मन चंचल है और अहंकार उसे भटका देता है, लेकिन ईश्वर की कृपा से ही मनुष्य को सही मार्ग और सत्य की प्राप्ति होती है।यह गीत मन की भटकन और जीवन में सत्य की खोज को दर्शाती है। कवि प्रकृति के भटके हुए बादलों के माध्यम से अपने मन की अस्थिर अवस्था को समझाता है। वह बताता है कि जैसे बादल दिशाहीन होकर इधर-उधर भटकते हैं वैसे ही मन भी मोह आकर्षण और अहंकार में उलझकर सत्य से दूर हो जाता है। आत्मज्ञान और परम सत्य की खोज का भाव है। मनुष्य बाहरी आकर्षणों और मैं मेरे के अहंकार में फँस जाता है जिससे वह सही मार्ग भूल जाता है। अंत में कवि ईश्वर माँ से प्रार्थना करता है कि हमे अहंकार और भ्रम से मुक्त करके सत्य और प्रकाश की ओर ले जाए। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत,ना जानू ये शरद का कैसा निर्मल है मौसम, #Mai Naa Janu Ye Sharad Kaa Kaisa Niramal Hai Mousam, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
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Writer ✍️ #Halendra Prasad
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जैसे भटके बादल वैसे भटके मेरा मन
मैं ना जानू ये शरद का कैसा निर्मल है मौसम
छोटे छोटे टुकड़ों में जब बादल रूप दिखाता है
सूरज के नजदीक भटकता पास नहीं हो पाता है
चारों ओर घेरा था बादल वर्षा खूब कराया
आधी का अधियारा छाया जग को रात बनाया
कांप रही थी धरती थर थर चारों ओर अंधेरा में
कुदरत ने गुहार लगाया सूरज से तूफानों में
हरदम रोशनी देने वाला सूरज भी अब व्याकुल था
सृष्टि की हालत को देखकर दृष्टि की गुजारिश था
जैसे भटके बादल वैसे भटके मेरा मन
मैं ना जानू ये शरद का कैसा निर्मल है मौसम
जीवन की आकाश में मैंने देखा जब व्याकुलता को
घूम रहा था चारों ओर आदर्श प्रिय की सत्ता जो
मन सबकी महान है मईया मकसद में अझूराया
सत्य प्रिय को पाने वो कितने रूप सजाया
सबको वो आकर्षित करता अपने ओर खींचता
मिलने को बेचैन हुआ तो चारों ओर मंडराया
मन व्याकुल था चारों ओर अंधेरा था
आकर्षण की ढेर लगी थीं दिल का ऐसा खेला था
शरद निर्मल था आसमा में सुंदर ये प्रकृति की
चलती फिरती जीवन में ये कैसा रूप स्मृति थी
जैसे भटके बादल वैसे भटके मेरा मन
मैं ना जानू ये शरद का कैसा निर्मल है मौसम
मन में कैसा रोग छाया माँ आकर्षण की लहरों का
मोहक है मनभावन जादू सम्मोहन की डेहरो का
चुम्बक जैसा खींच रहा है मुझको अपनी ओर में
उज्जवलता की होड़ मची है आदर्शो की खोज में
उसके कोमल स्पर्शों मुझको अपनी ओर खींचा
मिट ना पाया दर्प जीवन से मन को भी इठलाया
कारण ऐसी आई माता मैं बहुत घबराया हूँ
मिल ना पाया दिव्य ज्योति से जीवन को जलाया हूँ
लुप्त करो मेरे गर्व दंभ को मुझको तुम अपना लो
परम सत्य की राह दिखाकर ईश्वर से मिला दो
जैसे भटके बादल वैसे भटके मेरा मन
मैं ना जानू ये शरद का कैसा निर्मल है मौसम
मेरे अभिमानी मन ने मुझको रास्ता से भराया है
मगरुर किया है मुझको मईया मुझको खूब रुलाया है
जब जब आता दंभ गुमान को लाता है
मान सम्मान की शोहरत देकर मन को मेरे भटकता है
मैं मेरा कहता है मुझसे भावना को जगाकर
तोड़ देता अनमोल रत्न को अंह में आग लगाकर
कैसा ये मिश्रण है मईया कैसा आत्म सम्मान
कैसा स्वार्थ घमंडी मईया कैसा इसका प्यार
बुद्धि से उत्पन्न होकर ये बुद्धि को भ्रष करता है
सूक्ष्म स्थूल के कारण माँ जीवन तंग करता है
जैसे भटके बादल वैसे भटके मेरा मन
मैं ना जानू ये शरद का कैसा निर्मल है मौसम
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