आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, साधक की हृदय पुकार: हे माँ तुम ही मेरी शक्ति अपरम्पार, Sadhak ki Hriday Pukar: He Maa Tum Hi Meri Shakti Aparampaar,
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, साधक की हृदय पुकार: हे माँ तुम ही मेरी शक्ति अपरम्पार, Sadhak ki Hriday Pukar: He Maa Tum Hi Meri Shakti Aparampaar,
साधक मानता है कि माँ ही हमारी शक्ति शांति दिशा और अंतिम सत्य हैं। जब हम टूटते है माँ हमे संभालती हैं जब वह भटकते है माँ हमे मार्ग दिखाती हैं। हमारी सबसे बड़ी इच्छा माँ के निकट आना और उनके चरणों में पूर्ण समर्पण के साथ विलीन हो जाना है। यह एक साधक की माँ दिव्य शक्ति के प्रति पूर्ण समर्पण प्रेम और भक्ति की अभिव्यक्ति है। साधक अपने दुख कमजोरियाँ और आध्यात्मिक तड़प माँ के चरणों में अर्पित करता है और उनसे केवल साहस शक्ति प्रेम कृपा और मार्गदर्शन की प्रार्थना करता है। साधक अपने लिए भौतिक सुख या संपत्ति नहीं माँगता बल्कि पूरे संसार के कल्याण की कामना करता है।
जब साधक द्वारा माँ दिव्य शक्ति से की गई हृदयपूर्ण प्रार्थना है। साधक माँ से कहता है कि हे माँ संरक्षिका दिव्य शक्ति मेरे अंदर साहस, शक्ति और भक्ति भर दो। मैं हर सुबह तुम्हें याद करता हूँ और तुम्हारे दर्शन की तड़प में लालायित रहता हूँ। जीवन के दुख और परेशानियों में तुम ही मेरा आसरा और सांत्वना हो।
हे माँ मेरा मन तुम्हें खोजता है क्योंकि तुम ही कल्याणकारी शांति और सिद्धि देने वाली वेदमाता माँ गायत्री काली दुर्गा महाकाली गौरी लक्ष्मी माँ हो हे माँ मैं खो भी जाता हूँ टूट भी जाता हूँ फिर भी मेरा सच्चा सहारा तुम ही हो हे माँ मैं सम्पूर्ण समर्पण और प्रेम व्यक्त करते हुए आपकी आराधना करता हूँ कि मैं माँ का हूँ और माँ ही मेरी शक्ति है जिसे मेरी आँखें देखने को बड़ी बेचैन है!
जब एक साधक अपनी कमजोरियों, परेशानियों, आकांक्षाओं और आध्यात्मिक तड़प को अभिव्यक्त करते हुए आत्मकरुणा से माँ दिव्य शक्ति, जगतजननी संरक्षिका को पुकारता है तो माँ की भक्ति में अपने आप को सम्पूर्ण समर्पण और प्रेम व्यक्त करते हुए माँ की आराधना करते हुए माँ से कहता है कि हे माँ सत्य स्वरूपा माँ तुम्हीं मेरी शक्ति है। जिसे मेरी आँखें देखने को बड़ी बेचैन है!
साधक अपने लिए कुछ नहीं मांगता साधक तो माँ से साहस, शक्ति प्रेम कृपा और मार्गदर्शन माँगता है। और इस सृष्टि की संचालन के लिए करने के लिए माँ से प्रार्थना करता है!
माँ की हार माँ के आशीर्वाद का प्रतीक है साधक माँ से निकटता चाहता है वह अपनी सीमाओं को जानता है माँ से कुछ मांगने का साहस भी उसमें नहीं, लेकिन फिर भी माँ की निकटता चाहता है। तब कहता हे जगत जननी माँ संरक्षिका मेरे भीतर साहस भर दे ताकि मैं तुझसे अपने मन की बात कह सकूँ।
जब साधक के हृदय में माँ जगदम्बा की भक्ति की वेदना प्रकाशित होती है, तो वह हर सुबह माँ का स्मरण करता है और उनके दर्शन की लालसा में मन को पूरी तरह डूबा देता है। जैसे गंगा में लोग डुबकी लगाकर उसके पवित्र प्रवाह का अनुभव करते हैं और उसके स्मरण से आध्यात्मिक जागृति और शांति का अनुभव प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार माँ का स्मरण साधक को पवित्रता, आध्यात्मिक चेतना और शांति का अनुभव कराता है। इसीलिए माँ को पवित्रता और आध्यात्मिक जागृति का द्योतक कहा जाता है।
माँ की यादें जब साधक को व्याकुल कर देता है तब साधक की व्याकुलता प्रत्यक्ष अनुभव और दुर्लभ यादों की वेदना से साधक के असली अवस्था तड़प और आस्था का मिलन होता है माँ यादों में आती है साधक को साधना में अपने सत्य स्वरूपा की बोध कराती है पर साधक माँ से सृष्टि की संचालन मांगता है और अपने भक्ति यादों में डूबकर माँ की स्तुति करता है!
माँ हमारे सुख-दुख की साथी है और जीवन के कष्ट भी माँ की कृपा से अर्थपूर्ण लगने लगते हैं क्योंकि साधक अनुभव करता है कि माँ अदृश्य होकर भी पास में बैठकर सांत्वना देती है और तुरंत समाधान और शांति प्रदान करती है।
जब विनम्रता की चरम अवस्था सामने आती है तो साधक स्वीकार करता है और साधक का दिन भिखारी जैसा होने पर भी साधक केवल माँ से सृष्टि का संचालन ही माँगता है मन की विवशता और माँ की कृपाएँ तथा सृष्टि की पीड़ा को मिटाने के लिए माँ से याचना कराती है!
साधक की आत्मा साधक से बार बार कहता है कि माँ ही कल्याण का स्रोत है,सफलता की जननी है,विचारों को पवित्र करने वाली शक्ति है। और माँ ही जन्मदात्री विद्यादायिनी धनदायिनी मृत्यु से बचाने वाली संजीवनी है!
जब साधक उच्च आध्यात्मिक सत्य को देखते हुए साधक स्वयं को अस्थिर अनुभव करता है जैसे आश्रयहीन पक्षी अपनी माँ को बाहरी दुनिया में नहीं बल्कि आत्मा में ढूंढने लगा है वैसे ही साधक माँ को अपनी आत्मा में ढूंढता है जिसे उच्च आध्यात्मिक सत्य भी कहते है।
साधक माँ से धन दौलत सम्पत्ति नहीं मांगता साधक तो माँ से शक्ति स्थिरता चिंता से मुक्ति और भक्ति की परिपूर्णता माँगता है और अपने को माँ की आँचल में समर्पित होने की दुआ मांगता है !
सुख, पुरस्कार, प्रेम सब माँ ही देती है माँ से बड़ा दानी इस धरती पर कोई नहीं इसलिए साधक माँ की सर्वोच्च आश्रय में विलीन हो जाना चाहता है और अपने वेदना, आस्था, तड़प और आत्मसमर्पण की अमूल्य रचना को माँ को सौंप कर हमेशा हमेशा के लिए माँ में ही समाहित हो जाना चाहता है!
इस जीवन में माँ की शक्ति की अद्भुत शक्ति ऐसी है कि जब इंसान टूटता है तो माँ उसे जोड़ती है जब इंसान खोता है तो माँ उसे दिशा देती है जब इंसान डरता है तो माँ उसे साहस देती है।जब इंसान भटकता है तो माँ उसे मार्ग दिखाती है और यही माँ और साधक के हृदय का सीधा संवाद है।
जब साधक अपनी ही कमजोरियों, दुखों, आकांक्षाओं और आध्यात्मिक तड़प को खुलकर माँ दिव्य शक्ति, जगतजननी संरक्षिका के चरणों में अर्पित करता है तो उसकी पुकार स्वयं आत्मकरुणा से भरी हुई एक प्रार्थना बन जाती है।माँ की भक्ति में वह अपने मन, प्राण और संपूर्ण अस्तित्व को अर्पित करते हुए कह उठता है!
हे माँ हे सत्यस्वरूपा तुम ही मेरी जीवन-शक्ति मेरी आधार-शक्ति मेरी अंतर्यामी ज्योति हो।हे माँ मेरी अशांत आँखें तुम्हारे दर्शन को तरस रही हैं मेरा हृदय तुम्हारे साक्षात्कार के लिए व्याकुल है।तुम्हीं मेरी रक्षा, तुम्हीं मेरा साहस, और तुम्हीं मेरा सत्य हो।
हे माँ जगतजननी साधक अपने लिए कुछ नहीं माँगता उसकी इच्छाएँ उसकी माँगें सब तुम्हारे चरणों में विलीन हो चुकी हैं वह तो केवल इतना चाहता है कि उसके अंतःकरण में तुम्हारा साहस जगे उसके कर्मों में तुम्हारी शक्ति प्रवाहित हो उसके हृदय में तुम्हारा प्रेम उमड़े उसकी बुद्धि पर तुम्हारी कृपा बरसे और उसके पथ पर तुम्हारा प्रकाश बना रहे।
हे माँ साधक तुम्हें अपने लिए नहीं बल्कि इस समस्त विश्व के कल्याण हेतु पुकारता है यह सृष्टि तुम्हारी ही लीला है हम सब तुम्हारी संताने, तुम्हारी श्वासों में पलते हैं हे जननी हे संरक्षिका इस धरा पर शांति बनी रहे करुणा बहती रहे सद्बुद्धि जागृत रहे और धर्म का प्रकाश अंधकार को मिटाता रहे इसी लिए साधक तुमसे प्रार्थना करता है।
तुम ही पालन करने वाली हो पालन पोषण हारी हो तुम ही संचालन करने वाली मार्गदर्शन हो और तुम ही वह अनंत शक्ति बल बुद्धि विवेक हो और ब्रह्मांड को संतुलित रखने वाली ब्रम्हाणी सीता गीता काली दुर्गा जन्मदात्री हो!
हे माँ साधक का बस एक ही निवेदन है उसे अपना माध्यम बना लो उसे अपने कर्तव्य का सेतु बना लो अपने चरण धुली में बिछालो ताकि वह भी इस सृष्टि की सेवा में तुम्हारी इच्छा का साधन बन सेवा कर सके मेरे प्रार्थना को स्वीकार करो माँ बल बुद्धि ज्ञान से मुझे भर दो माँ।
माँ का हार माँ के आशीर्वाद का प्रतीक है। साधक माँ के अधिक निकट आना चाहता है। वह अपनी सीमाओं को जानता है माँ से कुछ माँगने का साहस भी उसमें नहीं है; फिर भी वह माँ की निकटता का आकांक्षी है। तब वह विनम्र होकर कहता है!
जगत-जननी माँ संरक्षिका मेरे भीतर इतना साहस भर दे कि मैं तुझसे अपने मन की बात कह सकू मैं तेरे अधिक निकट आना चाहता हूँ मैं अपनी सीमाओं को जानता हूं माँ मुझमें कुछ माँगने का साहस भी तुमसे नहीं है फिर भी माँ की तेरी चरण धुली बनकर जीना चाहता हूँ माँ!
हे माँ अपनी मोतियों के पवित्रता हार की चमक से और अपने स्नेह से मेरे जीवन को आलोकित कर दे माँ मैं मन ही मन तेरे चरण पादुका तली में अपना जीवन बिताना चाहता हूँ मैं जानता हूं कि मैं अभी अपूर्ण हूँ सीमित हूँ और मेरी साधना भी अधूरी है इसी कारण से मेरे भीतर में माँ तुझसे कुछ माँगने का साहस भी नहीं जुट पाता है मुझे लगता है कि मैं तेरे सामने माँगने से अधिक योग्य तो समर्पण नहीं कर पाता हूँ फिर भी तेरी ध्यान करता हूँ!
साधक माँ से कहता है हे माँ मेरे हृदय में एक सरल मासूम-सी इच्छा उठती है माँ तेरे और करीब आने की, माँ तेरे कृपा की छाया में रहने की। अपने संकोच और झिझक को समझते हुए मैं विनम्र होकर प्रार्थना करता हूँ हे जगत-जननी माँ संरक्षिका तू अनंत करुणा की सागर है। मेरे भीतर इतना साहस भर दे कि मैं तुझसे अपने मन की बात कह सकूँ उतनी हिम्मत दे कि मैं अपनी दुर्बलताओं को स्वीकार कर सकूँ मुझे ऐसा हृदय दे कि मैं तेरी शरण में निडर होकर खड़ा रह सकूँ माँ बस तू अपने स्नेह की छाया को मेरे सिर पर बनाए रखना!
इस जीवन में माँ की शक्ति अद्भुत है। जब मनुष्य टूटता है, माँ उसे जोड़ती हैं। जब वह खोता है, माँ उसे दिशा दिखाती हैं। जब भय उसके हृदय में छा जाता है, माँ उसे साहस प्रदान करती हैं। जब वह भटकता है, माँ उसे मार्ग दिखाती हैं। यही माँ और साधक के हृदय का प्रत्यक्ष और सजीव संवाद है।
सुख हो पुरस्कार हो या प्रेम सब माँ ही प्रदान करती हैं। माँ से बड़ा दानी इस धरती पर कोई नहीं। इसी कारण साधक माँ के सर्वोच्च आश्रय में विलीन हो जाना चाहता है। वह अपनी वेदना आस्था तड़प और आत्मसमर्पण की अमूल्य अनुभूतियों को माँ के चरणों में अर्पित कर,सदा-सर्वदा माँ में ही समाहित हो जाने की आकांक्षा रखता है।
साधक माँ से धन, दौलत या सम्पत्ति नहीं मांगता। वह माँ से शक्ति स्थिरता चिंता से मुक्ति और भक्ति की पूर्णता माँगता है। साथ ही वह अपने आप को माँ के आँचल में समर्पित करने की दुआ करता है।
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