आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल रचना, मौन में छिपा मार्गदर्शन और त्याग-करुणा की चेतना का प्रकाश, Maun Mein Chhipa Maargadarshan Aur Tyaag-Karuna Kee Chetana Ka Prakaash, Halendra Prasad,
मौन में छिपा मार्गदर्शन और त्याग-करुणा की चेतना का प्रकाश Maun Mein Chhipa Maargadarshan Aur Tyaag-Karuna Kee Chetana Ka Prakaash
यह भावपूर्ण लेख में माँ और गुरु के त्याग करुणा और मौन मार्गदर्शन को समर्पित है। सच्चा प्रेम और सच्चा नेतृत्व शब्दों से नहीं, बल्कि अनुभूति से प्रकट होते हैं। माँ और गुरु एक ही चेतना के दो रूप हैं, जो स्वयं पीड़ा सहकर भी जीवन को दिशा देते हैं मौन को आध्यात्मिक परिपक्वता का प्रतीक मानते हुए यह संदेश दिया गया है कि जीवन को समझना केवल भावपूर्ण हृदय ही जानता है।
भावपूर्ण हृदय का अर्थ है भावपूर्ण हृदय केवल नमन करना नहीं जानता, बल्कि वह जीवन की पीड़ाओं को मौन साधना में देखकर समझना जानता है। जब त्याग, समर्पण, शिक्षा और वास्तविक प्रेम जीवन के शिखर पर पहुँचते हैं, तब “मैं” समाप्त होकर “हम” में परिवर्तित हो जाता है। वहीं से जीवन का सच्चा प्रवाह प्रारंभ होता है।
माँ और गुरु एक ही चेतना के दो रूप माँ और गुरु अलग नहीं हैं। माँ छुपकर रोती है गुरु मौन रहकर मार्ग दिखाता है दोनों अपनी वेदना को व्यक्त नहीं करते, पर उसी मौन में जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा छिपी होती है जो स्वयं पीड़ा सहकर भी संसार को मुस्कुराहट देता है, वही वास्तविक शक्ति है।
मौन की आध्यात्मिक शक्ति सबसे गहरी अनुभूतियाँ शब्दों की मोहताज नहीं होतीं मौन ही भाषा है, मौन ही आदेश है, मौन ही स्नेह है जो मौन की ध्वनि को सुन लेता है, वह अपनी आवाज़ खोता नहीं बल्कि वह स्वयं मौन की भाषा बन जाता है। यही आध्यात्मिक परिपक्वता है।
विरह और नेतृत्व का शून्य यह है कि जब माँ, गुरु या नायक बिछड़ते हैं, तब केवल व्यक्तिगत दुःख नहीं होता बल्कि समाज और आत्मा दोनों दिशाहीन हो जाते हैं। सच्चा नेतृत्व दिखाई नहीं देता, वह महसूस होता है यदि मार्गदर्शक उचित न हो, तो जीवन का प्रवाह भटक जाता है।
प्रेम की सूक्ष्म अनुभूति प्रेम शोर नहीं करता वह अनकहा, अदृश्य और भीतर बहने वाला अनुभव है किन्तु जब प्रेम अधिकार बनकर आधिपत्य स्थापित करता है, तब उसमें गुलामी की गंध आने लगती है सच्चा प्रेम स्वतंत्र करता है, बाँधता नहीं।
मानसिक थकान बनाम शारीरिक आलस्य शरीर की थकान विश्राम से मिटती है पर मन की थकान आत्मचिंतन से।मानसिक थकान कमजोरी नहीं, बल्कि एक संकेत है कि आत्मा विश्राम और पुनर्संवाद चाहती है।
माँ और गुरु जीवन की वह आधारशिला हैं जो बिना कुछ कहे सब कुछ दे देती हैं उनका त्याग, उनकी करुणा, उनका मौन ही जीवन की वास्तविक शिक्षा है जीवन चलाना सरल है पर जीवन को समझना वह केवल भावपूर्ण हृदय ही कर सकता है।
भावपूर्ण हृदय सचमुच नमन करता है क्योंकि भावपूर्ण हृदय केवल नमन नहीं बल्कि माँ गुरु और जीवन की पीड़ाओं को मौन की साधना से देखना है भावपूर्ण हृदय तब बनता है जब जीवन त्याग समर्पण शिक्षा और वास्तविक प्रेम शिखर पर गमन करता है जहां न मैं होता हम होता केवल जीवन का सच्चा बहाव होता है!
त्याग करुणा और मौन बलिदान का प्रतीक है क्योंकि यह सत्ता कभी माँ के रूप में कभी गुरु के रूप में और कभी नेतृत्व करने वाली आत्मा के रूप में सामने आती है वह सत्ता जो स्वयं पीड़ा सहकर भी संसार को हँसाकर संभालती है वहीं पीड़ा हँसकर टाल देती वेदना को और जीवन का उधार करती है !
