आध्यात्मिक दार्शनिक भक्ति रचना, शरणागति: माँ में ईश्वर का साक्षात्कार- मैं तेरा हूँ माँ, Sharanagati: Maa mein Ishwar ka Saakshatkar-Main Tera Hoon Maa,

आध्यात्मिक दार्शनिक भक्ति रचना, शरणागति: माँ में ईश्वर का साक्षात्कार- मैं तेरा हूँ माँ, Sharanagati: Maa mein Ishwar ka Saakshatkar-Main Tera Hoon Maa,

जब साधक पूर्ण आत्मसमर्पण और निष्कपट प्रेम का भाव व्यक्त करता है तब वह कहता है कि मै तो चाहता हूँ कि माँ चाहे तो हमे इस संसार से भी ले जाए मुझे कोई अफसोस नहीं क्योंकि वह स्वयं को माँ का दुलारा मानता है और वह सोचता है मैं तुम्हारा हूँ जो तुम्हारी इच्छा वही होगा,इसी भाव को भक्ति मार्ग में शरणागति का प्रतीक माना जाता है।

सच्ची शरणागति का मतलब जीवन से भागना या मृत्यु की इच्छा करना नहीं है बल्कि इसका मतलब है अपने अहंकार को छोड़ देना ईश्वर की इच्छा में विश्वास रखना जो भी परिस्थितियाँ आएँ उन्हें प्रसाद मानकर स्वीकार करना और आगे बढ़ना!

जब भक्त कहता है कि माँ चाहे तो मुझे इस संसार से भी ले जाए मुझे कोई अफसोस नहीं तो इसका गहरा अर्थ यह है कि अब उसके भीतर डर और आसक्ति कम हो गई है वह जीवन और मृत्यु दोनों को ईश्वर की इच्छा मानता है उसे भरोसा है कि माँ जो करेगी, मेरे हित में करेगी !

जीवन हमें कर्म करने और साधना करने के लिए मिला है इसलिए जब तक जीवन है, उसे पूरी जिम्मेदारी और सजगता से जीना ही सच्ची भक्ति है जैसे भगवद गीता का संकेत है कर्म करते रहो फल और नियंत्रण ईश्वर को समर्पित करो, शरणागति का मतलब है मैं कुछ नहीं, सब कुछ तू है ईश्वर मतलब समर्पण और विश्वास है न कि त्याग या पलायन सच्चा भक्त जीवन को भी प्रसाद मानता है और मृत्यु को भी!

मातृत्व के त्याग और पालन-पोषण का स्मरण अंगुली पकड़ कर तूने चलना सिखाई कितने दुखों से तूने पाला पोषा माँ के त्याग कष्ट और स्नेह को याद करना माँ ने जन्म दिया पालन किया जीवन जीना सिखाया लेकिन अंत में छोड़ दिया काहे माँ कहकर वह विरह और पीड़ा व्यक्त करने का मतलब माँ पिता जैसा अब इस दुनियां प्रेम असंभव है सम्भव नहीं!

माँ के त्याग उसके स्नेह और अंततः उससे बिछुड़ने की पीड़ा का बहुत सच्चा चित्रण है। यह विरह केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सुरक्षा उस निःस्वार्थ प्रेम के खोने का भी है जो माँ के साथ जुड़ा होता है। अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया यह सिर्फ चलना नहीं बल्कि जीवन जीना सिखाने का प्रतीक है। माँ का प्रेम अक्सर बिना शर्त का होता है और जब वह साथ नहीं रहती तो ऐसा लगता है कि दुनिया में वैसा प्रेम अब संभव ही नहीं।

माँ का प्रेम अद्वितीय जरूर होता है पर वही प्रेम हमें यह भी सिखाता है कि हम दूसरों से जुड़ें स्नेह दें और ग्रहण करें। दुनिया में वैसा ही प्रेम नहीं मिलता लेकिन अलग रूपों में सच्चा स्नेह और अपनापन अब भी संभव है पर किसी को मिलता किसी को नहीं!

