। माँ कहकर पुकारूँ पर तू सुनती कहाँ तेरे बिना अब वैसा प्रेम मिलता कहाँ।
यह शारीरिक माँ के बिछोह का भी संकेत हो सकता है या फिर ईश्वर से दूरी का भाव भी क्योंकि भाव दो स्तरों पर एक साथ काम करता है एक स्तर पर यह सचमुच शारीरिक माँ के बिछोह का दुख है उस स्पर्श उस सुरक्षा उस निःस्वार्थ स्नेह का खो जाना। इसलिए माँ सिर्फ व्यक्ति नहीं रहती वह एक पूरा संसार बन जाती है।
दूसरे स्तर पर यही माँ ईश्वर या उस परम सत्ता का प्रतीक भी हो जाती है जब मनुष्य खुद को अकेला असहाय या खाली महसूस करता है तो उसे लगता है जैसे वह उस मूल स्रोत से कट गया है जहाँ से प्रेम शांति और अपनापन आता था। यही विरह भक्ति परंपरा में भी दिखता है जहाँ दूरी ही पुकार बन जाती है क्योंकि अगर यह ईश्वर से दूरी है तो यह दूरी पूरी तरह वास्तविक नहीं बल्कि अनुभूति की दूरी होती है। जैसे बादल सूरज को ढक लेते हैं सूरज कहीं गया नहीं होता।
जिन्दगी एक जंग है माँ लोभ कामना दिल को दिल से तोड़ता इसीलिए इस जीवन को युद्ध कहा गया है क्योंकि लोभ स्वार्थ कामना ये मनुष्य को तोड़ते हैं और यही संसार की नश्वरता और मोह-माया का चित्रण है युद्ध केवल बाहरी लड़ाई नहीं बल्कि भीतर के द्वंद्व का प्रतीक है धर्म और अधर्म स्थिरता और विचलन स्वार्थ और कर्तव्य के बीच। वहीं माया यह बताती है कि संसार की चीज़ें क्षणभंगुर हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सब निरर्थक हैबल्कि यह समझ कि क्या स्थायी है और क्या नहीं!
सुख-दुख अस्थायी हैं धन का सफलता साथ नहीं जाती मृत्यु के बाद सब यहीं छूट जाता है संसार क्षणभंगुर है क्योंकि जो बदलने वाला है उससे अत्यधिक आसक्ति दुख का कारण बनती है वहीं अनित्य क्षणभंगुरता का विचार बताता है कि हर चीज़ परिवर्तनशील है चाहे वह सुख हो या दुख हो शरीर हो या परिस्थितियाँ।
सच्ची भक्ति धन और दिखावे की पूजा सोने की थाली वैभव का प्रतीक है परंतु सच्चा प्रेम और निःस्वार्थ भाव ही माँ को प्रिय है क्योंकि ईश्वर भाव देखता है वस्तु नहीं। एक पत्ता एक फूल या जल भी यदि सच्चे मन से अर्पित हो तो वही पर्याप्त है। इसी तरह भक्ति का सार निःस्वार्थ समर्पण है न कि प्रदर्शन।
साधक अपने लिए कुछ नहीं मांगता केवल दुआ की शक्ति मांगता है सबके लिए खुशी निःस्वार्थ प्रेम करुणा आशा और प्रकाश और यहीं साधक संतों की प्रार्थना है सबका मंगल हो और यही उच्च भक्ति की प्रतीक है! जहाँ मुझे क्या मिले खत्म हो जाता है, और सबका भला हो ही प्रार्थना बन जाता है। यही साधक का विस्तार है व्यक्तिगत इच्छा से सार्वभौमिक करुणा तक।
साधक कुछ नहीं माँगता अपने लिए बस दुआ की शक्ति सबके लिए हर हृदय में खुशी हर आँख में उजाला प्रेम हो निःस्वार्थ मिटे हर अँधियाला करुणा बहे जैसे निर्मल धारा आशा जगे हर जीवन में सारा यही प्रार्थना संतों की वाणी सबका मंगल हो यही सच्ची कहानी इस भाव में एक सूक्ष्म शक्ति होती है जब प्रार्थना सीमित मैं से निकलकर हम सब तक फैलती है तो वह केवल शब्द नहीं रहती एक दृष्टि बन जाती है और यही दृष्टि भक्ति को ऊँचाई देती है जहाँ प्रेम करुणा और प्रकाश ही साधना का सार बन जाते हैं।
दुःख सहकर मौन धारण कर आत्मा की परीक्षा लेते हुए मनुष्य ईश्वर के निकट पहुँचता है और यह ध्यान तप और आंतरिक जागरण का संकेत है आत्मा पर अनुशासन करना और मौन पे जीना साधना का भाव है जिसे आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना कहते है!
