आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना,निर्गुण से सगुण का दर्शन, Nirgun Se Sagun Kaa Darshn,
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना,निर्गुण से सगुण का दर्शन, Nirgun Se Sagun Kaa Darshn
निर्गुण परम सत्य जब साधक के हृदय में अनुभूति बनकर माँ के दिव्य रूप में प्रकट होता है, वही सगुण का दर्शन है। ध्यान की अवस्था में जब संसार का शोर मिट जाता है, तब साधक को हर दिशा में माँ की चेतना अनुभव होती है। माँ की भक्ति और शरणागति से अहंकार मिटता है और आत्मा को परमानंद की अनुभूति होती है।
निर्गुण से सगुण का दर्शन यह है कि जो दिखाई न दे फिर भी अनुभव हो वहीं सगुण है क्योंकि रात अज्ञान का एकांत नहीं बल्कि ध्यान की अवस्था है जब संसार अदृश्य हो जाता है तब साधक को केवल माँ का स्वरूप दिखता है।
निर्गुण वह स्वरूप है जो रूप रंग आकार से परे है जिसे आँखों से नहीं देखा जा सकता लेकिन उसका अनुभव किया जा सकता है।
जब वही निराकार सत्ता साधक के हृदय में अनुभूति बनकर प्रकट होती है तो वह सगुण का रूप ले लेती है यानी वह रूप किसी रूप या देवी-माता के स्वरूप में दिखाई देने लगती है।
यहाँ रात को अज्ञान का अंधकार नहीं माना गया है बल्कि ध्यान की गहराई की अवस्था माना गया है क्योंकि जब ध्यान में संसार का शोर और दृश्य लुप्त हो जाते हैं तब साधक के भीतर केवल माँ दिव्य शक्ति का स्वरूप प्रकट होता है।
जब मन पूरी तरह शांत हो जाता है और बाहरी दुनिया का प्रभाव समाप्त हो जाता है तब निराकार परम सत्य साधक को किसी दिव्य रूप जैसे माँ के रूप में अनुभव होने लगता है। यही निर्गुण से सगुण का दर्शन है।
माँ बाहर नहीं बल्कि हृदय में विराजमान हैं जीवन का मूल पाठ है माँ ही जीवन का पहला ज्ञान पहला स्पर्श पहला विश्वास हैं।
माँ केवल बाहर दिखाई देने वाला एक व्यक्तित्व नहीं हैं बल्कि माँ हमारे हृदय में बसने वाली चेतना और करुणा का स्वरूप हैं। जीवन की शुरुआत ही माँ से होती है।
बच्चा दुनिया को सबसे पहले माँ के माध्यम से ही समझता है और पहला ज्ञान प्राप्त करता है और जन्म लेते ही जो स्पर्श सुरक्षा और प्रेम पाता है वह माँ का ही होता है और पहला विश्वास भी संसार में बच्चा माँ से ही सीखता है।
जब चेतना जागृत होती है तब पूरा ब्रह्माण्ड जीवित लगता है।हर पत्ता हर तारा हर दिशा माँ के गीत में सहभागी हो जाती है।
जब साधक की चेतना भीतर से जागृत हो जाती है, तब वह संसार को जड़ नहीं बल्कि जीवंत चेतना से भरा हुआ अनुभव करता है। तब प्रकृति की हर वस्तु हर पत्ता हर तारा हर दिशा मानो एक ही दिव्य शक्ति एक ही माँ की उपस्थिति का गीत गाने लगती है।
यह सांसारिक खुशी ही नहीं बल्कि आनंद परमानंद और अमृत अवस्था की यात्रा है जहाँ इच्छा समाप्त होती है वहीं तृप्ति स्थिर होती है।
माँ के प्रेम में तृप्ति इतनी गहरी है कि उसे बार-बार पाने की चाह बनी रहती है क्योंकि जीवन में संतुष्टि संतुष्ट नहीं होता है माँ का नाम मुख से निकल जाता है!
माँ के सान्निध्य में दुख भी लहर बन जाता है बोझ नहीं क्योंकि जीवन की उतार-चढ़ाव भरी साधना है जीवन में आते हैं जो डूबता उभरता तरंगों की तरह आगे बढ़ता रहता है!
माँ की कृपा से अहंकार मिटता है और चेतना जागृत होती है।जिसे शरणागति की पराकाष्ठा कहते है जो चेतना के जागरण से मिलता है!
जब साधक अपने आप को पूर्ण समर्पण कर देता है तो जहाँ दृष्टि समाप्त होती है वहीं परमात्मा का दर्शन प्रारंभ होता है क्योंकि माँ के प्रति भक्ति योग प्रकृति के माध्यम से ब्रह्मानुभूति।और आत्मा की मौन साधना है अनुभव किया जाता है।
माँ के प्रति गहन प्रेम भक्ति और आत्मिक अनुभूति का अभिव्यक्ति यह है कि जब संसार की दृष्टि धुंधली हो जाती है और चारों ओर कुछ दिखाई नहीं देता तब भी माँ का दिव्य रूप स्पष्ट दिखाई देता है माँ हमारे चेतना हृदय और अंतर्मन में विराजमान हैं।
रात तारे चाँद सागर नदी और बादल जैसे प्राकृतिक दृश्य आत्मिक जागरण के प्रतीक हैं। इन सबके माध्यम से हम माँ के सान्निध्य में मिलने वाले आनंद परमानंद और संतोष को अनुभव करते है। यही आनंद सांसारिक नहीं बल्कि आत्मा को तृप्त करने वाला दिव्य सुख है।
माँ के प्रेम से हमारा मन प्रसन्न संतुलित और जागृत हो जाता है। जीवन की लहरें दुख-सुख और उतार-चढ़ाव भी माँ की कृपा से सहज और मधुर लगने लगते हैं।
पूर्ण शरणागति भाव से जब हम स्वीकार करते है कि माँ के चरणों की धूल से उसकी चेतना जागृत हुई है और वही उसका सत्य शक्ति और प्रकाश हैं तो माँ के साथ आत्मा के पवित्र मिलन भक्ति समर्पण और आध्यात्मिक जागरण का सार प्रस्तुत होता है।
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