अंगुली पकड़ कर तूने चलना सिखाया हर दुख सहकर मुझे हँसना सिखाया। तेरे त्याग तेरे स्नेह का कोई मोल नहीं माँ तेरे जैसा इस जग में कोई और नहीं। अंत में क्यों छोड़ गई तू मुझे यूँ अकेला तेरे बिना ये संसार लगे सूना अधूरा मेला। माँ कहकर पुकारूँ पर तू सुनती कहाँ तेरे बिना अब वैसा प्रेम मिलता कहाँ।

यह शारीरिक माँ के बिछोह का भी संकेत हो सकता है या फिर ईश्वर से दूरी का भाव भी क्योंकि भाव दो स्तरों पर एक साथ काम करता है एक स्तर पर यह सचमुच शारीरिक माँ के बिछोह का दुख है उस स्पर्श उस सुरक्षा उस निःस्वार्थ स्नेह का खो जाना। इसलिए माँ सिर्फ व्यक्ति नहीं रहती वह एक पूरा संसार बन जाती है।

दूसरे स्तर पर यही माँ ईश्वर या उस परम सत्ता का प्रतीक भी हो जाती है जब मनुष्य खुद को अकेला असहाय या खाली महसूस करता है तो उसे लगता है जैसे वह उस मूल स्रोत से कट गया है जहाँ से प्रेम शांति और अपनापन आता था। यही विरह भक्ति परंपरा में भी दिखता है जहाँ दूरी ही पुकार बन जाती है क्योंकि अगर यह ईश्वर से दूरी है तो यह दूरी पूरी तरह वास्तविक नहीं बल्कि अनुभूति की दूरी होती है। जैसे बादल सूरज को ढक लेते हैं सूरज कहीं गया नहीं होता।

जिन्दगी एक जंग है माँ लोभ कामना दिल को दिल से तोड़ता इसीलिए इस जीवन को युद्ध कहा गया है क्योंकि लोभ स्वार्थ कामना ये मनुष्य को तोड़ते हैं और यही संसार की नश्वरता और मोह-माया का चित्रण है युद्ध केवल बाहरी लड़ाई नहीं बल्कि भीतर के द्वंद्व का प्रतीक है धर्म और अधर्म स्थिरता और विचलन स्वार्थ और कर्तव्य के बीच। वहीं माया यह बताती है कि संसार की चीज़ें क्षणभंगुर हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सब निरर्थक हैबल्कि यह समझ कि क्या स्थायी है और क्या नहीं!

सुख-दुख अस्थायी हैं धन का सफलता साथ नहीं जाती मृत्यु के बाद सब यहीं छूट जाता है संसार क्षणभंगुर है क्योंकि जो बदलने वाला है उससे अत्यधिक आसक्ति दुख का कारण बनती है वहीं अनित्य क्षणभंगुरता का विचार बताता है कि हर चीज़ परिवर्तनशील है चाहे वह सुख हो या दुख हो शरीर हो या परिस्थितियाँ।

सच्ची भक्ति धन और दिखावे की पूजा सोने की थाली वैभव का प्रतीक है परंतु सच्चा प्रेम और निःस्वार्थ भाव ही माँ को प्रिय है क्योंकि ईश्वर भाव देखता है वस्तु नहीं। एक पत्ता एक फूल या जल भी यदि सच्चे मन से अर्पित हो तो वही पर्याप्त है। इसी तरह भक्ति का सार निःस्वार्थ समर्पण है न कि प्रदर्शन।

साधक अपने लिए कुछ नहीं मांगता केवल दुआ की शक्ति मांगता है सबके लिए खुशी निःस्वार्थ प्रेम करुणा आशा और प्रकाश और यहीं साधक संतों की प्रार्थना है सबका मंगल हो और यही उच्च भक्ति की प्रतीक है! जहाँ मुझे क्या मिले खत्म हो जाता है, और सबका भला हो ही प्रार्थना बन जाता है। यही साधक का विस्तार है व्यक्तिगत इच्छा से सार्वभौमिक करुणा तक।

