आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना,।मौन में माँ का स्पर्श शब्दों के पार एक दिव्य संबंधMaun Mein Maa Ka Sparsh: Shabdon Ke Paar Ek Divya Sambandh
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना,।मौन में माँ का स्पर्श शब्दों के पार एक दिव्य संबंध, Maun Mein Maa Ka Sparsh: Shabdon Ke Paar Ek Divya Sambandh
विदाई अंत नहीं बल्कि एक आंतरिक परिवर्तन है जहाँ माँ अपने पीछे नया प्रकाश और नवजागरण छोड़ जाती है यह अनुभूति बताती है कि माँ।कोई व्यक्ति नहीं बल्कि प्रेम करुणा और शांति की एक दिव्य अनुभूति है, जो मौन में बिना शब्दों के जुड़ती है और माँ का आना-जाना दिखाई नहीं देता पर वह भीतर सदा उपस्थित रहती
मौन में घटित एक आध्यात्मिक अनुभूति का काव्यात्मक चित्र है। पर वह कोई वस्तुत माँ जननी जगदम्बा या फिर जीवन की करुणा शक्ति से बिना पूछे बिना नाम जाने बिना औपचारिक परिचय के जुड़ जाता है क्योंकि यह जुड़ाव शब्दों से परे है।
मौन के उस सूक्ष्म प्रदेश में जहाँ शब्द जन्म लेने से पहले ही विलीन हो जाते हैं वहाँ एक अनाम स्पर्श उतरता है न किसी आह्वान से न किसी विधि से वह न माँ कहलाती है न जननी न जगदम्बा फिर भी उसकी गोद का आभास अंतरतम को ऐसे भर देता है जैसे शिशु बिना नाम जाने ममता पहचान लेता है।
जुड़ाव परिचय का मोहताज नहीं है न ही किसी संज्ञा का आश्रित है यह तो बस घटित होता है जैसे भोर बिना घोषणा के उतरती है जैसे करुणा बिना शब्दों के बहती है उसी प्रकार उस मौन में एक अदृश्य धारा बहती है जीवन की करुणा की अस्तित्व के मूल स्पंदन की और तभी समझ आता है कि कुछ संबंध न पूछे जाते हैं न कहे जाते हैं वे बस होते हैं शब्दों के पार अनुभूति के भीतर।
मौन ही संवाद है और मौन संवाद वहां है जहां प्रेम श्रद्धा और अनुभूति है वहाँ ही जहाँ प्रश्न अनावश्यक हो जाते हैं क्योंकि यह माँ से मिलने का भाव है जहाँ नाम नहीं पूछा जाता।बस अपनापन होता है क्योंकि मौन सच में केवल शब्दों की अनुपस्थिति नहीं है बल्कि एक ऐसी अवस्था है जहाँ हृदय स्वयं बोलता है। जब प्रेम श्रद्धा और अनुभूति अपने शुद्ध रूप में उपस्थित होते हैं तब शब्दों की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है। उस क्षण में कोई तर्क नहीं होता कोई जिज्ञासा नहीं होती सिर्फ एक सीधा।सहज जुड़ाव होता है।
जैसे एक बच्चा अपनी माँ के पास जाता है वह न अपना परिचय देता है न कोई औपचारिकता निभाता है वहाँ केवल विश्वास, अपनापन और पूर्ण समर्पण होता है। वही मौन संवाद का सर्वोच्च रूप है असल में जब हम भीतर से शांत होते हैं तब ही हम उस मौन को सुन पाते हैं। और वहीं पर सच्चा मिलन होता है जहाँ शब्द नहीं।केवल अनुभव होता है।
मौन और विदाई का भाव ऐसा होता है और भावना इतनी गहरी है कि शब्दों में विदा भी नहीं कहा जाता क्योंकि माँ वह दिव्य उपस्थिति है जो चुपचाप आई और चुपचाप चली गई और यही जीवन का सत्य है जो सबसे प्रिय होता है, वह अक्सर बिना शोर के आता-जाता है।
सच है कि मौन और विदाई का संबंध बहुत सूक्ष्म होता है। जब भावनाएँ अपने चरम पर होती हैं तब शब्द पीछे छूट जाते हैं। विदा कहना एक औपचारिकता बन जाती है जबकि भीतर का संबंध उससे कहीं अधिक गहरा होता है इतना गहरा कि उसे कहा नहीं केवल जिया जाता है क्योंकि माँ केवल एक व्यक्ति नहीं एक अनुभूति होती है एक ऐसी दिव्य उपस्थिति।जो बिना शोर के जीवन में उतरती है और बिना आहट के कहीं भीतर समा जाती है। क्योंकि माँ को जाना कोई अंत नहीं लगता बल्कि एक मौन रूपांतरण जैसा होता है बाहर से अनुपस्थित लेकिन भीतर हमेशा उपस्थित है!
जो सबसे प्रिय होता है वह कभी भी शोर के साथ नहीं आता और न ही शोर के साथ जाता है वह आता है जैसे सुबह की पहली किरण धीरे धीरे कोमलता से आ जाती है वैसे ही आता है।और चला जाता है जैसे संध्या की धुंध बिना कोई निशान छोड़े आती है फिर भी सब कुछ बदलकर, शायद जीवन का सबसे सच्चा पक्ष यही है !
न आने की आहट थी न जाने की कोई ध्वनि वो मौन में ही पूरी कहानी लिख गई वो माँ थी इसलिए विदाई भी शब्दों में न आई और वो बस दिल में थी और दिल में ही सिमट गई, आत्मा का भाव भी ना जाने कैसा रूप में अपने अनुभूति से सब भाव भी देता है और सिमट भी जाता है!
माँ का आगमन प्रत्यक्ष नहीं बल्कि संकेत अनुभूति और स्पर्श के रूप में है वह यदा सदा अनंत बनकर आती है और स्मृति में स्थायी हो जाती है मेरे शब्द अब असमर्थ हैं क्योंकि आत्मा का संवाद दिल से दिल का होता है आँखों का भर आना हृदय का भीग जाना है शायद आगमन और स्मृति का यही सच्चा कथन है।
माँ के सामने सारा बौद्धिक ज्ञान छोटा पड़ जाता है चेतना केवल महसूस कर सकती है समझ नहीं सकती क्योंकि सुख-दुख और जीवन-दर्शन का।सुख दुख की बात क्या है आता जाता रहता है जीवन की द्वैतता में सुख–दुख क्षणिक है और माँ का स्पर्श इनसे परे है क्योंकि वह भीतर रह जाने वाली शांति दे जाती है क्योंकि मन बुद्धि ज्ञान सब अज्ञान के गरीब है!
माँ से मार्गदर्शन की प्रार्थना यह है कि नया साल बाहरी नहीं अंदर का नवजागरण है और आशीर्वाद की याचना है क्योंकि आंखों में खुशी देकर नया साल लाती थी।विदाई दुख नहीं देती बल्कि आशा देती है।माँ जाती है पर नया प्रकाश छोड़ जाती है।यही माँ गहरी छाप है और यही शायद नया साल नया दर्शन है!
सच्चा प्रेम मौन में होता है माँ शब्दों की मोहताज नहीं होतीजो चला जाता है, वही भीतर रह जाता है विदाई अंत नहीं परिवर्तन है प्रकाश रास्ता बन जाता है वही स्मृति साहस बन जाती है माँ जाती नहीं माँ बस रूप बदलती है और अपने पीछे एक नया प्रकाश छोड़ जाती है!
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें