आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, माँ संस्कारों की मूर्तिकार और जीवन की आधारशिला, Adhyatmik Darshanik Anmol Bhakti Rachna, Maa Sanskaron Ki Moortikar Aur Jeevan Ki Aadharshila,
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, माँ संस्कारों की मूर्तिकार और जीवन की आधारशिला, Adhyatmik Darshanik Anmol Bhakti Rachna, Maa Sanskaron Ki Moortikar Aur Jeevan Ki Aadharshila,
माँ केवल जन्म देने वाली नहीं बल्कि संतान की रक्षक मार्गदर्शक और जीवन को गढ़ने वाली शक्ति है। वह अपने प्रेम त्याग और संस्कारों से बच्चे को मजबूत और योग्य बनाती है। माँ का प्रेम निष्काम सच्चा और स्थायी होता है जो स्वार्थपूर्ण संसार में भी अटल रहता है माँ को ईश्वर के समान माना गया है क्योंकि वही जीवन का सही मार्ग दिखाती है और हर परिस्थिति में साथ खड़ी रहती है। हालांकि दुनिया में सभी लोग स्वार्थी नहीं होते सच्चे और निष्कपट लोग भी होते हैं जिन्हें पहचानने में समय लगता है।
जब व्यक्ति माँ के प्रति कृतज्ञता और समर्पण का भाव अपनाता है तो उसका अहंकार कम होता है और वह अधिक संवेदनशील धैर्यवान और करुणामय बनता है। माँ के संस्कार ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति और आधार होते हैं।
माँ की दुआएँ संतान की रक्षा करती हैं माँ केवल शारीरिक जन्म देने वाली नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक कवच भी होती है। उसका आँचल और उसकी आत्मिक शक्ति संतान को हर विपत्ति से बचाती है जो संतान माँ के मार्गदर्शन पर चलती है, वही जीवन में सच्ची सुरक्षा और सफलता प्राप्त करती है यही माँ की जीवनदायिनी और रक्षक शक्ति है। जहाँ माँ को पहला गुरु और रक्षक माना जाता है।
माँ निर्माण करने वाली वो मूर्तिकार है जहाँ माँ को उस कुम्हार या मूर्तिकार के रूप में देखा जाता है जिसने अपने बच्चे को संस्कार साहस और कर्मठता से गढ़ा है माँ कठिन परिस्थितियों में तपाकर संतान को मजबूत बनाती है जैसे लोहे को आग में तपकर मजबूत बनाया जाता है।
माँ केवल स्नेह नहीं देती बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाती है माँ शिक्षा निर्भयता और नैतिकता सिखाती है जिसे बल-बुद्धि की दात्री और वीरता सिखाने वाली वेदों की माता है क्योंकि माँ का स्वरूप देवी समान है माँ ज्ञान और साहस की देवी है क्योंकि माँ जीवन के संघर्षों का सामना करना भी सिखाती है कभी समझाकर कभी सख्ती से और कभी अपने त्याग के उदाहरण से।
स्वार्थी संसार और माँ की निष्कामता यह है कि सुख में सब साथ रहते है दुख में कोई नहीं इस दुनिया में झूठ का बोलबाला है मतलबी लोग मतलब की दुनिया इन सबके बीच केवल माँ ही निष्काम सच्ची और उपकारी दिखाई देती है संसार बदल सकता है पर माँ का प्रेम स्थायी और निष्कपट होता है जिसे स्वार्थपूर्ण प्रवृत्ति कह सकते हैं!
