आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, भटकाव से आत्मबोध तक साधक की यात्रा, Bhatkaav Se Aatmabodh Tak Saadhak Ki Yatra
आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति रचना, भटकाव से आत्मबोध तक साधक की यात्रा, Bhatkaav Se Aatmabodh Tak Saadhak Ki Yatra,
भटकाव कमजोरी नहीं जागृति का संकेत है अज्ञान और दोष स्वीकारना अहंकार को गलाता है और आत्मिक उन्नति शुरू करता है समर्पण और साधना माँ की अनंत कृपा तक पहुँचाते हैं। भीतर का खालीपन और भटकाव साधक को आत्मबोध की ओर ले जाते हैं दुःख और भ्रम का कारण बाहरी नहीं अपने अज्ञान को पहचानना है भटकाव असमंजस और खालीपन मार्ग की ओर लौटने का द्वार हैं।
भटकाव असमंजस और खालीपन साधक के लिए चेतना के द्वार हैं। यह बाहरी दुनिया की भ्रमित परिस्थितियों से आत्म-बोध की ओर ले जाने वाला मार्ग है। जब साधक अपने अज्ञान और दोषों को स्वीकार करता है और माँ के प्रति समर्पित होता है, तब अहंकार गलकर आत्मिक उन्नति और वास्तविक शांति का अनुभव होता है।
जब साधक माँ आदि-शक्ति ईश्वर की करुणा के पथ से भटक जाता है तो साधक की करुण पुकार अपने को अज्ञान दुर्बलता और आत्महीनता से ग्रस्त मानते हुए माँ से पुन मार्गदर्शन मांगता है क्योंकि माँ से की गई करुण पुकार वास्तव में कमजोरी नहीं बल्कि जागृति का संकेत है जब साधक अपने दोष अज्ञान और दुर्बलता को स्वीकार करता है तब अहंकार धीरे-धीरे गलने लगता है और आत्मिक उन्नति की पहली सीढ़ी चढ़ने लगाता है।
अपने अज्ञानता और दुर्बलता को स्वीकार करना है तो अपने भटकाव को बिना दोष दिए स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि समर्पण से ही माँ के चरणों में अपने मन बुद्धि और अहंकार को अर्पित करना पड़ता है क्योंकि जब नियमित साधना किया जाता है तो चाहे मन लगे या न लगे जप ध्यान प्रार्थना जारी रहती है और माँ के करुणा पर विश्वास ही माँ की कृपा अनंत हो कर साधक को कभी त्यागती नहीं बस उसकी परीक्षा लेती है!
साधक का पुकार ही मार्गदर्शन का द्वार है। अक्सर ऐसा होता है कि जब साधक पूरी तरह टूटकर माँ को पुकारता है तब माँ स्वयं साधक के जीवन में नए प्रकाश के रूप में प्रकट होती हैं अपनी स्वरूप की दर्शन प्रकट कर साधक में विलीन हो जाती है!
