आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, प्रकृति बाल-मन और जीवन का संतुलन, Prakriti Bal-Man Aur Jeevan Ka Santulan,

आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना,प्रकृति बाल-मन और जीवन का संतुलन, Prakriti Bal-Man Aur Jeevan Ka Santulan,

प्रकृति शांत सौम्य और संतुलित होती है जो मन को शांति प्रदान करती है। इसके विपरीत शिशु का मन चंचल जिज्ञासु और आकर्षण से भरा होता है जो रंग-बिरंगे खिलौनों और चमकीले रंगों की ओर अधिक आकर्षित होता है। ऐसे खिलौने उसके कल्पनाशीलता और सीखने की क्षमता को विकसित करते हैं माँ की ममता शिशु के जीवन का आधार बनती है जो उसे प्रेम सुरक्षा और भावनात्मक संतुलन देती है। प्रकृति की स्थिरता और बाल-मन की चंचलता मिलकर जीवन में संतुलन बनाते हैं इससे स्पष्ट होता है कि जीवन केवल शांति या केवल चंचलता नहीं है बल्कि दोनों के संतुलन और एकता में ही उसका वास्तविक सौंदर्य और रहस्य छिपा है प्रकृति और शिशु के मन के स्वभाव में सुंदर अंतर होता है प्रकृति में पाए जाने वाले रंग जैसे जल का नीलापन या फूलों के कोमल रंग अधिकतर हल्के सौम्य और शांत होते हैं और ये रंग मन को शांति देते हैं और संतुलन का भाव उत्पन्न करते हैं वैसे ही शिशु का स्वभाव मन को खुशी और सुख देता है!

शिशु का मन इतना चंचल और कौतूहलपूर्ण होता है कि वह सरल शांत रंगों की अपेक्षा चटकीले विविध और चमकदार रंगों की ओर अधिक आकर्षित होता है। इसलिए रंगीन खिलौने शिशु को अधिक आनंद देते हैं क्योंकि वे उसकी कल्पना जिज्ञासा और खेलने की प्रवृत्ति को जगाते हैं। 

शिशु का मन स्वभाव से ही चंचल जिज्ञासु और नई-नई चीज़ों को जानने के लिए उत्सुक होता है। यही कारण है कि वह हल्के और शांत रंगों की तुलना में चटकीले विविध और चमकदार रंगों की ओर अधिक आकर्षित होता है।

रंगीन खिलौने केवल देखने में ही अच्छे नहीं लगते बल्कि वे शिशु के मानसिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तेज और विविध रंग उसकी दृष्टि को आकर्षित करते हैं उसकी एकाग्रता बढ़ाते हैं और उसे चीज़ों को पहचानने व समझने के लिए प्रेरित करते हैं। इससे उसकी कल्पनाशक्ति और जिज्ञासा दोनों विकसित होती हैं।

खिलौने शिशु के भीतर खेलने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को जागृत करता हैं जिससे वह आनंद के साथ सीखता भी है खेलाता भी है चटकीले रंग और विविधता शिशु के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि उसके संपूर्ण विकास का एक महत्वपूर्ण आधार बन जाता हैं।

प्रकृति के रंग जैसे जल का नीलापन या फूलों के हल्के कोमल रंग मन को शांति स्थिरता और संतुलन प्रदान करते हैं ये रंग धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरते हैं और एक सुकून भरा वातावरण बनाते हैं। प्रकृति का प्रभाव अधिक शांत धैर्यपूर्ण और ध्यानमय होता है।

वहीं शिशु का स्वभाव पूरी तरह जीवंत निष्कलुष और सहज आनंद से भरा होता है। उसकी हंसी उसकी मासूमियत और उसकी ऊर्जा मन में तुरंत खुशी और स्नेह भर देती है जहाँ प्रकृति हमें शांत करती है वहीं शिशु हमें प्रसन्नता और उमंग से भर देता है।

शिशु का मन इतना चंचल और कौतूहलपूर्ण होता है कि वह सरल शांत रंगों की अपेक्षा चटकीले विविध और चमकदार रंगों की ओर अधिक आकर्षित होता है। इसलिए रंगीन खिलौने शिशु को अधिक आनंद देते हैं क्योंकि वे उसकी कल्पना जिज्ञासा और खेलने की प्रवृत्ति को जगाते हैं।

प्रकृति का सौंदर्य उसकी सादगी में निहित होता है, जबकि शिशु का आनंद रंगीन और आकर्षक वस्तुओं में बसता है। यह बाल-मनोविज्ञान और प्रकृति के सहज सौंदर्य दोनों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। जैसे जल और फूल हल्के, शांत रंगों में अपनी सुंदरता बिखेरते हैं, वैसे ही शिशु का मन खिलौनों की चंचलता में रम जाता है।

 प्रकृति की कोमल और सुंदर वस्तुओं में जो रंग दिखाई देते हैं वो हल्के शांत और मृदु होता हैं जो रंग गहरे या चटक नहीं होते। तब ऐसा क्यों है जबकि हम अपने शिशु को रंग-बिरंगे चटकीले खिलौने देते है जो बहुत अधिक आकर्षक होता हैं।

प्रकृति का सौंदर्य सादगी और सौम्यता में निहित है, जबकि बालक का मन स्वभाव से चंचल होता है। वह चटक, विविध और चमकीले रंगों से अधिक आकर्षित होता है। यही कारण है कि प्रकृति की शांत, संतुलित छटा और बालक की चंचल रुचि के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। इस भाव से यह भी प्रकट होता है कि बालक की दुनिया अलग होती है वह सरल प्राकृतिक सौंदर्य की अपेक्षा खेल और रंग-बिरंगी वस्तुओं में अधिक आनंद खोजता है।

प्रकृति के रंग भले ही हल्के और शांत होते हैं पर शिशु का मन रंगीन और चटकीले खिलौनों में अधिक रम जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बाल-सुलभ प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से आकर्षण और चंचलता की ओर उन्मुख होती है। यही कारण है कि शिशु को रंग-बिरंगे और चमकीले खिलौने दिए जाते हैं, जो उसे अत्यधिक आकर्षित करते हैं।

जहाँ कोमलता शांति संतुलन और सौम्यता है वहीं माया रूपी माँ का वास है पर वहीं दूसरी ओर बालक का चंचल मन रंगीन आकर्षणों की ओर खिंच जाता है यही कुदरत की फितरत है जो अचंभित करती है।

जीवन का द्वंद्व रंग रूप ध्वनि नवीनता ये सब अपनी ओर बुलाते हैं क्योंकि जैसे बालक के चंचल मन की बात उतनी ही सच्ची होती है जितनी मन स्वभाव से ही जिज्ञासु आकर्षणों की ओर खिंचने वाला और अनुभवों को खोजने वाला होता है।

समस्या तब नहीं होती जब मन आकर्षित होता है बल्कि तब होती है जब हम भटकाव में खो जाते है जब आकर्षण अनुभव से आगे बढ़कर आसक्ति बन जाता है तब बालक की तरह देखना ठीक है लेकिन अगर वह हर चीज़ को पकड़कर बैठ जाए तो थकान और उलझन पैदा होती है।

मन को पूरी तरह दबाना नहीं बल्कि उसकी चंचलता को समझकर धीरे-धीरे उसे उसी शांति की ओर ले जाना ही साधना है क्योंकि विरोधों को साथ लेकर चलने वाली शांत झील भी है और उफनती नदी भी स्थिर पर्वत भी है और उड़ता हुआ बादल भी।

हम बालक की जिज्ञासा को बनाए रखें लेकिन साथ ही साक्षी की स्थिरता भी विकसित करें यानी देखना अनुभव करना सीखना पर उसमें डूबकर अपनी दिशा खो देना जीवन के लिए सार्थक नहीं क्योंकि खो जाने पर वही रंग रूप और ध्वनि हमें भटकाते नहीं बल्कि समझ को गहरा करते हैं और तब कुदरत का अचंभा उलझन नहीं बल्कि एक सुंदर खेल जैसा लगने लगता है।

 प्रकृति और माया का स्वरूप यह है कि जहां जल नीला फूल कोमल है वहां है माया का माता है क्योंकि वहाँ नीला जल और कोमल फूल शांति गहराई और सौंदर्य के प्रतीक हैं ऐसी जगह माया रूपी माँ निवास करती है जो मन को शांति देती है संयम सिखाती है संतुलन और स्थिरता प्रदान करती है।

माँ केवल जन्म देने वाली नहीं होती बल्कि वह एक ऐसी चेतना है जो जीवन को दिशा देती है। वह समानता और बराबरी का भाव सिखाती है क्योंकि उसके लिए सभी संतानों में कोई भेद नहीं होता वह भावनाओं को दबाना नहीं बल्कि उन्हें समझना और संतुलित करना सिखाती है और जहाँ दुनिया साथ छोड़ देती है वहाँ माँ एक आंतरिक शक्ति के रूप में बनी रहती है। वह कभी स्मृति बनकर कभी संस्कार बनकर और कभी अंतर्मन की आवाज़ बनकर हमें संभालती है।

प्रकृति शांत सौम्य और स्थिर है बालक का मन चंचल जिज्ञासु और बेचैन है किंतु बालक बिना पूछे बिना रुके जानना चाहता है की उसे हल्के शांत रंग नहीं बल्कि चमकीले विविध रंग आकर्षित करते हैं क्यों क्योंकि प्रकृति वास्तव में शांत सौम्य और स्थिर दिखती है पर उसके भीतर भी निरंतर परिवर्तन और सृजन चलता रहता है। उसी तरह बालक का मन चंचल जिज्ञासु और बेचैन होता है वह रुकना नहीं जानता क्योंकि उसके लिए हर चीज़ नई है !

यदि प्रकृति स्थिर होकर भी संतुलन सिखाती है तो बालक चंचल होकर भी जीवन की गति दिखाता है एक सिखाती है ठहरना दूसरा सिखाता है खोज करना हर अनुभव एक खोज है प्रकृति शांत है गहरी और स्थिर है बालक का मन लहरों सा अधीर है और वह पूछे बिना जानना चाहता है और हर रंग में जीवन पाना चाहता है जहाँ प्रकृति ठहरना सिखाती है वहीं बालक चलना सिखाता है।

जहां बाल मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति है वहाँ जिज्ञासा कौतूहल और खोज की तीव्र इच्छा होती है जैसे खिलौने और बालक का आनंद रंग-बिरंगे खिलौने बच्चे को अत्यंत प्रिय लगते हैं वे उसके मन को आनंद से भर देते हैं वहीं बच्चों को केवल खिलौने इसलिए आकर्षित नहीं करते कि वे रंग-बिरंगे होते हैं बल्कि इसलिए कि वे उनकी कल्पना को जगाते हैं। खिलौना उनके लिए सिर्फ वस्तु नहीं एक पूरी दुनिया बन जाता है।

बच्चे की वास्तविक खुशी उसके भीतर होती है उसका मुखड़ा हँसता है गाता है वह बिना कुछ माँगे सबको खुशी बाँट देता है जो स्वयं के आनंद से पूरे वातावरण को उज्ज्वल कर देता है।वहीं बालक निस्वार्थ दाता है वहीं ईश्वर का एक रूप सम्मोहन है जो जीवन को सुखमय बनाता है और बच्चे की खुशी केवल भीतर ही नहीं होती वह भीतर से बाहर बहती है और उसी प्रवाह में उसका असली सौंदर्य दिखता है।

बालक का हँसता-गाता मुखड़ा किसी प्रयास का परिणाम नहीं होता वह स्वाभाविक होता है वह बिना माँगे बिना गणना किए सहज रूप से खुशी बाँट देता है यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है निष्कपटता है न अहंकार होता है न छल-कपट न भेदभाव वह केवल अनुभव करता है और वही अनुभव बाँट देता है।

 माँ ममता और बाल संसार यह है कि बालक की दुनिया उतनी ही सुंदर है जितनी उसकी कल्पना वह धन नहीं माँगता केवल प्रेम और रंगीन सुख चाहता है माँ की ममता में उसका संपूर्ण व्यक्तित्व खिल उठता है बालक का रूप टिमटिमाते तारों जैसा चमकता है फुले हुए फूलों के जैसा जगमगाता है बालक की दुनिया केवल उसकी कल्पना से सुंदर नहीं होती वह माँ की ममता और वातावरण से भी आकार लेती है।

एक ओर शांत स्थिर संतुलित प्रकृति दूसरी ओर चंचल रंगीन जिज्ञासु बाल मन दोनों ही सुंदर हैं दोनों ही इस जीवन में आवश्यक हैं पर कभी कभी मुझे यह समझ में नहीं आता की क्या यही माया है यही माँ है यही जीवन का रहस्य है ये कैसा कुदरत का फितरत है जो मुझे समझ में नही आता इस संपूर्ण सृष्टि के आधार पर माँ कि ममता बताया जाता है।

जहाँ प्रकृति शांत कोमल और संतुलित है वहीं माया रूपी माँ का वास है जो मन को शांति संयम और स्थिरता प्रदान करती है। दूसरी ओर बालक का मन चंचल जिज्ञासु और रंग-बिरंगे आकर्षणों की ओर सहज ही खिंच जाता है। खिलौने और चमकीले रंग जो आनंदित करते हैं और भीतर की निष्कलुष खुशी को प्रकट करते हैं माँ ममता प्रकृति और बाल मन के आपसी संबंध को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते है।

माँ की ममता में बालक का संपूर्ण व्यक्तित्व खिल उठता है। वह स्वयं प्रसन्न रहकर दूसरों को भी आनंद देता है यह स्थिति किसी विरोधाभास की तरह नहीं बल्कि जीवन और प्रकृति की उस सुंदर फितरत को प्रकट करती है जहाँ भिन्न दिखने वाले तत्व भी मिलकर एक संतुलन रचते है इसी संतुलन के कारण जीवन रहस्यपूर्ण और अद्भुत प्रतीत होता है कभी शांत प्रकृति के रूप में तो कभी चंचल बाल मन के रूप में।

जीवन का रहस्य शायद यही है कि ये सब अलग-अलग दिखते हैं पर भीतर से एक ही सूत्र में बंधे हैं एक ओर प्रकृति की शांति दूसरी ओर बाल मन की चंचलता दोनों विरोध नहीं एक ही सत्य के दो रूप हैं माया वह रंग है जो इन्हें जोड़ती है और माँ वह आधार है जिसमें यह सारा खेल घटित होता है शायद जीवन का रहस्य समझने में नहीं उसे अनुभव करने में छिपा है।

टिप्पणियाँ

मेरी हृदय मेरी माँ

अहंकार और इच्छाओं का त्याग करके सच्चे समर्पण और भक्ति से ही भगवान का अनुभव और जीवन का परम आनंद प्राप्त होता है क्योंकि यह भक्ति-गीत एक साधक की भगवान के प्रति गहरी पुकार जिज्ञासा और समर्पण को दर्शाता है वह बार-बार भगवान को याद करता है और उनकी लीला को समझना चाहता है लेकिन उसे स्पष्ट अनुभव नहीं हो रहा इसलिए वह प्रश्न करता है भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि उसका अहंकार भय स्वार्थ और चिंता मिटा दें और उसे अपने प्रेम व दिव्यता में लीन कर दें वह स्वीकार करता है कि इच्छाएँ और मोह उसे भ्रमित करते हैं और सच्चे ज्ञान से दूर कर देते हैं सच्चा आनंद और शांति केवल भगवान में ही है इसलिए वह उनसे आत्म-शुद्धि और ब्रह्म में विलीन होने की प्रार्थना करता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,भगवन कैसी तेरी लीला तू दिखाता काहे ना, #Bhagawan Kaisi Teri Lila Too Dikhata Kahe Naa, Writer ✍️ #Halendra Prasad ,

यह गीत जीवन के परिवर्तन आत्मचेतना और भगवान के रहस्य को समझने की एक आध्यात्मिक खोज को व्यक्त करता है।कवि इस गीत के माध्यम से भगवान से प्रश्न करता है कि वह पागल नहीं है बल्कि जीवन और चेतना के गहरे रहस्यों को समझने की कोशिश में भटक रहा है। संसार हर पल बदलता रहता है सुख-दुःख आशा-निराशा जन्म-मरण सब आते-जाते रहते हैं। मनुष्य बाहर की दुनिया को आँखों से देखता है लेकिन असली सत्य मन आत्मा और चेतना के भीतर छिपा है। यह जीवन कोई स्थिर चीज नहीं है बल्कि लगातार बदलने वाली प्रक्रिया है। जो व्यक्ति इस परिवर्तन को स्वीकार कर लेता है और भीतर की चेतना को समझने का प्रयास करता है वही जीवन के सच्चे अर्थ को जान पाता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, भटका चेतना के सागर में ना मैं पागल भगवन, #Bhatka Chetna Ke Saagar Mein Na Main Paagal Bhagwan, Writer ✍️ #Halendra Prasad,

यह रचना बताती है कि अत्यधिक सोच और अतीत में जीना मनुष्य को उलझन में डाल देता है जबकि विश्वास संतुलन और वर्तमान में जीना जीवन को सरल बनाता है कवि अपने मन की बेचैनी यादों निर्णयहीनता और मानसिक संघर्ष को माँ के सामने व्यक्त करता है। कवि बीती हुई बातों और पुरानी यादों में इतना उलझ गया है कि उसे रातों में नींद नहीं आती और वह सही-गलत तथा जीवन के प्रश्नों में खो जाता है कवि हर बात को बहुत गहराई से सोचता है, जिसके कारण वह छोटे-छोटे निर्णय भी नहीं ले पाता। यादें उसके मन को बार-बार विचलित करती हैं और उसकी कार्यक्षमता रुक जाती है। अंत में वह अपनी माँ से मार्गदर्शन, शांति और सहारा माँगता है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, बड़ी उलझन में फंसी है मेरी प्राण रे माई #Badi Uljhan Men Fanshi Hai Meri Pran Re Mai,, Writer ✍️ #Halendra Prasad ,

यह रचना गुरु-भक्ति वैराग्य और आत्मज्ञान का सुंदर संदेश देती है कि संसार का सुख क्षणिक है जबकि गुरु का ज्ञान ही सच्ची मुक्ति का मार्ग है क्योंकि यह भक्ति गीत संसार की मोह-माया, धन, रूप, आकर्षण और वासना के जाल से सावधान करता है। गीत में मोह-माया को नागिन के रूप में दर्शाया गया है जो मनुष्य को सुंदरता और लालच के माध्यम से अपने बंधन में बाँधकर दुख देती है। मोह में फँसा इंसान भीतर से टूट जाता है और जीवन का सही मार्ग खो देता है गीत का मुख्य संदेश यह है कि केवल सच्चे गुरु की शरण और उनके उपदेश ही मनुष्य को इस भ्रमजाल से मुक्त कर सकते हैं। गुरु की निर्मल वाणी, ज्ञान और कृपा आत्मा को शांति प्रदान करती है तथा जीवन को सही दिशा देती है।सीआध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,मोह माया से मुक्त करते है सुने जो कहानी, #Moh Maya Se Mukt Kayre Hai Sune Jo Kahani, Writer ✍️ #Halendra Prasad,

मृत्यु प्रकृति का अटल सत्य है, इसलिए उससे डरने के बजाय उसे शांति और परिवर्तन के रूप में स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि मृत्यु को भय नहीं बल्कि शांति, विश्राम और आत्मा की मुक्ति का माध्यम है। जैसे दिन के बाद रात आकर शरीर को आराम देती है, वैसे ही जीवन के संघर्षों और थकान के बाद मृत्यु आत्मा को शांति प्रदान करती है मृत्यु को भय नहीं बल्कि शांति, विश्राम और आत्मा की मुक्ति का माध्यम है। जैसे दिन के बाद रात आकर शरीर को आराम देती है, वैसे ही जीवन के संघर्षों और थकान के बाद मृत्यु आत्मा को शांति प्रदान करती है।मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नए मार्ग और दिव्य यात्रा की शुरुआत माना गया है। अच्छे कर्म करने वाला मनुष्य मृत्यु के बाद परमात्मा और स्वर्ग की ओर जाता है, जहाँ दुख, चिंता और पीड़ा समाप्त हो आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, क्यों कहते हो उसे डरावनी जो आती है आराम देने को, #Kyun Kehte Ho Use Daraavni Jo Aati Hai Aaraam Dene ko, Writer ✍️ #Halendra Prasad

आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल रचना,मानव और ब्रह्मांड की एकता का अनुभव, Manav Aur Brahmand Ki Ekta Ka Anubhav,