साधक अपने लिए कुछ नहीं मांगता केवल दुआ की शक्ति मांगता है सबके लिए खुशी निःस्वार्थ प्रेम करुणा आशा और प्रकाश और यहीं साधक संतों की प्रार्थना है सबका मंगल हो और यही उच्च भक्ति की प्रतीक है! जहाँ मुझे क्या मिले खत्म हो जाता है, और सबका भला हो ही प्रार्थना बन जाता है। यही साधक का विस्तार है व्यक्तिगत इच्छा से सार्वभौमिक करुणा तक।

दुःख सहकर मौन धारण कर आत्मा की परीक्षा लेते हुए मनुष्य ईश्वर के निकट पहुँचता है और यह ध्यान तप और आंतरिक जागरण का संकेत है आत्मा पर अनुशासन करना और मौन पे जीना साधना का भाव है जिसे आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना कहते है!

ध्यान का अर्थ है सजग होना अपने भीतर की गतिविधियों को देखना तप का अर्थ है अनुशासन पर वह ऐसा जो हमें कठोर नहीं बल्कि अधिक स्पष्ट और करुणामय बनाए क्योंकि दुःख सहना अपने आप में साधना नहीं है दुःख को समझना उससे सीखना और उसके बीच सजग रहना साधना है। केवल मौन धारण कर लेना भी पर्याप्त नहीं बल्कि वह मौन कैसा है क्या वह जागरूकता से भरा है या दबाव से यह अधिक महत्वपूर्ण है।

साधना का सार केवल सहन करना नहीं बल्कि रूपांतरण है जहाँ दुःख भी हमें गहराई देता है मौन भी हमें जोड़ता है और आत्मचिंतन हमें धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट शांत और करुणामय बनाता है। दुःख आए तो भागना नहीं पर उसे पकड़कर बैठ जाना भी नहीं मौन धारण हो तो भीतर जागरण के साथ न कि केवल शब्दों का अभाव क्योंकि आत्मा की परीक्षा तब होती है जब हम अंधकार में भी सजग रह पाते हैं और यही ध्यान है यही तप है जहाँ अनुशासन कठोरता नहीं बल्कि समझ बन जाता है।

जब साधक माँ का दुलारा मानते हुए पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करता है तो वह कहता है कि उसे जीवन या मृत्यु का कोई अफसोस नहीं क्योंकि वह पूरी तरह माँ का है माँ के त्याग पालन-पोषण और संघर्षों का स्मरण है। साथ ही जीवन की नश्वरता लोभ-मोह और स्वार्थ से भरे संसार का यथार्थ चित्रण है। एक पुत्र की अपनी माँ के प्रति गहन प्रेम समर्पण और श्रद्धा को व्यक्त है।

धन सफलता और वैभव अंततः साथ नहीं जाते साधक अंत में वह अपने लिए कुछ नहीं मांगता बल्कि सबके लिए सुख प्रेम करुणा और आशीर्वाद की प्रार्थना करता है माँ ही जीवन का आधार आश्रय और आध्यात्मिक शक्ति है सच्चा सुख निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण में है जो भाव व्यक्ति को कमजोर नहीं बनाता बल्कि भीतर से स्थिर करता है क्योंकि उसे एक ऐसा आधार मिल जाता है जो बदलता नहीं।

मैं माँ का दुलारा वही मेरी पहचान, उसके चरणों में ही है मेरा सारा जहान। जीवन हो या मृत्यु न कोई भय न क्लेश, जब माँ का साया हो तो कैसा ये द्वेष।, तेरे त्याग का स्मरण तेरे संघर्षों की छाँव, यही मेरी पूँजी यही मेरा गाँव। जग नश्वर लोभ-मोह का जाल बिछाए, पर माँ का प्रेम ही सच्चा मार्ग दिखाए। मैं तेरा हूँ माँ बस तेरा ही रहूँ, इसी समर्पण में जीवन का सत्य कहूँ।

