आध्यात्मिक दार्शनिक भक्ति अमूल्य रचना, पत्थर जैसी खामोशी, सागर जैसी ममता, Patthar Jaisi Khamoshi, Sagar Jaisi Mamta,
आध्यात्मिक दार्शनिक भक्ति अमूल्य रचना, पत्थर जैसी खामोशी, सागर जैसी ममता, Patthar Jaisi Khamoshi, Sagar Jaisi Mamta,
यह पाठ माँ के मौन त्याग निस्वार्थ प्रेम और आध्यात्मिक शक्ति को एक गहन भावपूर्ण और जीवनदर्शन के रूप में प्रस्तुत करता है। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन में असली सुरक्षा, अपनापन और प्रेम माँ के सान्निध्य और उसके मौन में ही पाया जा सकता है!
यह जीवन जब माँ की मौन प्रेम और संतान की गहरी पीड़ा को व्यक्त करता है तब माँ को चुपचाप खड़ी हुई पत्थर-सी मानता है, पर यह चुप्पी कठोरता नहीं बल्कि त्याग, सहनशीलता और ममता का प्रतीक है।
जब संतान पीड़ा में होती है तो माँ अक्सर शब्दों से नहीं बल्कि अपने मौन अपनी उपस्थिति और अपने स्नेह से सहारा देती है। यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है बस उसे समझने के लिए संवेदनशील दिल चाहिए क्योंकि माँ का चुप रहना पत्थर बन जाना नहीं है बल्कि वह एक ऐसी शक्ति है जो अपने दर्द चिंता और संघर्ष को अपने भीतर समेटकर संतान को संभालती है। उसका मौन त्याग का रूप है सहनशीलता की पराकाष्ठा है और सबसे बढ़कर निस्वार्थ ममता की अभिव्यक्ति है।
यह जीवन माँ से धन सुख या वैभव नहीं चाहता यह जीवन माँ से केवल माँ का प्रेम और सान्निध्य चाहता है आज के समाज की कठोर सच्चाई यह है कि जहाँ स्वार्थ अहंकार और लोभ ने मानवीय संबंधों को कमजोर कर दिया है और नारी नर का सम्मान खोता जा रहा है इस पीड़ादायक संसार से थककर मन माँ की शरण चाहता है और अब स्वयं को माँ की दासी मानता है।
स्वयं को माँ की दासी मानना भी एक तरह का समर्पण है अहंकार से मुक्ति और प्रेम में पूर्ण विश्वास का प्रतीक है इसमें एक आध्यात्मिक गहराई भी है जहाँ व्यक्ति अपने सारे दुख थकान और अपेक्षाएँ माँ के चरणों में छोड़ देता है और फिर इसे अंतर्रात्मा की खुशी प्राप्त होती है!
जब मन संसार की कठोरता से थक जाता है तब वह स्वाभाविक रूप से ऐसी जगह ढूँढता है जहाँ बिना शर्त अपनापन मिले और माँ से बढ़कर वह स्थान कोई नहीं होता क्योंकि रिश्तों में स्वार्थ अहंकार और अपेक्षाएँ बढ़ गई हैं जिससे मन को सच्चा अपनापन कम ही महसूस होता है। ऐसे में माँ का भाव सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक शरण एक सुरक्षा और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक बन जाता है।
माँ की चुप्पी भी प्रेम और संरक्षण का रूप बन जाती है जब माँ के निस्वार्थ प्रेम नारी शक्ति और संतान की आत्मिक पुकार का भावपूर्ण चित्रण का प्रेम बोलता है क्योंकि भक्त माँ से धन दौलत या वैभव नहीं चाहता भक्त तो माँ से केवल प्रेम और सान्निध्य चाहता है।
माँ के चरणों में ही शांति है माँ के आँचल में ही संसार है जहाँ प्रेम ही धर्म बन जाता है और समर्पण ही सच्चा उपहार बन जाता है वह भक्त को न धन की चाह है न वैभव का कोई अभिमान उसे तो बस माँ चाहिए उसका स्नेह उसका सान्निध्य उसका ध्यान।
जब संसार के कोलाहल में मन टूटकर बिखर जाता है तब माँ की निःशब्द गोद सब दर्द समेट लेती है निस्वार्थ प्रेम की वह ज्योति, नारी शक्ति का वह स्वरूप संतान की आत्मिक पुकार में स्वयं उत्तर बनकर उतरती है और अपने गोद में समेट कर सारी उलझनों को मिटा देती!
माँ केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि ममता शक्ति प्रकृति नारी और जीवन की आधारशिला का प्रतीक है जो माँ खड़ी है चुपचाप पत्थर के जैसा उस माँ से प्यार कैसे पाया जा सकता है पर ममता के बीच के मौन संवाद को व्यक्त किया जा सकता है!
माँ सच में केवल व्यक्ति नहीं एक ऊर्जा है ममता शक्ति और अस्तित्व का आधार माँ का प्रेम हमेशा होता है बस उसे समझने के लिए दिल को थोड़ा शांत और संवेदनशील बनाना पड़ता है।
माँ कुछ नहीं कहती फिर भी सब कह जाती है माँ की खामोशी में ही ममता की धारा बह जाती है पत्थर-सी दिखती है बाहर से पर भीतर सागर समाए रहती है जिसने मौन को पढ़ना सीख लिया उसने ही माँ को सच में पाए है।
माँ की चुप्पी कठोरता नहीं बल्कि त्याग सहनशीलता अनकहा प्रेम और अनदेखा बलिदान का प्रतीक है तड़पता हुआ भक्त मौन माँ से हृदय प्रेम पा सकता है माँ के प्रेम को हृदय में महसूस किया जा सकता है माँ का प्रेम और प्रेम पहचान जानने की उत्सुकता धन सुख-सुविधा और वैभव का लोभ हृदय से मिटा देता है मानव का निर्मल भाव धन दौलत वैभव नहीं मांगता बल्कि माँ का छाया मांगता है!
सच्चा मानव जब समाज और संसार पर करुणा की दृष्टि से समाज का कठोर यथार्थ को दिखाता है तो अहंकार में डूबा पुरुष समाज नारी का अपमान टूटते लोग स्वार्थ से जलता जीवन किसी बाजार की मोल भाव के बीच ये संसार झूला झूल रहा है जिसकी रस्सियां इतनी कमजोर हो गई है कि कभी भी टूट सकती है!
इस दुनिया में टूटती हुई डोर को देखकर जब सच्चा मानव करुणा की दृष्टि से देखता है तो संसार उसे हर ओर एक मौन चीख सुनाई देती है क्योंकि टूटते हुए लोग स्वार्थ की अग्नि में जलता जीवन का हर चेहरा मुस्कान ओढ़े है पर भीतर गहरा शून्य पलता है!
सबको पता है ये जीवन मिट्टी से बना हैं फिर भी स्वाभिमान न जाने कहां खो गया माँ नारी शक्ति संरक्षिका है पिता आधार सरंक्षण और मार्गदर्शन है पर वो चुप क्यों है ऐसा लगता है कि उनकी चुप्पी समाज के पतन को और गहरा कर रही है।
हर चुप्पी पवित्र नहीं होती कुछ चुप्पियाँ सच में अन्याय को बढ़ावा देती हैं जब गलत के सामने कोई नहीं बोलता तो वह गलत धीरे-धीरे सामान्य बन जाता है क्योंकि अगर आधार ही मौन हो जाए तो समाज कैसे टिकेगा हर परिवर्तन हमेशा ऊपर से नहीं आता कई बार वह एक जागरूक मन से शुरू होता है।जो देख रहा है जो महसूस कर रहा है वही बदलाव का बीज है।
सब जानते हैं कि मिट्टी से बना है यह जीवन फिर भी स्वाभिमान न जाने कहाँ खो गया, माँ ही शक्ति है पिता ही आधार हैं फिर भी क्यों उनके होंठों पर यह गहरा मौन सो क्यों गया, क्या यह चुप्पी ही अब संस्कार बन गई या सच कहने की हिम्मत अब भीतर ही मर गई, जब आधार ही मौन हो जाए तो दीवारें कब तक टिकेंगी, जब सत्य ही दब जाए तो ये दुनिया कब तक बचेगी?
इस जीवन को जन्म देनेवाले स्नेह और ममता देनेवाले साहस अनुशासन और दिशा देनेवाले घर को दिल देनेवाले घर को ढ़ंचा देनेवाले शक्ति स्थिरता और संबल सब कुछ होने के बाद भी मनुष्य दरबदर क्यों भटकता है!
इस जीवन की शुरुआत के लिए मनुष्य को जो कुछ मिलता है माँ का प्रेम पिता का आधार घर की सुरक्षा पर्याप्त होता है पर अर्थ और पहचान की खोज उसे स्वयं करनी पड़ती है जो प्रेम हमें सहज में मिला होता है वो माँ-पिता से मिला होता है हमे उसकी गहराई देर से समझ में आती हैं तब तक हम उसे छोड़कर दुनिया में कुछ और ढूँढने निकल पड़ते हैं।
इस संसार से थककर मानव दिव्य माँ की शरण क्यों मांगता है क्यों इस दुनिया से दूर जाने के लिए ईश्वर से आराधना प्रार्थना करता है क्यों मन टूट चुका है मैं तुम्हारी दासी हूँ क्योंकि यह पूर्ण आत्मसमर्पण शरणागति का भाव है यह वही भाव है जो भक्त और देवी के बीच होता है।
शरणागति का अर्थ भागना नहीं है बल्कि एक गहरे विश्वास में टिक जाना है क्योंकि चाहे कुछ भी हो कोई है जो मुझे संभाल रहा है मन का भाव कहता है मन टूट चुका है मैं तुम्हारी दासी हूँ पर यह कमजोरी नहीं बल्कि एक उच्च भक्ति अवस्था है शरणागति का मतलब दुनिया से भागना नहीं बल्कि भीतर से मजबूत होकर उसी दुनिया में जीना है ईश्वर के सहारे।
माँ की स्मृति माँ की करुणा इतनी प्रबल है कि जब-जब मनुष्य माँ को याद किया तब तब ममता ने और जीवन की शून्यता ने आँसुओं से उत्तर दिया क्योंकि माँ बोलती नहीं पर अनुभव में उपस्थित रहती है जीवन सूना है रास्ते सूने हैं लेकिन माँ की विद्यमानता हृदय में रहती है क्योंकि जब सब साथ छोड़ देते हैं तब माँ का मौन ही सबसे गहरा सहारा बनता है।
लोभ जीवन को जला देता है निर्दोष को दोषी बना दिया जाता है प्रेम और ममता ही सच्चा सत्य है और फिर वही प्रश्न लौटता है मैं अपना नाम कैसे बताऊँ जब माँ ही मौन है माँ की चुप ममता नारी की पीड़ा है समाज की विकृति और संतान की आत्मिक पुकार माँ की सामंजस्य है!
लोभ सिर्फ धन या शक्ति तक सीमित नहीं है बल्कि यह मन की आग है जो रिश्तों न्याय और प्रेम को भी भस्म कर देती है जहाँ मानवता असफल होती है वहाँ ममता और प्रेम की मौन शक्ति ही उसे बचा सकती है जहाँ समाज में अन्याय पीड़ा और विकृति फैली हो वहाँ माँ की मौन ममता और प्रेम ही सत्य का प्रकाश बनते हैं।
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