ईश्वर-मार्ग से विचलन ही जीवन में भटकाव है क्योंकि जब हम माँ के मार्ग को छोड़ कर चलते है वैसे ही जीवन की दिशा अस्पष्ट हो जाती है और बाहरी दुनियां में भटकते भटकते भीतर से खो जाते है और अहंकार के टूटने और आत्मबोध की शुरुआत की ओर बढ़ने लगते है।
वास्तव में ईश्वर-मार्ग से विचलन केवल बाहरी भटकाव नहीं है बल्कि यह भीतर की दिशा खो देने जैसा है जब साधक माँ के मार्ग से हटता है तो जीवन में भ्रम अस्थिरता और एक प्रकार की आंतरिक रिक्तता आ जाती है लेकिन इस भटकाव में भी एक अपना आध्यात्मिक महत्व है जब हम बाहरी दुनिया में भटकते-भटकते थक जाते हैं तब भीतर एक प्रश्न उठता है मैं वास्तव में कौन हूँ? और कहाँ जा रहा हूँ? यही प्रश्न आत्मबोध की शुरुआत बनता है अहंकार जो पहले हमें मैं और मेरा में बाँधे रखता था अब धीरे-धीरे टूटने लगता है।
जब भटकाव और आत्मबोध की शुरुआत होती है तो साधक के मन में ऐसा ही विचार आता है ये तेरी कैसी डगर माँ मैं कहा जा रहा हूँ अपनी ही मंजिल से दरबदर हो जा रहा हूँ क्योंकि साधक स्वीकार करता है कि हम माँ के मार्ग को छोड़ चुके है जीवन की दिशा अस्पष्ट हो गई है बाहरी दुनिया में भटकते हुए भीतर से खो गया है यह अहंकार के टूटने और आत्मबोध की शुरुआत ही है।
साधना के मार्ग का बहुत गहरा और सच्चा अनुभव है जब साधक के भीतर यह प्रश्न उठता है मैं कहाँ जा रहा हूँ? तो वास्तव में वही क्षण आत्मबोध की शुरुआत होता है क्योंकि भटकाव कोई अंत नहीं है बल्कि एक संकेत है। यह बताता है कि अब तक जो रास्ता था वह बाहरी था दुनिया इच्छाएँ अहंकार और पहचान से बना हुआ। जब यह सब डगमगाने लगता है तब भीतर से एक पुकार उठती है मूल की ओर लौटने की माँ के मार्ग की ओर।
जब बाहरी दुनिया में सब होते हुए भी भीतर खालीपन महसूस होता है और जीवन की दिशा धुंधली लगने लगती है तब साधक यह स्वीकार करता है कि हम मार्ग से भटक गए है किन्तु यह जागृति फिर आती है कि लेकिन यही तो सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है जो हमें उस मार्ग पर ले जाएगा जिस दुनियां में हम जाना है!
भीतर का खालीपन दरअसल एक गहरी पुकार है कोई कमी नहीं क्योंकि जब जीवन की दिशा धुंधली होने लगती है तब साधक पहली बार सच में देखना शुरू करता है पहले जो स्पष्ट लगता था वह केवल आदत और भ्रम था और जब यह स्पष्टता टूटती है तब भीतर एक सच्चा प्रश्न जन्म लेता है अब कहाँ? साधना की यात्रा का एक अत्यंत सूक्ष्म और निर्णायक बिंदु है यह विरोधाभास बाहर सब कुछ होते हुए भी भीतर खालीपन है!
जब तक भटकाव स्वीकार नहीं आता तब तक खोज भी शुरू नहीं होती और फिर जो अगली झलक आती है वह और भी गहरी होती है कि यही भटकाव यही खालीपन और यही असमंजस है जो दरअसल एक द्वार है मार्ग से भटकना हार नहीं बल्कि एक जागृति है जो जागरूक करने के लिए आती है क्योंकि जागरूक होने से पहले क्यों कैसे क्या जरूरी की भावना आती है और फिर स्थिर हो जाती है!
जब मन अज्ञान की स्वीकृति देता है तो मेरे दुःख का कारण मेरा वो अज्ञानता ही है न समाज है न परिस्थिति है बल्कि यह बार बार कहता है कि मेरे दुःख का कारण मेरा अज्ञान है क्योंकि जब मन अज्ञान को पहचानता है तो वह बाहर दोष देना बंद करता है।
वह समाज परिस्थिति लोगों को जिम्मेदार ठहराने से हटकर भीतर देखने लगता है यहीं से असली परिवर्तन शुरू होता है क्योंकि समाज का कोई प्रभाव नहीं सुनता न परिस्थितियाँ को कोई भूमिका निभाने देती है क्योंकि प्रभावित करने की जड़ साधक देख लेता है!
साधक यह समझता है कि प्रभाव की जड़ भीतर है और यही समझ उसे वास्तविक स्वतंत्रता और शांति की ओर ले जाती है। बाहरी प्रभाव तभी होता है जब अज्ञान उन्हें प्रभावशाली बना देता है अज्ञान हटते ही बाहरी चीजें प्रभावित नहीं करते क्योंकि साधक देखता है कि समाज और परिस्थितियाँ केवल भौतिक और मानसिक बाधाओ का केवल पृष्ठभूमि हैं।
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