आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल रचना, आत्म-वियोग से आत्म-योग तक, Aatm Viyog Se Aatm Viyog Tah,
आत्म-वियोग केवल बाहरी दूरी नहीं, बल्कि भीतर का गहरा अलगाव है, जहाँ व्यक्ति स्वयं से, प्रियजन से या ईश्वर से कटाव महसूस करता है। यह पीड़ा इतनी तीव्र होती है कि व्यक्तिगत न रहकर सार्वभौमिक अनुभव बन जाती है, मानो पूरा ब्रह्मांड उसी वेदना को प्रतिध्वनित कर रहा हो इस वियोग में एक छुपा हुआ सत्य भी है जब अलगाव का अनुभव होता है, तब कहीं न कहीं जुड़ाव योग की स्मृति भी जीवित रहती है। यही संकेत देता है कि पुनः मिलन संभव है प्रेम और विरह का यह संगम व्यक्ति को भीतर से बदल देता हैमैं की सीमाएँ टूटकर समस्त सृष्टितक फैल जाती हैं अंततः वियोग ही साधना बन जाता है, जो आत्मा को और गहरे, शुद्ध और व्यापक प्रेम की ओर ले जाता है।
आत्म-वियोग का अर्थ है आत्मा से अलगाव गहरा आंतरिक बिछोह बाहरी दूरी से अधिक भीतर की पीड़ा और आत्मिक खालीपन व्यक्त करना यह प्रेम-वियोग भी हो सकता है या किसी आध्यात्मिक गुरु ईश्वर से दूरी का अनुभव भी हो सकता है क्योंकि अलग होने का भाव भीतर एक ही क्षण में जन्म ले चुका है।
जब भीतर अलगाव का भाव एक क्षण में जन्म ले लेता है तो वह बाहरी परिस्थितियों से भी अधिक तीखा लगता है क्योंकि यह कई रूपों में प्रकट हो सकता है प्रेम में बिछोह के रूप में किसी प्रिय व्यक्ति या गुरु से दूरी के रूप में और ईश्वर आत्मा से कट जाने की अनुभूति के रूप में!
आत्म-वियोग का सबसे गहरा पक्ष यही है कि व्यक्ति खुद से ही अनजान या दूर महसूस करने लगता है। जैसे भीतर कोई संबंध टूट गया हो या मौन हो गया हो लेकिन इसी अनुभव में एक संकेत भी छिपा होता है जब वियोग महसूस होता है तो कहीं न कहीं योग जुड़ाव की स्मृति भी जीवित होती है। यानी भीतर अभी भी वह क्षमता है कि आप फिर से जुड़ सकें अपने आप से प्रेम से या उस उच्च चेतना से।
तुमसे दूर होने की अनुभूति मेरे हृदय में तत्काल गहरा बिछोह बनकर स्थापित हो गई है अखिल नभ-मंडल सम्पूर्ण आकाश समस्त ब्रह्मांड हृदय-स्पर्शी प्रतिध्वनित हुआ अखिल नभ-मंडल में हृदय-स्पर्शी ऐसा भाव जो हृदय को छू ले।
तुमसे दूर होने की अनुभूति समय के सूने आँगन में
एक मौन प्रतिध्वनि बनकर गूंज उठी बागान में
अखिल नभ-मंडल सम्पूर्ण आकाश देख रहा
जैसे स्मृतियों से भर तूफान उठ रहा
हर तारा है नाम जपता झिल मिल रोशनी में
आहट लाती रोशनी जागी आँखो के बदल में
बिछोह केवल दूरीया नभ तक जाती लौटा वापस हो जाती है
आत्मा के सागर में ममता की गहराई स्पर्श हो जाती है
जो पास होकर अनकहा था वो सुनी सुनी लगता था
दूर होकर भी अनंत रहो में मेरे साथ चलता था
जीवन की पीड़ा प्रेम इतना गहरा है कि वह केवल व्यक्तिगत नहीं रहता बल्कि वह समस्त सृष्टि में गूंजता हुआ प्रतीत हो रहा है। हृदय की वह वेदना प्रेम इतना गहन है कि वह पूरे ब्रह्मांड में गूंज रहा है।
जीवन की पीड़ा में डूबकर प्रेम अब केवल मेरा नहीं रहा,
सीमाओं से परे निकलकर समस्त सृष्टि का स्वर बना
हृदय की वेदना इतनी गहन है मौन भी इसे छुपा नहीं पाता
आकाश की निस्तब्धता में तारों को झिलमिला नहीं पाता
अनंत ब्रह्मांड की धड़कनों में प्रतिध्वनि होती चली
प्रेम अब किसी एक हृदय में सीमित नहीं रही
हर कण में व्याप्त है ईश्वर जैसे सृष्टि स्वयं इसे महसूसकर रही हो,
पीड़ा में एक अदृश्य संगीत रचकर आगे चल रही हो।
जीवन का वियोग-श्रृंगार रस की प्रधानता है व्यक्ति के भीतर जन्मा बिछोह इतना तीव्र है कि वह व्यक्तिगत न रहकर सार्वभौमिक हो जाता है क्योंकि प्रेम की गहराई आत्मिक संबंध और विरह की वेदना तीनों का अत्यंत सुंदर समन्वय है।
जीवन का वियोग श्रृंगार का सबसे गहन रूप बन जाता
जब मिलन की स्मृतियाँ दौड़ आती है अग्नि में छुप जाता
विरह की अग्नि में तपकर उज्ज्वल हो उठती हैं।
भीतर जन्मा वो बिछोह धीरे-धीरे अपनी सीमाएँ तोड़ देती है
मैं से हम और हम से मैं की ओर जाती
समस्त सृष्टि का अनुभव बन कर पवन रुप सजाती
प्रेम की गहराई से मिलन में आग बरसती
आत्मिक संबंध में बह के आगे पीछे चलती
जो दूरी के बावजूद अटूट रहता है वो ममता की सागर
विरह की वेदना उसे पुकार बन जाता दिवाकर
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