अकेलापन मन का भ्रम है आत्मा सृष्टि और परमात्मा से जुड़े होने का अनुभव ही सच्चा ज्ञान और वास्तविक शांति है क्योंकि यह गीत मानव के मन आत्मा और परमात्मा के संबंध को समझाने वाला एक आध्यात्मिक चिंतन है। कवि कहता है कि मन और दिल अक्सर अज्ञान तथा भ्रम में पड़कर स्वयं को अकेला समझ लेते हैं, जिससे दुख, भय और पीड़ा उत्पन्न होती है। जबकि वास्तविक सत्य यह है कि जीवन कभी अकेला नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक जीव, प्रत्येक तत्व और सम्पूर्ण सृष्टि एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। तन सीमित और अकेला दिखाई दे सकता है, लेकिन आत्मा शाश्वत, असीम और परम चेतना से जुड़ी हुई है। अकेलेपन की भावना वास्तव में मन की एक अवस्था है, जो अज्ञान और गलत धारणाओं से उत्पन्न होती है। जब आत्मज्ञान प्राप्त होता है, तब मन के भ्रम दूर हो जाते हैं और मानव अपने भीतर स्थित चेतना तथा ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने लगता है मेरे अनुभव में ईश्वर केवल एक निर्गुण शक्ति नहीं, बल्कि माँ के समान प्रेम, करुणा, संरक्षण और स्नेह प्रदान करने वाली शक्ति है। आत्मा के जागरण पर ईश्वर माँ बनकर मानव को अपने प्रेम का अनुभव कराता है, उसके आँसू पोंछता है और जीवन का सही मार्ग दिखाता है। मानव कभी अकेला नहीं है। आत्मा, प्रकृति, समस्त सृष्टि और परमात्मा सदैव उसके साथ हैं। सच्चा ज्ञान मनुष्य को इस सत्य का अनुभव कराता है और उसे शांति, प्रेम तथा आत्मिक आनंद की ओर ले जाता है।आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत रचना,माने बात ना हमारी करता दिल पर आघात गुरुवर, #Mane Bat Naa Hamari Karta Dil Per Aaghat Guruvar, Writer ✍️ #Halendra Prasad,

संघर्ष संतुलन और अवसर की खोज जीवन अवसर नहीं, चेतना की यात्रा, Sangharsh Santulan Aur Avasar Ki Khoj Jeevan Avasar Nahin, Chetna ki Yatra,

यह रचना बचपन की मासूमियत मातृस्नेह प्रकृति-प्रेम और जीवन की सरलता के महत्व को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है।बचपन की निष्कपट खुशी प्रकृति और माँ के स्नेह की स्मृति तथा वर्तमान जीवन की जटिलताओं के बीच खोई हुई सहजता को पुनः पाने की लालसा यह है कि इस गीत में कवि अपने बचपन की मधुर स्मृतियों को याद करते हुए वर्तमान जीवन की जटिलताओं पर चिंतन करता है। बचपन में निडर निष्कपट आनंदमय और प्रकृति के निकट था। न किसी प्रकार का संकोच था न भय न ही संसार के भेदभाव और चिंताओं का ज्ञान था। परिवार प्रकृति और माँ का स्नेह ही सम्पूर्ण संसार था। जैसे-जैसे कवि बड़ा हुआ ज्ञान जिज्ञासा और सामाजिक अनुभवों के साथ जीवन में संकोच भय चिंता और अनेक प्रकार के बंधन बढ़ते गए। बचपन की सहजता और स्वतंत्रता धीरे-धीरे दूर होती गई तथा जीवन सांसारिक उलझनों में घिर गया। लगता है कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं ने मन की सरलता और निडरता को छीन लिया है। माँ और प्रकृति की गोद में बिताए उन सुखद दिनों को पुनः पाने की आकांक्षा उत्पन्न होने लगी है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, बड़ा खुश था मैं उस दिन जिस दिन जानता ना मैं किसीको , #Bada Khush Tha Main Us Din Jis Din Jaanta Na Main Kisi ko, Writer ✍️ #Halendra Prasad

यह गीत जीवन के दर्द धोखे और अकेलेपन की भावना को व्यक्त करता है। कवि कहते हैं कि आज दुनिया दुख को नहीं समझ रही है और उसे एक तमाशा समझती है लेकिन एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब लोग उनके दर्द को समझेंगे और पछताएँगे क्योंकि जीवन में कई लोग अपने स्वार्थ और गलत सोच के कारण दूसरों का दिल तोड़ देते हैं। इंसान कई बार अपने ही लोगों से ठोकर खाकर अकेला रह जाता है। फिर भी जीवन का विश्वास है कि जीवन में नफरत नहीं बल्कि प्रेम दया और करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है। ईश्वर सब कुछ देखता है और हर व्यक्ति को उसके कर्मों का फल जरूर मिलता है। इसलिए सच्चाई और प्रेम के रास्ते पर चलना ही जीवन का सही मार्ग है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, मेरा दुःख जब देखेगा ना भूलेये दुनियां #Mera Dukh Jab Dekhegi Naa Bhooleye, ✍🏻#Write Halendra Prasad