धन-वैभव सब यहीं रह जाएगा अंत में खाली हाथ ही जाना है।साधक न माँगे अपने लिए कुछ बस सबका मंगल गाना है। माँ ही आधार माँ ही आश्रय वही जीवन की सच्ची शक्ति निःस्वार्थ प्रेम में जो डूबे, वही पाए सच्ची भक्ति। समर्पण में कमजोरी नहीं, यही भीतर की स्थिरता है जो बदलता नहीं कभी भीवही सच्ची समर्थता है।

टिप्पणियाँ

मेरी हृदय मेरी माँ

अहंकार और इच्छाओं का त्याग करके सच्चे समर्पण और भक्ति से ही भगवान का अनुभव और जीवन का परम आनंद प्राप्त होता है क्योंकि यह भक्ति-गीत एक साधक की भगवान के प्रति गहरी पुकार जिज्ञासा और समर्पण को दर्शाता है वह बार-बार भगवान को याद करता है और उनकी लीला को समझना चाहता है लेकिन उसे स्पष्ट अनुभव नहीं हो रहा इसलिए वह प्रश्न करता है भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि उसका अहंकार भय स्वार्थ और चिंता मिटा दें और उसे अपने प्रेम व दिव्यता में लीन कर दें वह स्वीकार करता है कि इच्छाएँ और मोह उसे भ्रमित करते हैं और सच्चे ज्ञान से दूर कर देते हैं सच्चा आनंद और शांति केवल भगवान में ही है इसलिए वह उनसे आत्म-शुद्धि और ब्रह्म में विलीन होने की प्रार्थना करता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,भगवन कैसी तेरी लीला तू दिखाता काहे ना, #Bhagawan Kaisi Teri Lila Too Dikhata Kahe Naa, Writer ✍️ #Halendra Prasad ,

यह गीत जीवन के परिवर्तन आत्मचेतना और भगवान के रहस्य को समझने की एक आध्यात्मिक खोज को व्यक्त करता है।कवि इस गीत के माध्यम से भगवान से प्रश्न करता है कि वह पागल नहीं है बल्कि जीवन और चेतना के गहरे रहस्यों को समझने की कोशिश में भटक रहा है। संसार हर पल बदलता रहता है सुख-दुःख आशा-निराशा जन्म-मरण सब आते-जाते रहते हैं। मनुष्य बाहर की दुनिया को आँखों से देखता है लेकिन असली सत्य मन आत्मा और चेतना के भीतर छिपा है। यह जीवन कोई स्थिर चीज नहीं है बल्कि लगातार बदलने वाली प्रक्रिया है। जो व्यक्ति इस परिवर्तन को स्वीकार कर लेता है और भीतर की चेतना को समझने का प्रयास करता है वही जीवन के सच्चे अर्थ को जान पाता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, भटका चेतना के सागर में ना मैं पागल भगवन, #Bhatka Chetna Ke Saagar Mein Na Main Paagal Bhagwan, Writer ✍️ #Halendra Prasad,

यह रचना बताती है कि अत्यधिक सोच और अतीत में जीना मनुष्य को उलझन में डाल देता है जबकि विश्वास संतुलन और वर्तमान में जीना जीवन को सरल बनाता है कवि अपने मन की बेचैनी यादों निर्णयहीनता और मानसिक संघर्ष को माँ के सामने व्यक्त करता है। कवि बीती हुई बातों और पुरानी यादों में इतना उलझ गया है कि उसे रातों में नींद नहीं आती और वह सही-गलत तथा जीवन के प्रश्नों में खो जाता है कवि हर बात को बहुत गहराई से सोचता है, जिसके कारण वह छोटे-छोटे निर्णय भी नहीं ले पाता। यादें उसके मन को बार-बार विचलित करती हैं और उसकी कार्यक्षमता रुक जाती है। अंत में वह अपनी माँ से मार्गदर्शन, शांति और सहारा माँगता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, बड़ी उलझन में फंसी है मेरी प्राण रे माई #Badi Uljhan Men Fanshi Hai Meri Pran Re Mai,, Writer ✍️ #Halendra Prasad ,

