यह गीत मनुष्य के मन की उस स्थिति का चित्रण करती है जहाँ वह इच्छाओं, कामनाओं और भौतिक लालसाओं के भ्रम में फँसकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। चाहत और मोह में डूबकर वह सही-गलत का विवेक खो देता है और आत्मा से दूर हो जाता है। कवि बताता है कि संसार सुंदर है, परंतु मनुष्य की अतृप्त इच्छाएँ उसे भटकाती रहती हैं। दौलत, वासना और महत्वाकांक्षा के पीछे भागते-भागते वह सच्चे सुख और शांति से वंचित रह जाता है। जब मनुष्य एकांत, साधना और आत्मचिंतन की ओर मुड़ता है, तब उसे भीतर की दिव्यता और परम सत्य का अनुभव होता है। बाहरी दृष्टि भौतिक जगत को देखती है, पर आंतरिक दृष्टि ही वास्तविक सत्य को पहचानती है क्योंकि सच्चा सुख और शांति बाहरी चाहतों में नहीं, बल्कि आत्मबोध और भीतर के प्रकाश को पहचानने में है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, घिरा है चाहत के भरम में अब शरम भी ना आता, #Ghira Hai Chahat Ke Bharam Men Ab Sharam Bhi Naa Aata, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
गीत =} #घिरा है चाहत के भरम में अब शरम भी ना आता
#Ghira Hai Chahat Ke Bharam Men Ab Sharam Bhi Naa Aata
Writer ✍️ #Halendra Prasad
BLOGGER=} 🙏♥️ #मेरी_हृदय_मेरी_माँ ♥️🙏
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कैसे दिल को मैं समझाऊं कुछ समझ में ना आता
घिरा है चाहत के भरम में अब शरम भी ना आता
दुनियां संसार में कोई ऐसा मालिक ना
आंखों की चाहत पूरी मिट गई हो खाली ना
जग सुन्दर सुन्दर है सुन्दर सारा ये सृष्टि
प्राणियों के मन में भरा है ख्वाइश दृष्टि
कामना की चाहत में लोग लालसा जगाया
वासना के ईच्छा में मनोरथ को बुलाया
दौलत का दर्शन चाहे लक्ष्य को सजाकर
घूमता है जीवन भर लोग चाहत में भुलाकर
कैसे दिल को मैं समझाऊं कुछ समझ में ना आता
घिरा है चाहत के भरम में अब शरम भी ना आता
फीकी पड़ी है इच्छा सारी चाहतों के चाह में
भूल गया आत्मा को लोग ख़्वासों की आवाज में
परम सत्य को देखा जब मैं आत्मा की गहराई से
निराश ना करता तनहा जीवन दिल के दिल जुदाई से
साधना मेरी निर्जनता है आत्मा को देख पाता हूँ
जीवन का ये सत्य अवस्था जीवन को ढूंढ पाता हूँ
मन मेरा एकाग्र होता जब मैं एक दर्शन देखूं
एकांत सूनापन की रहो में मै एक सपना देखूं
सुंदर सुन्दर दिव्य दिखता मुझे आत्मा की आवाजों में
भर देता है खुशियां सारी जीवन की बहारों में
कैसे दिल को मैं समझाऊं कुछ समझ में ना आता
घिरा है चाहत के भरम में अब शरम भी ना आता
देख रहा दुनियां में जो मैं उसको ना कह पाता
हृदय हमारा बोल रहा है दिल की बात ना जाना
सुन रहा तनहा को अब मैं दुखियों की आवाज में
चहल पहल से कटकर अब तो घिर गया विषाद में
धैर्य को देखा मैंने जब आत्मा की आंखों से
दर्शन की प्रतिक्षा करता ईश्वर की यादों में
सत्य सनातन की तत्वों को ढूंढ रहा अब लोग यहां
तड़प रहा मछली के जैसा बीत गया वो जुग सारा
बाहर की खाली जगहों में भीतर एक आवाज उठी
गहन प्रतिक्षा चल रही है अंतर में एक दीप जली
कैसे दिल को मैं समझाऊं कुछ समझ में ना आता
घिरा है चाहत के भरम में अब शरम भी ना आता
तनमन के अंगों से आंख की दृष्टि कहती है
देख रहा है भौतिक जग को मन की दृष्टि गहती है
दिल मेरा कहता है अन्तर मन को देखकर
समझ लिया इस जीवन क्षमता को निरेख कर
सांसारिक दुनिया को देखना मन की एक दृष्टि है
बाहर की ये दृष्टि ना है अन्दर की ये सृष्टि है
सत्य की बातें अजीब निराली मन भी तो भरमाता है
आंखों से देखाता बाहर अंदर को बताता है
मन बुद्धि की दृष्टि से हम गहन भाव को लाते
समझ जाते है सत्य की राहें आत्मा को जगाते
कैसे दिल को मैं समझाऊं कुछ समझ में ना आता
घिरा है चाहत के भरम में अब शरम भी ना आता
गीत =} #घिरा है चाहत के भरम में अब शरम भी ना आता
#Ghira Hai Chahat Ke Bharam Men Ab Sharam Bhi Naa Aata
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