माँ और गुरु का समन्वय यह है कि माँ और गुरु अलग नहीं हैं दोनों एक ही चेतना के दो रूप हैं माँ जो छुपकर रोती है गुरु जो मौन रहकर मार्ग दिखाता है क्योंकि माँ की उस पीड़ा को दर्शाती है जिसे वह कभी व्यक्त नहीं करती और गुरु उस पीड़ा को दर्शाते है जो कभी व्यक्त नहीं करते!
सबसे गहरी अनुभूतियाँ शब्दों की मोहताज नहीं होतीं मौन ही भाषा है मौन ही आदेश है मौन ही स्नेह है आध्यात्मिक परिपक्वता का संकेत है मौन की भाषा सबकुछ कहती है पर आवाज नहीं आती किन्तु जो मौन की आवाज को सुन लेता है उसके पास अपनी आवाज नहीं होती क्योंकि आवाज की अपेक्षा ना होकर भाषा बन कर मौन रह जाना परिपक्वता ही है!
विरह और नेतृत्व का संकट तब आता है जब माँ गुरु नायक बिछड़ता है और फिर ये जीवन दिशाहीन हो जाता है कौन रास्ता दिखाएगा? कौन आगे चलेगा? यह केवल व्यक्तिगत दुःख नहीं है बल्कि समाज और आत्मा के नेतृत्व के शून्य को दर्शाता है क्योंकि इस जीवन को मार्गदर्शन देने वाले यदि उचित न हो तो ये जीवन दिशाहीन हो ही जाएगा!
प्रेम की सूक्ष्म अनुभूति में प्रेम कभी शोर नहीं करता वह अनकहा, अलक्षित और भीतर बहता है नायिका का कुएँ पर ठिठकना मन का विचलन नायक का अनजाने में आगमन करना ये सभी जीवन के भावलोक के प्रतीक हैं मन के भाव में मनुष्य कभी कभी बह जाता है!
मानसिक थकान बनाम शारीरिक आलस यह है कि थकान शरीर की नहीं मन की होती है जब मन थक जाता हैं तो आधुनिक जीवन की सटीक मनोवैज्ञानिक व्याख्या करता है पर मानसिक थकान मन और शरीर की कमजोरी नहीं है बल्कि एक ऐसी खोज है जो पीड़ाओं से मुक्ती प्रदान करता है!
सच्चा प्रेम और सच्चा नेतृत्व दिखता नहीं बल्कि महसूस होता है प्रेम कोई पर्दाथ नहीं है जो दिखेगा प्रेम अदृश्य दृशय है जो महसूस किया जा सकता देखा नहीं जा सकता पर प्रेम के आड़ में प्रेम जब अधिकार बनकर प्रेम अपने अधिकार को आधिपत्य स्थापित करता है तो उसमें गुलामी की बु आने लग जाती है और और वो एक दिन टूट जाता है क्योंकि माँ और गुरु सबसे अधिक कष्ट सहकर भी सबसे कम बोलते हैं जो हँसकर वेदना टाल देता है, वही जीवन का वास्तविक आधार है
मौन करुणा की संस्कार और आत्मा की पुकार तथा ईश्वर की कृपा हर क्षण बोलती है पर उसे समझना और समझ कर उसका नेतृत्व करना न समझ में आता है न समझ पाते है कारण मौन में बोलते रहना और हृदयों को जाग्रत करते रहना फिर भी भ्रम जाग्रत नहीं होने देता आध्यात्मिक दृष्टि से या माँ के प्रतीकात्मक रूप में भी अलग से समझ सकते हैं!
माँ और गुरु के त्यागमय स्वरूप का भावपूर्ण चित्रण है माँ गुरु स्वयं कष्ट सहकर भी जीवन की वेदनाओं को मुस्कान में ढाल लेते हैं। वे अपनी पीड़ा छुपाकर संसार को संभालते हैं और मौन रहकर मार्गदर्शन करते हैं।विरह, प्रेम मानसिक थकान मौन की शक्ति और नेतृत्व के अभाव का गहन वर्णन यह है कि सच्चा प्रेम और सच्चा मार्गदर्शन शब्दों से नहीं, अनुभूति से प्रकट होता है।
माँ और गुरु जीवन की वह आधारशिला हैं जो बिना कुछ कहे, सब कुछ दे देती हैं समग्र रूप से यह जीवन त्याग करुणा मौन स्नेह और आध्यात्मिक चेतना का सार है क्योंकि की जीवन चलना आसान है पर जीवन को समझना कठिन है!
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें