यह गीत यह संदेश देता है कि समाज को सुधारने के लिए हमें फिर से नैतिक मूल्यों मानवता और सच्चाई की ओर लौटना होगा।क्योंकि इस गीत का सार यह है कि कवि वर्तमान समाज की गिरती हुई नैतिकता और आदर्शों पर गहरी चिंता व्यक्त करता है। वह कहता है कि आज लोग सत्य करुणा सम्मान और उच्च मूल्यों को भूल चुके हैं। माता-पिता की उपेक्षा हो रही है धर्म और भगवान से दूरी बढ़ रही है और लोग केवल स्वार्थ व दिखावे में जी रहे हैं। कवि का सबसे बड़ा दुख यह है कि जो गुरु या मार्गदर्शक समाज को सही रास्ता दिखाते थे वे भी अब अपने आदर्शों से भटक गए हैं। इसलिए वह असमंजस में है कि ऐसे समय में सही मार्ग कैसे दिखाया जाए। यदि वर्तमान समाज की गिरती हुई नैतिकता और आदर्शों को सँवारना है दुरुस्त करना है तो सत्य की तरफ लौटना ही होगा ! समाज की गिरती हुई नैतिकता और आदर्शों को पुनः स्थापित करने के लिए हमें सत्य मानवता करुणा और उच्च नैतिक मूल्यों की ओर लौटना होगा। जब तक हम इन मूल्यों को अपनी ज़िंदगी में नहीं लाएंगे समाज की स्थिति सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है। आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, गुरुवर भूल गया जग आदर्शों को मैं दिखाऊं कैसे, #Guruvar Bhool Gaya Jag Aadrsho Ko Mai Dikhau Kaise, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
गीत=} #गुरुवर भूल गया जग आदर्शों को मैं दिखाऊं कैसे
#Guruvar Bhool Gaya Jag Aadrsho Ko Mai Dikhau Kaise
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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देख आया समय है ऐसा की मैं बताऊं कैसे
गुरुवर भूल गया जग आदर्शों को मैं दिखाऊं कैसे
भूल गया लोग उच्च गुणों को भूल गया लोग श्रेष्ठों को
भूल गया लोग प्रतिभा को भूल गया नैतिकता को
महत्त्व नहीं है इस दुनियां में किसको क्या समझाऊं
कैसे मैं दर्शाऊं इसको कैसे मै दिखाऊं
मात पिता अब वृद्धा आश्रम रोते और बिलखते है
मांग रहे है मौत से मन्नत मौत नहीं अब सुनते है
कर दे कुछ उद्धार तू गुरुवर अर्जी तुझे पेठाया हूँ
लिख दिया मैं नम्र निवेदन पत्र तुझे पैठाया हूँ
देख आया समय है ऐसा की मैं बताऊं कैसे
गुरुवर भूल गया जग आदर्शों को मैं दिखाऊं कैसे
कितने माता टूट गई है कितने बाप बिखरते है
कह ना पाते दर्द दुखों को आश तुम्हीं से रखते है
वक्त मगन है उस वीणा पर जिसके तार डूबे है
भुला दिया लोग भगवन को चलते और थिरकते है
इस दुनियां में ज्ञान है सब को कोई नहीं अनजान है
देखकर आँखें मोड़ लेता है कैसा ये अभिमान है
गुणगान प्रशंसा चहक रही है आनन्द जीवन के फूलों में
सच्चे को अब साथ ना मिलता सच लुढ़क रहा है जीने में
कुछ भी करके आजा भगवन राम कृष्ण को ला दो
बढ़ गई है पाप धरती पे उसको तुम मिटा दो
देख आया समय है ऐसा की मैं बताऊं कैसे
गुरुवर भूल गया जग आदर्शों को मैं दिखाऊं कैसे
मान सम्मान सब लुप्त हुआ है जैसे कोई ना जग में
टूट गया है मंदिर जैसे भूल गए लोग रब के
संगीतों के तार पे थिरके जैसे कोई महान नहीं
खोवे हुए है किस दुनियां में उनको कोई हिंसाब नहीं
श्रेष्ठ बड़प्पन उच्च नैतिकता कोई ऐसा पद धन ना
कठिन समय में मानवता और करुणा का प्रेम जैसा
कहते हैं लोग अब यहां पे केवल मुख से बोलकर
कौन देता है मदद ईमान का कौन छोड़ता है झूठ को
कितने वैज्ञानिकों ने कितने वचन लिखे है
कौन करता है पालन उसका कौन उससे सीखे है
देख आया समय है ऐसा की मैं बताऊं कैसे
गुरुवर भूल गया जग आदर्शों को मैं दिखाऊं कैसे
बदल गया ये समय कितना अब कोई किसी को पूछे ना
भूल गया सम्मान आदर्श का श्रेष्ठ लोगो को पूछे ना
कौन किसका गुणगान करता है कौन आदर्श का पालन
पतित स्थिति घिर पड़ी है देख जीवन का आंगन
मन मन्दिर अब भ्रष्ट हुआ है आत्मा केवल निरेखे
दूषित हुआ है जल पीने का पीते तो मर जाते
उपकारों को भूल गए लोग एहसान जाता कर चला गया जो
कौन पूजे उस चरणों को जो चरण छोड़ कर चला गया है
करता ना प्रशंसा कोई कमियां ढूंढते फिरे
ज्ञानी है इस दुनियां में तो ज्ञान से क्यों ना जूझे
देख आया समय है ऐसा की मैं बताऊं कैसे
गुरुवर भूल गया जग आदर्शों को मैं दिखाऊं कैसे
देख आया समय है ऐसा की मैं बताऊं कैसे
गुरुवर भूल गया जग आदर्शों को मैं दिखाऊं कैसे
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