जीवन का वास्तविक सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं बल्कि अंतरात्मा की अनुभूति प्रेम करुणा और आत्मसंतोष में है। इसलिए मनुष्य को अपने भीतर के समन्दर यानी आत्मज्ञान को देखने और समझने का प्रयास करना चाहिए। यह गीत मनुष्य को यह संदेश देती है कि बाहरी दुनिया की चकाचौंध और दिखावे में उलझने के बजाय उसे अपने हृदय और आत्मा के भीतर झांकना चाहिए क्योंकि कि सच्चा ज्ञान करुणा और शांति मनुष्य के अंदर ही मौजूद है। दुनिया की चमक-दमक अक्सर मनुष्य को प्रेम दया और सत्य से दूर कर देती है। सच्ची शक्ति में अहंकार नहीं होता बल्कि उसमें करुणा और विनम्रता होती है। जो व्यक्ति दूसरों को सुख देता है और प्रेम बांटता है वही वास्तव में आनंद और आत्मसंतोष प्राप्त करता है। दीपक की तरह महान मनुष्य स्वयं कठिनाई सहकर भी दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, #कहता दिलवा मेरा मुझसे मैं समन्दर देखूं रे, #Kahata dilva Mera Mijhase Mai Samndar Dekhu Re, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
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Writer ✍️ #Halendra Prasad
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मईया बाहर मै ना देखूं मैं तो अन्दर का वो मंजर देखूं रे
कहता दिलवा मेरा मुझसे मैं समन्दर देखूं रे
अज्ञान नहीं कमजोरी ना सब करुणा की आभा है
तेज ढका माई चुपकी में चाहत की सजा है
समझ न पाऊं तेज की बातें कैसे ढका सीने में
भेद बड़ा है राज रहस्य का आंख गड़ा है टिने में
सहज आभा प्रभाव मुझे जो दिखे है
अहंकार से भरकर मईया शक्ति बल मुझे दिखे
मईया बाहर मै ना देखूं मैं तो अन्दर का वो मंजर देखूं रे
कहता दिलवा मेरा मुझसे मैं समन्दर देखूं रे
चकाचौंध करता है वो तो दिल को दिल से दूर करे
आंखों पे बांध देता है पट्टी प्रेम को मजबूर करे
मार देता करुणा को वाण से धीरे धीरे जलता
समझ ना पाता कोई इसे तेज सीधे ना दिखता
प्रेम छाया को देख जरा तू लपेट देता है प्रेम में
धीरे धीरे मौन कराता मार देता है दिल में
बारिश जैसा बरस जाता है तपन जैसा वो तपता
शान्ति सुख को ले जाता है दुःख को ही सौंपता
मईया बाहर मै ना देखूं मैं तो अन्दर का वो मंजर देखूं रे
कहता दिलवा मेरा मुझसे मैं समन्दर देखूं रे
विरह में आशा आती है जब आँखें रह रह बोले
हृदय का बादल शान्त करता है तपन हृदय में डोले
देख जरा तू उस जीवन को जो अपने आप सुखी ना है
दूसरों को सुख देने वाला अपने आप दुखी ना है
मुग्ध हर्ष का गूढ़ कहता देख जरा तू गौर से
बाहर का उल्लास नहीं सोच जरा तू मौन से
आत्मसंतोष से उपजा है आनन्द भरे है पोरे पोर
देने में मिलने वाला सुख है खुशियां भरी पड़ी है जोर
मईया बाहर मै ना देखूं मैं तो अन्दर का वो मंजर देखूं रे
कहता दिलवा मेरा मुझसे मैं समन्दर देखूं रे
आत्मा की आवाज से मुझको एक ऐसी नुक्स मिला
देखा जब उसको मैने तो उसका दिल शुष्क मिला
श्रवशक्तिमान होते है ईश्वर फिर भी भय ना देते
ममता की छाया से ढकर तेज को रख लेते
माधव की सौंदर्य यही है राम की मर्यादा
यदि मानव नायक है तो आदर्श है भ्राता
जिसमें शक्ति होती है उसमें अहंकार नहीं होता
प्रभाव होता है उस मानव में दमन नहीं होता
मईया बाहर मै ना देखूं मैं तो अन्दर का वो मंजर देखूं रे
कहता दिलवा मेरा मुझसे मैं समन्दर देखूं रे
जिस मानव में तेज होता उस मानव में करुणा होता
दीप जलाता सभा बीच में रोशनी सबको देता
जो खुद जलता है वो किसी को नहीं जलाता
दर्द जाने वो अपने दिल से दूसरों को नहीं रुलाता
दृश्य से अधिक अनुभूति जब आत्मा में
वस्तु से आधीक भाव देता अंतरात्मा में
दिखता ना मुझे अब बाहरी बादल की छाया
हृदय मौसम को देख रहा है दिल मेरा जो भाया
मईया बाहर मै ना देखूं मैं तो अन्दर का वो मंजर देखूं रे
कहता दिलवा मेरा मुझसे मैं समन्दर देखूं रे
गीत=} #कहता दिलवा मेरा मुझसे मैं समन्दर देखूं रे
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