माँ का स्थान इसलिए अलग माना जाता है क्योंकि उसका प्रेम अपेक्षाओं पर नहीं बल्कि त्याग और अपनत्व पर आधारित होता है। वह अक्सर बिना किसी शर्त के साथ खड़ी रहती है चाहे हालात कैसे भी हों। इसी कारण उसे निष्काम सच्चा और स्थायी प्रेम का प्रतीक कहा जाता है किन्तु पूरी दुनिया को पूरी तरह स्वार्थी माना नहीं जा सकता बहुत लोग परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं पर हर जगह ऐसे लोग भी मिलते हैं जो सच्चे सहायक और निष्कपट होते हैं बस उन्हें पहचानने में समय लगता है।
अक्सर लोग अपने अनुभवों परिस्थितियों और संघर्षों के कारण वैसा व्यवहार करते हैं जैसा हम देखते हैं। हर व्यक्ति के भीतर अच्छाई और संवेदनशीलता की संभावना होती है बस हर किसी में वह समान रूप से प्रकट नहीं होती सच्चे सहायक और निष्कपट लोग आज भी हैं लेकिन उन्हें पहचानने के लिए धैर्य और समझ की ज़रूरत होती है। कभी-कभी समय ही असली कसौटी बनता है जो दिखाता है कि कौन वास्तव में साथ निभाने वाला है।
माँ ही साक्षात ईश्वर का रूप है जो जीवन का मार्गदर्शन करती है लोग पत्थर की मूर्तियों से मन्नत माँगते हैं पर असली भगवान तो माँ के रूप में हमारे पास है क्योंकि वही हमें जन्म देती है पालन-पोषण करती है और सही-गलत का मार्ग दिखाती है। उसके त्याग धैर्य और निस्वार्थ प्रेम में लोगों को दिव्यता की झलक मिलती है।
हर व्यक्ति की आस्था अलग होती है कुछ लोग ईश्वर को मंदिर मूर्तियों या किसी और रूप में मानते हैं और वहाँ से उन्हें मानसिक शांति और सहारा मिलता है यह भी उनकी श्रद्धा का एक वैध तरीका है क्योंकि माँ हमारे जीवन में ईश्वर जैसी भूमिका निभाती है वह हमारे लिए सबसे करीब सबसे सच्चा और जीवंत रूप है प्रेम और मार्गदर्शन के साथ ही दूसरों की आस्थाओं का सम्मान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
जब कोई भी साधक अपने आप को स्वयं को माँ के चरणों की धूल मानता है और स्वीकार करता है कि माँ ने उसे प्रेम और संस्कार का फूल बनाया है तो समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक बन जाता है क्योंकि साधक अपने अहंकार को छोड़कर स्वयं को माँ के चरणों में अपने को अर्पित कर देता है और वह अपने भीतर के मैं को छोटा कर देता है और यही समर्पण की असली शुरुआत होती है।
जब साधक आन्तरिक परिवर्तन लाता है तो उसकी भावना केवल शब्द नहीं होती बल्कि एक आंतरिक परिवर्तन को व्यक्ति समझने लगता है कि जो कुछ भी वह है उसके संस्कार उसका व्यक्तित्व उसका जीवन उसमें माँ का गहरा योगदान है। तब कृतज्ञता अपने आप जन्म लेती है और वही कृतज्ञता उसे और अधिक संवेदनशील धैर्यवान और करुणामय बनाती है।
मनुष्य को वह दृष्टिकोण भीतर से परिपक्व बनाता है जहाँ वह केवल माँ का सम्मान ही नहीं करता बल्कि उनके दिए हुए मूल्यों को अपने जीवन में जीने की कोशिश करता है और अपने आप को समर्पण करते हुए अंध-आस्था नहीं होता बल्कि जागरूक स्वीकृति होती है जहाँ व्यक्ति यह पहचानता है कि उसके जीवन की नींव प्रेम और त्याग पर टिकी है इस भाव में एक तरह की शांति भी होती है क्योंकि जब अहंकार कम होता है तो अपेक्षाएँ और शिकायतें भी धीरे-धीरे कम होने लगती हैं।
माँ की महिमा त्याग प्रेम और शक्ति का भावपूर्ण वर्णन करती है। क्योंकि माँ ही उसकी सबसे बड़ी रक्षक और प्रेरणा स्रोत है। संसार के तीर-तलवार दुख-कष्ट और स्वार्थी लोगों का व्यवहार उसे विचलित नहीं कर सकता क्योंकि माँ के संस्कार और आशीर्वाद उसके साथ हैं माँ ने उसे कठिन परिस्थितियों में तपाकर मजबूत बनाया ज्ञान दिया साहस दिया और सही मार्ग पर चलना सिखाया।
जब दुनिया स्वार्थ से भरी दिखाई देती है और कठिन समय में कोई साथ नहीं देता तब माँ ही सच्ची सहारा बनती है। माँ को देवी शक्ति और ईश्वर का स्वरूप मानना तथा उसके चरणों में समर्पित होकर कृतज्ञता व्यक्त करना ही माँ का प्रेम निष्काम अटूट और जीवन का सबसे बड़ा आधार है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें