आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, मेरा-तेरा का भ्रम और जीवन का सत्य, Adhyatmik Darshanik Anmol Bhakti Rachna, Mera-Tera Ka Bhram Aur Jeevan Ka Satya
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, मेरा-तेरा का भ्रम और जीवन का सत्य, Adhyatmik Darshanik Anmol Bhakti Rachna, Mera-Tera Ka Bhram Aur Jeevan Ka Satya,
यह जीवन अस्थायी है और मेरा-तेरा केवल एक भ्रम है। मनुष्य धन संपत्ति और संबंधों को अपना समझकर अहंकार करता है, लेकिन अंत में सब कुछ यहीं छूट जाता है और मनुष्य मिट्टी में मिल जाता है इच्छाएँ और आशाएँ मन को भटकाती हैं और दुख का कारण बनती हैं जितनी अधिक इच्छाएँ होती हैं उतनी ही अधिक बेचैनी बढ़ती है सच्ची शांति बाहरी चीज़ों में नहीं बल्कि अपने भीतर मिलती है मनुष्य अकेला जन्म लेता है और अकेला ही जाता है इसलिए जीवन का वास्तविक आधार उसका मन उसके कर्म और उसके अनुभव होते हैं। धन-संपत्ति साथ नहीं जाती केवल कर्म संस्कार और यादें ही प्रभाव छोड़ती हैं।
मनुष्य आज धरती धन संपत्ति और संसार को अपना समझकर घमंड करता है पर अंत में उसे सबकुछ छोड़ कर मिट्टी में ही मिल जाना है क्योंकि यह जीवन दुख आशा निराशा अकेलेपन और इच्छाओं के बोझ से भरा है।
लोग मेरा तेरा में बंधे हैं लेकिन वास्तव में कुछ भी हमारा नहीं है यहां तक कि सांसे भी हमारा नहीं है इस जीवन में मनुष्य लगातार किसी को तलाशता है पर सच्चाई यह है कि सबका आधार स्वयं का मन है। आशाएँ टूटती हैं लोग बदलते हैं प्रेम कम होता जाता है और मन बेचैनी से भरा रहता है।
ये संसार अस्थायी है परिवर्तन निश्चित है आज मनुष्य धरती का मालिक बनता है पर कल वही मनुष्य धरती का हिस्सा बन जाएगा धरती धन संपत्ति जीवन दुख आशा निराशा अकेलेपन और इच्छाओं के बोझ से भरा मानव एक दिन इस धरती के आँचल के बिस्तर पर सो जाएगा उस दिन मनुष्य के इच्छाओं का क्या होगा!
ये धरती किसी की नहीं है अंत में सब धरती के हो जाते हैं।आज इंसान धरती ज़मीन संपत्ति और संसार को अपना समझ कर घमंड करता है परंतु कल ऐसा आएगा जब यही इंसान मिट्टी में मिल जाएगा।
जो लोग कहते हैं यह मेरा है घर धन ज़मीन पर वास्तव में कुछ भी मेरा तेरा नहीं है सब मनुष्य का भ्रम है जब प्राण वायु हमारा नहीं तो घर धन ज़मीन जायजात संपत्ति कैसे अपना हो सकता? और होगा भी नहीं ?
क्या जिस दिन इस दुनियां को छोड़कर विदा होगे उस दिन घर धन ज़मीन जायजात संपत्ति लेकर जा सकते है नहीं ले जा सकते क्या इससे पहले कोई लेकर गया है नहीं फिर हम कैसे ले जायेंगे ये सब सृष्टि का है और सृष्टि का ही रहेगा!
ये सांस भी अपनी नहीं है तो फिर बाकी क्या अपनी हो सकती है? नहीं हम तो केवल कुछ समय के अतिथि हैं और यही बात हम भूल जाते है कि यह संसार अस्थायी है और एक दिन सब छूट जाना है।
इस जीवन में ऐसे पल बार- बार आते रहेंगे जो आँखों में आँसू भर कर दिल को दुख से भारी कर देंगे रातें बेचैनीयो में गुजारने के लिए मजबूर कर देंगे सुख का क्षणभर भी नहीं मिल पायेगा पर याद रहे ये धरती ही हमें अपनी आँचल तले सुलाएगी कोई अपना साथ नहीं होगा और जीवन के बोझ से मुक्त कर देगी जैसा एक बालक को उसकी माँ आँचल तले सुला लेती है मनुष्य तो अकेले जन्म लेता है और अकेले ही जाता है।
मनुष्य जीवन में मनुष्य जीवनभर तलाश करता है किसको? किसके लिए ? पर वास्तव में खोज तो भीतर में है मन को जलाने वाली अभिलाषाएँ और एक पल में टूटने वाली आशाएँ कहा रहती है क्यों मन बेचैन हो कर दरबदर दौड़ता है केवल इच्छाओ की पूर्ति के लिए क्या इच्छाओं की पूर्ति वस्तु साथ जा सकती है?
इस जीवान में इच्छाएँ जितनी अधिक है दुख उतना ही अधिक है। क्योंकि मन इच्छाओं में घूमता रहता है अभिलाषाएँ मन को जलाती हैं और आशाएँ एक पल में टूट जाती हैं। मन की शान्ति और अपनी आत्मा की खबर ही सच्चा सुख देता है!
जीवन छलावा है निराशा और आशा का द्वंद्व मन को भटका देता है फिर भी आशा को पाना जरूरी है निराशा ही इंसान को सिखाती है और वही उसे मजबूत बनाता है अंधेरा कितना भी गहरा हो सवेरा अवश्य आता है और सवेरा के बाद अंधेरा अवश्य आता और यही जीवन का क्रम चलता रहता है!
यह संसार चुप है मनुष्य के अंदर पीड़ा भरी है माया के कारण प्रेम सूख गया है स्नेह खो गया है मन भीतरी प्यास से तड़प रहा है क्योंकि जब प्रेम उमड़ता है तो पाने की इच्छा जागृत होती है और जब टूट जाता है तो मन व्याकुल हो कर उससे दूर हो जाता है और यही जीवन का सत्य है पर सब नश्वर है। जिसे हम मन का सूना होना और प्रेम की कमी कहते है!
परिवर्तन तो सृष्टि का नियम है और एक दिन आएगा ज़रूर जब परिवर्तन होगा आज धरती है मानव का और कल मानव ज़मीन का होगा क्योंकि आज जो मनुष्य धरती पर राज कर रहा है वह कल उसी मिट्टी में समा जाएगा और यही समझ मनुष्य को विनम्र शांत और प्रेममय बनाती है।
यह जीवन क्षणभंगुर है मोह-माया असत्य है मनुष्य अकेला है दुख और सुख क्षणिक हैं और अंत में सबको उसी मिट्टी में लौट जाना है अहंकार छोड़ना सादगी अपनाना प्रेम बाँटना और अपने भीतर के सत्य को जानना ही सत्य है!
मनुष्य की इच्छाएँ, महत्वाकांक्षाएँ और सपने सब उसी मन से बंधे हैं जो शरीर के साथ चलता है जब शरीर अपनी यात्रा पूरी कर लेता है तब इच्छाएँ भी उसी के साथ धीरे-धीरे विलीन हो जाती हैं और एक दिन धरती की गोद में सदा के लिए सो जाता है!
मनुष्य की इच्छाएँ शरीर और अहंकार से बंधी होती हैं इसलिए शरीर के समाप्त होते ही वे भी अपनी शक्ति खो देती हैं जो इच्छाएँ पूरी न हुई हों वे किसी स्मृति किसी सीख के रूप में संसार में रह सकती हैं दूसरों के लिए प्रेरणा बनकर या चेतावनी बनकर रह सकती है पर मनुष्य को एक दिन जाना ही है!
कुछ इच्छाएँ कर्मों के रूप में आगे बढ़ जाती हैं जैसे सद्कार्य प्रेम करुणा वे मनुष्य के जाने के बाद भी दुनिया पर प्रभाव डालते रहते हैं और कुछ इच्छाएँ बस शांत हो जाती हैं असल में मनुष्य चला जाता है पर इच्छाओं का बोझ यहीं रह जाता है मिट्टी में स्मृतियों में दूसरों के अनुभवों में।
मनुष्य की अपूर्ण इच्छाएँ वास्तव में दो रूप लेती हैं मिट जाना या कुछ बनकर रह जाना यानी जो इच्छाएँ मनुष्य को आगे बढ़ाती हैं वही उसके न रहने पर भी दुनिया में अपनी छाप छोड़ जाती हैं जिससे प्रेरणा से लोग अपने जीवन में कुछ ज्ञान प्राप्त करते है!
जब मनुष्य समाप्त होता है तो उसकी इच्छाएँ भी अपना स्वरूप बदल देती हैं कुछ इच्छाएँ मिट्टी में समा जाती हैं और शून्य बन जाती हैं पर कुछ इच्छाएं स्मृतियों में सीखों में अनुभवों में किसी के जीवन की राह में दीपक की तरह जलती रह जाती हैं।
इच्छाओं का एक सत्य यह भी है कि वे शरीर के साथ मरती नहीं वे रूप बदलती हैं कभी प्रेरणा बनकर कभी चेतावनी बनकर कभी एक अधूरी कहानी बनकर तो कभी किसी और मनुष्य की नई शुरुआत बनकर किसी के जीवन में प्रवेश करके उसके जीवन को सवार देती तो किसी के जीवन में प्रवेश ही नहीं करती!
मानवीय विचारों की इच्छा स्मृति और अनुभव के चक्र को बहुत खूबसूरती से पकड़ने के लिए मानवीय विचारों की इच्छा स्मृति और अनुभव से जाना जा सकता है कि मानवीय विचारों की इच्छाएं क्या चाहती है और कैसे जीवन जीने बसर करने कि लालायित है!
इच्छाएँ शरीर के मर जाने से समाप्त नहीं होतीं बल्कि वे रूप बदल लेती हैं और कभी प्रेरणा बनकर कभी चेतावनी बनकर कभी किसी अधूरी कहानी की तरह जो आगे कही जाने की प्रतीक्षा में हो तो कभी वे किसी और व्यक्ति के जीवन में प्रवेश कर उसके जीवन को सँवार देती हैं, और कभी वह इच्छा किसी के जीवन तक पहुँच ही नहीं पाती।
मनुष्य की इच्छाएँ स्मृति और अनुभव के चक्र में ही अपना स्वरूप पाती हैं। स्मृतियाँ उसका मार्ग बनाती हैं अनुभव उसे दिशा देते हैं और इन्हीं से हम समझ सकते हैं कि उसकी इच्छाएँ क्या खोज रही हैं कैसे वह जीवन को जीने समझने और सँवारने की लालसा रखती है।
मनुष्य की इच्छाएँ उसके बीते हुए अनुभवों और स्मृतियों से जन्म लेती हैं क्योंकि इंसान जैसा सोचता है और जैसा चाहता है वह उसकी यादों और जीवन के अनुभवों से निर्धारित होता है।और यही चक्र बताता है कि मनुष्य जीवन को किस तरह जीना और सँभालना चाहता है।
मेरा-तेरा के भ्रम में फँस हुआ मनुष्य जब दुख ईर्ष्या और संघर्ष में फंसता है तो दुखित हो कर विलाप करता है और वह यह नहीं समझता कि जब हमारे शरीर की मूल जीवन-शक्ति प्राण-वायु भी हमारे नियंत्रण में नहीं है तो फिर घर धन।ज़मीन संपत्ति जैसी बाहरी चीज़ों का मेरा होना कैसे सम्भव है क्योंकि वास्तव में मेरा तेरा एक मानसिक कल्पना ही है।
अस्थिरता का सत्य अनित्य है दुनिया की हर वस्तु बदलती रहती है जैसे शरीर संबंध धन संपत्ति जब सब कुछ बदल रहा है तो किसी भी चीज़ पर स्थायी अधिकार का दावा कैसे किया जा सकता है? क्योंकि मालिकाना सिर्फ व्यवस्था है वास्तविकता नहीं समाज ने व्यवस्था बनाने के लिए मालिक और मालिकाना हक की अवधारणा बनाई लेकिन यह नियम सिर्फ कानूनी है अंतिम सत्य नहीं।
मनुष्य जन्म के समय कुछ नहीं लाया और मृत्यु के समय कुछ नहीं ले जाता है तो फिर बीच के समय में ये मेरा है का क्या मतलब यह एक मनुष्य का अस्थाई विचार है क्योंकि जब हम आए थे तो भी खाली हाथ आए थे और जब हम जाएंगे तब भी कुछ भी साथ नहीं ले जाएंगे।
मनुष्य के मन में माया मन में यह धारणा पैदा करती है कि चीज़ें हमारी हैं जो असली सत्य नहीं है सब कुछ प्रकृति का है और हम तो केवल सिर्फ उसका अस्थायी उपयोगकर्ता हैं जिसे भ्रम मोह माया का खेल कहा जाता है!
किसी वस्तु का मालिक होना वास्तविक नहीं है वास्तव में वास्तविक यह है कि दुनियां में हर वस्तु क्षणिक है और स्वयं हम भी क्षणिक है जो कुछ हमें प्रकृति ने दिया है वह केवल कुछ समय के उपयोग करने के लिए दिया है हमेशा के लिए नहीं लेकिन उसका सही उपयोग करना और उसकी ज़िम्मेदारी लेना वास्तविक और महत्वपूर्ण है।
मनुष्य जीवन में मन हल्का तब होने लगता है जब मनुष्य को यह समझ में आ जाता है कि कुछ भी हमारा हमेशा नहीं है सब अस्थाई है तो लालच क्रोध अहंकार सबके सब कम होने लगता है और जीवन सरलता के तरफ गतिमान होकर सुख शांति को अपना लेता है!
जिस चीजों को हम हमेशा के लिए अपना मानक कर विरोध करते रहे वो सिर्फ कुछ समय के लिए ही मिली थी यह समझ मनुष्य के मन का लगाव उस चीजों से कम हो जाती है और मेरी पास और होना चाहिए कि भावनाएं वाली सोच घटने लगती है जिसके कारण मनुष्य में से लालच लोभ क्रोध अहंकार घमंड धीरे धीरे मिट जाते है और मनुष्य शान्तिमय जीवन यापन करने लगता है!
हम अक्सर भूल जाते हैं कि जीवन अस्थायी है हम यहाँ केवल कुछ समय के अतिथि हैं और जो कुछ भी हमारे पास है वह संबंध वस्तुएँ उपलब्धियाँ सब यहीं छूट जाना है और एक दिन अकेला ही इस दुनियां से विदा हो जाना है!
इस जीवन काल में उन चीज़ों को महत्व दिया जाए जो वास्तव में मायने रखती हैं प्रेम, करुणा, और सद्कर्म जो खुशी और सुख दोनों प्रदान करती है और शायद यही जीवन का सार है कि हर पल को सचेत होकर जिया जाए,अपेक्षाओं और अहंकार को हल्का किया जाए!
इस दुनियां में हर कोई के जीवन में उस कठिन सच्चाई का दिन आता है जिसका सामना हर मनुष्य को कभी-ना-कभी करना पड़ता है। आँखें आँसुओं से भर जाती हैं,दिल दुख से भारी हो जाता है रातें बेचैनी और अकेलेपन में बीतती हो जाती है और सुख जैसे कहीं दूर खो जाता है।
जीवन के कुछ क्षणों में लगता है जैसे कोई अपना नहीं, कोई सहारा नहीं परंतु धरती यह प्रकृति हमारी अंतिम माँ है वह हमें अपने आँचल में समेट लेती है,ठीक वैसे ही जैसे एक माँ अपने थके हुए बच्चे को गोद में सुलाती है।
इस दुनियां में मनुष्य सचमुच अकेला जन्म लेता है,अकेला संघर्ष करता है,और अंत में अकेले ही लौट जाता है।लेकिन इस अकेलेपन की यात्रा में,हमारे अनुभव, हमारे कर्म और हमारी यादें हमारा वास्तविक साथ बनकर साथी की तरह साथ निभाते हैं।
सच तो यह है कि मनुष्य जीवनभर बाहर खोजता रहता है पर जिसे वह पाना चाहता है,जिस शांति, संतोष और पूर्णता की उसे लालसा रहती है,वह सब भीतर ही छुपा रहता है। पर उसे पहचान ही नहीं पाता और भ्रम के जाल में फंसकर भटकते रहता है!
हमारा मन एक अग्नि की तरह है इच्छाओं की आग से जलता हुआ दो क्षण की आशा और एक पल की महत्वाकांक्षा तथा अगले ही क्षण टूटने वाली अपेक्षाएँ के लिए बेचैनीयो की जड़ में इस कदर समा जाता है कि मन को जलाने वाली अभिलाषाएँ इसे दर-दर अपने भरम में रखकर भटकाने लगती है!
मनुष्य को दर-दर भटकने का कारण यह है कि मनुष्य का मन बाहर दौड़ता है क्योंकि उसे लगता है कि वस्तुएँ उपलब्धियाँ और संबंध उसे वह संपूर्णता देंगे जो उसे चाहिए लेकिन यह भ्रम है मन जितना बाहर भागता है उतना ही खाली और थका हुआ लौटता है।
इच्छाओं का संसार क्षणभंगुर है जो वस्तु आज मन को प्रिय लगती है वह कल अर्थहीन हो जाती है जो उपलब्धि आज गर्व देती है वह समय के साथ फीकी पड़ जाती है और अंत में कोई भी वस्तु कोई भी चाह पूरी करके मिला सुख हमारे साथ नहीं जाता यदि इच्छाओं की पूर्ति हो भी जाती है तो साथ नहीं सकती है?
मनुष्य अपने साथ केवल कर्म चरित्र संस्कार और मन की पवित्रता ले जाता है बाकी सब यहीं छोड़ जाता है क्योंकि जो लेकर आता है वो ले जाता है जो यही पाता है वो यही छोड़ जाता है!
मनुष्य का खोज मनुष्य के भीतर में है? क्योंकि मन की बेचैनी का मूल मन की ही अज्ञानता है जब मन यह समझ लेता है कि इच्छाएँ अनंत हैं और जीवन सीमित है तब वह भीतर लौटना शुरू करता है और जब भीतर लौटते है तो शांति स्थिरता और आत्मसंतोष मिलती है!
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