आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, प्रकृति बाल-मन और जीवन का संतुलन, Prakriti Bal-Man Aur Jeevan Ka Santulan,
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना,प्रकृति बाल-मन और जीवन का संतुलन, Prakriti Bal-Man Aur Jeevan Ka Santulan,
प्रकृति शांत सौम्य और संतुलित होती है जो मन को शांति प्रदान करती है। इसके विपरीत शिशु का मन चंचल जिज्ञासु और आकर्षण से भरा होता है जो रंग-बिरंगे खिलौनों और चमकीले रंगों की ओर अधिक आकर्षित होता है। ऐसे खिलौने उसके कल्पनाशीलता और सीखने की क्षमता को विकसित करते हैं माँ की ममता शिशु के जीवन का आधार बनती है जो उसे प्रेम सुरक्षा और भावनात्मक संतुलन देती है। प्रकृति की स्थिरता और बाल-मन की चंचलता मिलकर जीवन में संतुलन बनाते हैं इससे स्पष्ट होता है कि जीवन केवल शांति या केवल चंचलता नहीं है बल्कि दोनों के संतुलन और एकता में ही उसका वास्तविक सौंदर्य और रहस्य छिपा है प्रकृति और शिशु के मन के स्वभाव में सुंदर अंतर होता है प्रकृति में पाए जाने वाले रंग जैसे जल का नीलापन या फूलों के कोमल रंग अधिकतर हल्के सौम्य और शांत होते हैं और ये रंग मन को शांति देते हैं और संतुलन का भाव उत्पन्न करते हैं वैसे ही शिशु का स्वभाव मन को खुशी और सुख देता है!
शिशु का मन इतना चंचल और कौतूहलपूर्ण होता है कि वह सरल शांत रंगों की अपेक्षा चटकीले विविध और चमकदार रंगों की ओर अधिक आकर्षित होता है। इसलिए रंगीन खिलौने शिशु को अधिक आनंद देते हैं क्योंकि वे उसकी कल्पना जिज्ञासा और खेलने की प्रवृत्ति को जगाते हैं।
शिशु का मन स्वभाव से ही चंचल जिज्ञासु और नई-नई चीज़ों को जानने के लिए उत्सुक होता है। यही कारण है कि वह हल्के और शांत रंगों की तुलना में चटकीले विविध और चमकदार रंगों की ओर अधिक आकर्षित होता है।
रंगीन खिलौने केवल देखने में ही अच्छे नहीं लगते बल्कि वे शिशु के मानसिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तेज और विविध रंग उसकी दृष्टि को आकर्षित करते हैं उसकी एकाग्रता बढ़ाते हैं और उसे चीज़ों को पहचानने व समझने के लिए प्रेरित करते हैं। इससे उसकी कल्पनाशक्ति और जिज्ञासा दोनों विकसित होती हैं।
खिलौने शिशु के भीतर खेलने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को जागृत करता हैं जिससे वह आनंद के साथ सीखता भी है खेलाता भी है चटकीले रंग और विविधता शिशु के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि उसके संपूर्ण विकास का एक महत्वपूर्ण आधार बन जाता हैं।
प्रकृति के रंग जैसे जल का नीलापन या फूलों के हल्के कोमल रंग मन को शांति स्थिरता और संतुलन प्रदान करते हैं ये रंग धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरते हैं और एक सुकून भरा वातावरण बनाते हैं। प्रकृति का प्रभाव अधिक शांत धैर्यपूर्ण और ध्यानमय होता है।
वहीं शिशु का स्वभाव पूरी तरह जीवंत निष्कलुष और सहज आनंद से भरा होता है। उसकी हंसी उसकी मासूमियत और उसकी ऊर्जा मन में तुरंत खुशी और स्नेह भर देती है जहाँ प्रकृति हमें शांत करती है वहीं शिशु हमें प्रसन्नता और उमंग से भर देता है।
शिशु का मन इतना चंचल और कौतूहलपूर्ण होता है कि वह सरल शांत रंगों की अपेक्षा चटकीले विविध और चमकदार रंगों की ओर अधिक आकर्षित होता है। इसलिए रंगीन खिलौने शिशु को अधिक आनंद देते हैं क्योंकि वे उसकी कल्पना जिज्ञासा और खेलने की प्रवृत्ति को जगाते हैं।
प्रकृति का सौंदर्य उसकी सादगी में निहित होता है, जबकि शिशु का आनंद रंगीन और आकर्षक वस्तुओं में बसता है। यह बाल-मनोविज्ञान और प्रकृति के सहज सौंदर्य दोनों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। जैसे जल और फूल हल्के, शांत रंगों में अपनी सुंदरता बिखेरते हैं, वैसे ही शिशु का मन खिलौनों की चंचलता में रम जाता है।
प्रकृति की कोमल और सुंदर वस्तुओं में जो रंग दिखाई देते हैं वो हल्के शांत और मृदु होता हैं जो रंग गहरे या चटक नहीं होते। तब ऐसा क्यों है जबकि हम अपने शिशु को रंग-बिरंगे चटकीले खिलौने देते है जो बहुत अधिक आकर्षक होता हैं।
प्रकृति का सौंदर्य सादगी और सौम्यता में निहित है, जबकि बालक का मन स्वभाव से चंचल होता है। वह चटक, विविध और चमकीले रंगों से अधिक आकर्षित होता है। यही कारण है कि प्रकृति की शांत, संतुलित छटा और बालक की चंचल रुचि के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। इस भाव से यह भी प्रकट होता है कि बालक की दुनिया अलग होती है वह सरल प्राकृतिक सौंदर्य की अपेक्षा खेल और रंग-बिरंगी वस्तुओं में अधिक आनंद खोजता है।
प्रकृति के रंग भले ही हल्के और शांत होते हैं पर शिशु का मन रंगीन और चटकीले खिलौनों में अधिक रम जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बाल-सुलभ प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से आकर्षण और चंचलता की ओर उन्मुख होती है। यही कारण है कि शिशु को रंग-बिरंगे और चमकीले खिलौने दिए जाते हैं, जो उसे अत्यधिक आकर्षित करते हैं।
जहाँ कोमलता शांति संतुलन और सौम्यता है वहीं माया रूपी माँ का वास है पर वहीं दूसरी ओर बालक का चंचल मन रंगीन आकर्षणों की ओर खिंच जाता है यही कुदरत की फितरत है जो अचंभित करती है।
जीवन का द्वंद्व रंग रूप ध्वनि नवीनता ये सब अपनी ओर बुलाते हैं क्योंकि जैसे बालक के चंचल मन की बात उतनी ही सच्ची होती है जितनी मन स्वभाव से ही जिज्ञासु आकर्षणों की ओर खिंचने वाला और अनुभवों को खोजने वाला होता है।
समस्या तब नहीं होती जब मन आकर्षित होता है बल्कि तब होती है जब हम भटकाव में खो जाते है जब आकर्षण अनुभव से आगे बढ़कर आसक्ति बन जाता है तब बालक की तरह देखना ठीक है लेकिन अगर वह हर चीज़ को पकड़कर बैठ जाए तो थकान और उलझन पैदा होती है।
मन को पूरी तरह दबाना नहीं बल्कि उसकी चंचलता को समझकर धीरे-धीरे उसे उसी शांति की ओर ले जाना ही साधना है क्योंकि विरोधों को साथ लेकर चलने वाली शांत झील भी है और उफनती नदी भी स्थिर पर्वत भी है और उड़ता हुआ बादल भी।
हम बालक की जिज्ञासा को बनाए रखें लेकिन साथ ही साक्षी की स्थिरता भी विकसित करें यानी देखना अनुभव करना सीखना पर उसमें डूबकर अपनी दिशा खो देना जीवन के लिए सार्थक नहीं क्योंकि खो जाने पर वही रंग रूप और ध्वनि हमें भटकाते नहीं बल्कि समझ को गहरा करते हैं और तब कुदरत का अचंभा उलझन नहीं बल्कि एक सुंदर खेल जैसा लगने लगता है।
प्रकृति और माया का स्वरूप यह है कि जहां जल नीला फूल कोमल है वहां है माया का माता है क्योंकि वहाँ नीला जल और कोमल फूल शांति गहराई और सौंदर्य के प्रतीक हैं ऐसी जगह माया रूपी माँ निवास करती है जो मन को शांति देती है संयम सिखाती है संतुलन और स्थिरता प्रदान करती है।
माँ केवल जन्म देने वाली नहीं होती बल्कि वह एक ऐसी चेतना है जो जीवन को दिशा देती है। वह समानता और बराबरी का भाव सिखाती है क्योंकि उसके लिए सभी संतानों में कोई भेद नहीं होता वह भावनाओं को दबाना नहीं बल्कि उन्हें समझना और संतुलित करना सिखाती है और जहाँ दुनिया साथ छोड़ देती है वहाँ माँ एक आंतरिक शक्ति के रूप में बनी रहती है। वह कभी स्मृति बनकर कभी संस्कार बनकर और कभी अंतर्मन की आवाज़ बनकर हमें संभालती है।
प्रकृति शांत सौम्य और स्थिर है बालक का मन चंचल जिज्ञासु और बेचैन है किंतु बालक बिना पूछे बिना रुके जानना चाहता है की उसे हल्के शांत रंग नहीं बल्कि चमकीले विविध रंग आकर्षित करते हैं क्यों क्योंकि प्रकृति वास्तव में शांत सौम्य और स्थिर दिखती है पर उसके भीतर भी निरंतर परिवर्तन और सृजन चलता रहता है। उसी तरह बालक का मन चंचल जिज्ञासु और बेचैन होता है वह रुकना नहीं जानता क्योंकि उसके लिए हर चीज़ नई है !
यदि प्रकृति स्थिर होकर भी संतुलन सिखाती है तो बालक चंचल होकर भी जीवन की गति दिखाता है एक सिखाती है ठहरना दूसरा सिखाता है खोज करना हर अनुभव एक खोज है प्रकृति शांत है गहरी और स्थिर है बालक का मन लहरों सा अधीर है और वह पूछे बिना जानना चाहता है और हर रंग में जीवन पाना चाहता है जहाँ प्रकृति ठहरना सिखाती है वहीं बालक चलना सिखाता है।
जहां बाल मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति है वहाँ जिज्ञासा कौतूहल और खोज की तीव्र इच्छा होती है जैसे खिलौने और बालक का आनंद रंग-बिरंगे खिलौने बच्चे को अत्यंत प्रिय लगते हैं वे उसके मन को आनंद से भर देते हैं वहीं बच्चों को केवल खिलौने इसलिए आकर्षित नहीं करते कि वे रंग-बिरंगे होते हैं बल्कि इसलिए कि वे उनकी कल्पना को जगाते हैं। खिलौना उनके लिए सिर्फ वस्तु नहीं एक पूरी दुनिया बन जाता है।
बच्चे की वास्तविक खुशी उसके भीतर होती है उसका मुखड़ा हँसता है गाता है वह बिना कुछ माँगे सबको खुशी बाँट देता है जो स्वयं के आनंद से पूरे वातावरण को उज्ज्वल कर देता है।वहीं बालक निस्वार्थ दाता है वहीं ईश्वर का एक रूप सम्मोहन है जो जीवन को सुखमय बनाता है और बच्चे की खुशी केवल भीतर ही नहीं होती वह भीतर से बाहर बहती है और उसी प्रवाह में उसका असली सौंदर्य दिखता है।
बालक का हँसता-गाता मुखड़ा किसी प्रयास का परिणाम नहीं होता वह स्वाभाविक होता है वह बिना माँगे बिना गणना किए सहज रूप से खुशी बाँट देता है यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है निष्कपटता है न अहंकार होता है न छल-कपट न भेदभाव वह केवल अनुभव करता है और वही अनुभव बाँट देता है।
माँ ममता और बाल संसार यह है कि बालक की दुनिया उतनी ही सुंदर है जितनी उसकी कल्पना वह धन नहीं माँगता केवल प्रेम और रंगीन सुख चाहता है माँ की ममता में उसका संपूर्ण व्यक्तित्व खिल उठता है बालक का रूप टिमटिमाते तारों जैसा चमकता है फुले हुए फूलों के जैसा जगमगाता है बालक की दुनिया केवल उसकी कल्पना से सुंदर नहीं होती वह माँ की ममता और वातावरण से भी आकार लेती है।
एक ओर शांत स्थिर संतुलित प्रकृति दूसरी ओर चंचल रंगीन जिज्ञासु बाल मन दोनों ही सुंदर हैं दोनों ही इस जीवन में आवश्यक हैं पर कभी कभी मुझे यह समझ में नहीं आता की क्या यही माया है यही माँ है यही जीवन का रहस्य है ये कैसा कुदरत का फितरत है जो मुझे समझ में नही आता इस संपूर्ण सृष्टि के आधार पर माँ कि ममता बताया जाता है।
जहाँ प्रकृति शांत कोमल और संतुलित है वहीं माया रूपी माँ का वास है जो मन को शांति संयम और स्थिरता प्रदान करती है। दूसरी ओर बालक का मन चंचल जिज्ञासु और रंग-बिरंगे आकर्षणों की ओर सहज ही खिंच जाता है। खिलौने और चमकीले रंग जो आनंदित करते हैं और भीतर की निष्कलुष खुशी को प्रकट करते हैं माँ ममता प्रकृति और बाल मन के आपसी संबंध को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते है।
माँ की ममता में बालक का संपूर्ण व्यक्तित्व खिल उठता है। वह स्वयं प्रसन्न रहकर दूसरों को भी आनंद देता है यह स्थिति किसी विरोधाभास की तरह नहीं बल्कि जीवन और प्रकृति की उस सुंदर फितरत को प्रकट करती है जहाँ भिन्न दिखने वाले तत्व भी मिलकर एक संतुलन रचते है इसी संतुलन के कारण जीवन रहस्यपूर्ण और अद्भुत प्रतीत होता है कभी शांत प्रकृति के रूप में तो कभी चंचल बाल मन के रूप में।
जीवन का रहस्य शायद यही है कि ये सब अलग-अलग दिखते हैं पर भीतर से एक ही सूत्र में बंधे हैं एक ओर प्रकृति की शांति दूसरी ओर बाल मन की चंचलता दोनों विरोध नहीं एक ही सत्य के दो रूप हैं माया वह रंग है जो इन्हें जोड़ती है और माँ वह आधार है जिसमें यह सारा खेल घटित होता है शायद जीवन का रहस्य समझने में नहीं उसे अनुभव करने में छिपा है।
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