ध्यान का अर्थ है सजग होना अपने भीतर की गतिविधियों को देखना तप का अर्थ है अनुशासन पर वह ऐसा जो हमें कठोर नहीं बल्कि अधिक स्पष्ट और करुणामय बनाए क्योंकि दुःख सहना अपने आप में साधना नहीं है दुःख को समझना उससे सीखना और उसके बीच सजग रहना साधना है। केवल मौन धारण कर लेना भी पर्याप्त नहीं बल्कि वह मौन कैसा है क्या वह जागरूकता से भरा है या दबाव से यह अधिक महत्वपूर्ण है।
साधना का सार केवल सहन करना नहीं बल्कि रूपांतरण है जहाँ दुःख भी हमें गहराई देता है मौन भी हमें जोड़ता है और आत्मचिंतन हमें धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट शांत और करुणामय बनाता है। दुःख आए तो भागना नहीं पर उसे पकड़कर बैठ जाना भी नहीं मौन धारण हो तो भीतर जागरण के साथ न कि केवल शब्दों का अभाव क्योंकि आत्मा की परीक्षा तब होती है जब हम अंधकार में भी सजग रह पाते हैं और यही ध्यान है यही तप है जहाँ अनुशासन कठोरता नहीं बल्कि समझ बन जाता है।
जब साधक माँ का दुलारा मानते हुए पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करता है तो वह कहता है कि उसे जीवन या मृत्यु का कोई अफसोस नहीं क्योंकि वह पूरी तरह माँ का है माँ के त्याग पालन-पोषण और संघर्षों का स्मरण है। साथ ही जीवन की नश्वरता लोभ-मोह और स्वार्थ से भरे संसार का यथार्थ चित्रण है। एक पुत्र की अपनी माँ के प्रति गहन प्रेम समर्पण और श्रद्धा को व्यक्त है।
धन सफलता और वैभव अंततः साथ नहीं जाते साधक अंत में वह अपने लिए कुछ नहीं मांगता बल्कि सबके लिए सुख प्रेम करुणा और आशीर्वाद की प्रार्थना करता है माँ ही जीवन का आधार आश्रय और आध्यात्मिक शक्ति है सच्चा सुख निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण में है जो भाव व्यक्ति को कमजोर नहीं बनाता बल्कि भीतर से स्थिर करता है क्योंकि उसे एक ऐसा आधार मिल जाता है जो बदलता नहीं।
मैं माँ का दुलारा वही मेरी पहचान, उसके चरणों में ही है मेरा सारा जहान। जीवन हो या मृत्यु न कोई भय न क्लेश, जब माँ का साया हो तो कैसा ये द्वेष।, तेरे त्याग का स्मरण तेरे संघर्षों की छाँव, यही मेरी पूँजी यही मेरा गाँव। जग नश्वर लोभ-मोह का जाल बिछाए, पर माँ का प्रेम ही सच्चा मार्ग दिखाए। मैं तेरा हूँ माँ बस तेरा ही रहूँ, इसी समर्पण में जीवन का सत्य कहूँ।
धन-वैभव सब यहीं रह जाएगा अंत में खाली हाथ ही जाना है।साधक न माँगे अपने लिए कुछ बस सबका मंगल गाना है। माँ ही आधार माँ ही आश्रय वही जीवन की सच्ची शक्ति निःस्वार्थ प्रेम में जो डूबे, वही पाए सच्ची भक्ति। समर्पण में कमजोरी नहीं, यही भीतर की स्थिरता है जो बदलता नहीं कभी भीवही सच्ची समर्थता है।
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