यह गीत आत्मा की भीतर से ईश्वर तक की यात्रा को बहुत सुंदर तरीके से प्रस्तुत करता है क्योंकि यह गीत एक जोगन के माध्यम से मानव आत्मा की ईश्वर-खोज को दर्शाता है। इस गीत में बताया गया है कि मनुष्य दुख उलझन और जीवन की कठिनाइयों से परेशान होकर मंदिर और पूजा-पाठ में ईश्वर को ढूंढता है लेकिन उसे सच्ची शांति बाहर नहीं मिलती ईश्वर केवल मंदिरों या बाहरी दुनिया में नहीं बल्कि हर जगह विद्यमान है धरती, आकाश, जल और समस्त सृष्टि में। अंततः यह समझ विकसित होती है कि ईश्वर हर इंसान के भीतर भी मौजूद है और मन ही असली मंदिर है दुख इंसान को ईश्वर की ओर ले जाता है ईश्वर सर्वव्यापी है सच्ची भक्ति भीतर की खोज है मनुष्य की आत्मा ही असली साधक है! आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, #जोगन ढूंढ रही है मन्दिर में जीवन को बनाकर दुखड़ा #Jogan dhoondh Rahi Hai Mandir Mein Jeevan Ko Banaakar,Writer ✍️ #Halendra Prasad ,
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Writer ✍️ #Halendra Prasad
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भगवन कैसी तेरी अस्तित्व का अनन्त मुखड़ा
जोगन ढूंढ रही है मन्दिर में जीवन को बनाकर दुखड़ा
पूजा पाठ हवन करती है अपने को ना बदले
मांग रही जो धन दौलत तो उसको कैसे पकड़े
बल बुद्धि और शक्ति मांगती है आँचल को फैलाकर
आँख में भर्ती पानी जैसे दुःख में आई नहाकर
असीम धाम है तेरे भगवन जान ना पाता कोई
भटक रहा है जग में दुनियां दिल जिगर को खोई
भगवन कैसी तेरी अस्तित्व का अनन्त मुखड़ा
जोगन ढूंढ रही है मन्दिर में जीवन को बनाकर दुखड़ा
समझ ना पाता ये दुनियां तुझे कठिनाइयों में जीता
ढूंढ रहा है बाहर में जो अन्दर में ना पाता
हे भगवन तू अंतर्यामी कैसी तेरी लीला है
पहुंच गया मैं द्वार तेरी सब तेरी कृपा की खेला है
खोजत खोजत देखा जब मैं शाम में आसमा को
स्वर्ण-छत्र में विराज रहा तू सीने के रथों में
सुन्दर अम्बर के नीचे से तुझको निहार रहा था
स्वर्ण सन्ध्या के बेला में मैं तुझको पुकार रहा था
भगवन कैसी तेरी अस्तित्व का अनन्त मुखड़ा
जोगन ढूंढ रही है मन्दिर में जीवन को बनाकर दुखड़ा
तेरी दर्शन की चाहत ने मुझे कितने बार रुलाया है
आँख में भरकर पानी मेरे पत्थर से टकराया है
देखते देखते राह तेरी मैं खुद को भूल गया था
टूट गया था शीशे जैसा चकना चूर हुआ था
परम शक्ति का रूप दिखता मुझे मैं ना तुझे भुलाऊं
तूही मेरा ईश्वर है तुझे छोड़ नहीं मैं पाऊं
मेरे आँखो बसता है तू मेरे दिल के सागर में
यदि करता मैं तुझको भगवन अपने दिल के सागर में
भगवन कैसी तेरी अस्तित्व का अनन्त मुखड़ा
जोगन ढूंढ रही है मन्दिर में जीवन को बनाकर दुखड़ा
मन मन्दिर में रहता है तू तेरा ही अस्तित्व है सब
सता तेरी हस्ती तेरी तेरा है स्वरूप ये सब
मौजूद रहता है तन मन में जीवन का बागडोर संभाल
तेरे कृपा से चलता दुनिया तू है दुनियां में विद्यमान
तू है धरती तूही अम्बर तू ही जल समन्दर
तू ही पावन पवित्र है जग में तूही सबके अंदर
कभी चमकता कभी बरसता फूलों को सींचे
अपनी बगिया को देखकर तू खुद ही सींचता है
भगवन कैसी तेरी अस्तित्व का अनन्त मुखड़ा
जोगन ढूंढ रही है मन्दिर में जीवन को बनाकर दुखड़ा
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