यह रचना गुरु-भक्ति वैराग्य और आत्मज्ञान का सुंदर संदेश देती है कि संसार का सुख क्षणिक है जबकि गुरु का ज्ञान ही सच्ची मुक्ति का मार्ग है क्योंकि यह भक्ति गीत संसार की मोह-माया, धन, रूप, आकर्षण और वासना के जाल से सावधान करता है। गीत में मोह-माया को नागिन के रूप में दर्शाया गया है जो मनुष्य को सुंदरता और लालच के माध्यम से अपने बंधन में बाँधकर दुख देती है। मोह में फँसा इंसान भीतर से टूट जाता है और जीवन का सही मार्ग खो देता है गीत का मुख्य संदेश यह है कि केवल सच्चे गुरु की शरण और उनके उपदेश ही मनुष्य को इस भ्रमजाल से मुक्त कर सकते हैं। गुरु की निर्मल वाणी, ज्ञान और कृपा आत्मा को शांति प्रदान करती है तथा जीवन को सही दिशा देती है।सीआध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,मोह माया से मुक्त करते है सुने जो कहानी, #Moh Maya Se Mukt Kayre Hai Sune Jo Kahani, Writer ✍️ #Halendra Prasad,

मृत्यु प्रकृति का अटल सत्य है, इसलिए उससे डरने के बजाय उसे शांति और परिवर्तन के रूप में स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि मृत्यु को भय नहीं बल्कि शांति, विश्राम और आत्मा की मुक्ति का माध्यम है। जैसे दिन के बाद रात आकर शरीर को आराम देती है, वैसे ही जीवन के संघर्षों और थकान के बाद मृत्यु आत्मा को शांति प्रदान करती है मृत्यु को भय नहीं बल्कि शांति, विश्राम और आत्मा की मुक्ति का माध्यम है। जैसे दिन के बाद रात आकर शरीर को आराम देती है, वैसे ही जीवन के संघर्षों और थकान के बाद मृत्यु आत्मा को शांति प्रदान करती है।मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नए मार्ग और दिव्य यात्रा की शुरुआत माना गया है। अच्छे कर्म करने वाला मनुष्य मृत्यु के बाद परमात्मा और स्वर्ग की ओर जाता है, जहाँ दुख, चिंता और पीड़ा समाप्त हो आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, क्यों कहते हो उसे डरावनी जो आती है आराम देने को, #Kyun Kehte Ho Use Daraavni Jo Aati Hai Aaraam Dene ko, Writer ✍️ #Halendra Prasad

आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल रचना,मानव और ब्रह्मांड की एकता का अनुभव, Manav Aur Brahmand Ki Ekta Ka Anubhav,

अकेलापन मन का भ्रम है आत्मा सृष्टि और परमात्मा से जुड़े होने का अनुभव ही सच्चा ज्ञान और वास्तविक शांति है क्योंकि यह गीत मानव के मन आत्मा और परमात्मा के संबंध को समझाने वाला एक आध्यात्मिक चिंतन है। कवि कहता है कि मन और दिल अक्सर अज्ञान तथा भ्रम में पड़कर स्वयं को अकेला समझ लेते हैं, जिससे दुख, भय और पीड़ा उत्पन्न होती है। जबकि वास्तविक सत्य यह है कि जीवन कभी अकेला नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक जीव, प्रत्येक तत्व और सम्पूर्ण सृष्टि एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। तन सीमित और अकेला दिखाई दे सकता है, लेकिन आत्मा शाश्वत, असीम और परम चेतना से जुड़ी हुई है। अकेलेपन की भावना वास्तव में मन की एक अवस्था है, जो अज्ञान और गलत धारणाओं से उत्पन्न होती है। जब आत्मज्ञान प्राप्त होता है, तब मन के भ्रम दूर हो जाते हैं और मानव अपने भीतर स्थित चेतना तथा ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने लगता है मेरे अनुभव में ईश्वर केवल एक निर्गुण शक्ति नहीं, बल्कि माँ के समान प्रेम, करुणा, संरक्षण और स्नेह प्रदान करने वाली शक्ति है। आत्मा के जागरण पर ईश्वर माँ बनकर मानव को अपने प्रेम का अनुभव कराता है, उसके आँसू पोंछता है और जीवन का सही मार्ग दिखाता है। मानव कभी अकेला नहीं है। आत्मा, प्रकृति, समस्त सृष्टि और परमात्मा सदैव उसके साथ हैं। सच्चा ज्ञान मनुष्य को इस सत्य का अनुभव कराता है और उसे शांति, प्रेम तथा आत्मिक आनंद की ओर ले जाता है।आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत रचना,माने बात ना हमारी करता दिल पर आघात गुरुवर, #Mane Bat Naa Hamari Karta Dil Per Aaghat Guruvar, Writer ✍️ #Halendra Prasad,

संघर्ष संतुलन और अवसर की खोज जीवन अवसर नहीं, चेतना की यात्रा, Sangharsh Santulan Aur Avasar Ki Khoj Jeevan Avasar Nahin, Chetna ki Yatra,

यह रचना बचपन की मासूमियत मातृस्नेह प्रकृति-प्रेम और जीवन की सरलता के महत्व को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है।बचपन की निष्कपट खुशी प्रकृति और माँ के स्नेह की स्मृति तथा वर्तमान जीवन की जटिलताओं के बीच खोई हुई सहजता को पुनः पाने की लालसा यह है कि इस गीत में कवि अपने बचपन की मधुर स्मृतियों को याद करते हुए वर्तमान जीवन की जटिलताओं पर चिंतन करता है। बचपन में निडर निष्कपट आनंदमय और प्रकृति के निकट था। न किसी प्रकार का संकोच था न भय न ही संसार के भेदभाव और चिंताओं का ज्ञान था। परिवार प्रकृति और माँ का स्नेह ही सम्पूर्ण संसार था। जैसे-जैसे कवि बड़ा हुआ ज्ञान जिज्ञासा और सामाजिक अनुभवों के साथ जीवन में संकोच भय चिंता और अनेक प्रकार के बंधन बढ़ते गए। बचपन की सहजता और स्वतंत्रता धीरे-धीरे दूर होती गई तथा जीवन सांसारिक उलझनों में घिर गया। लगता है कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं ने मन की सरलता और निडरता को छीन लिया है। माँ और प्रकृति की गोद में बिताए उन सुखद दिनों को पुनः पाने की आकांक्षा उत्पन्न होने लगी है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, बड़ा खुश था मैं उस दिन जिस दिन जानता ना मैं किसीको , #Bada Khush Tha Main Us Din Jis Din Jaanta Na Main Kisi ko, Writer ✍️ #Halendra Prasad

यह गीत जीवन के दर्द धोखे और अकेलेपन की भावना को व्यक्त करता है। कवि कहते हैं कि आज दुनिया दुख को नहीं समझ रही है और उसे एक तमाशा समझती है लेकिन एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब लोग उनके दर्द को समझेंगे और पछताएँगे क्योंकि जीवन में कई लोग अपने स्वार्थ और गलत सोच के कारण दूसरों का दिल तोड़ देते हैं। इंसान कई बार अपने ही लोगों से ठोकर खाकर अकेला रह जाता है। फिर भी जीवन का विश्वास है कि जीवन में नफरत नहीं बल्कि प्रेम दया और करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है। ईश्वर सब कुछ देखता है और हर व्यक्ति को उसके कर्मों का फल जरूर मिलता है। इसलिए सच्चाई और प्रेम के रास्ते पर चलना ही जीवन का सही मार्ग है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, मेरा दुःख जब देखेगा ना भूलेये दुनियां #Mera Dukh Jab Dekhegi Naa Bhooleye, ✍🏻#Write Halendra Prasad