चेतन अवचेतन और साक्षी भीतर का वास्तविक मैं कौन?, Chetan, Avachetan Aur Saakshee Bhitar Ka Vastvik Main Kaun?
चेतन वह अवस्था है जिसमें मनुष्य वर्तमान क्षण में जागरूक रहता है। जब वह सोचता है निर्णय लेता है पढ़ता है समझता है और परिस्थितियों के अनुसार तुरंत प्रतिक्रिया देता है तब वह चेतन अवस्था में होता है यह सजगता सतर्कता विवेक और समझदारी की स्थिति है। चेतन मन तर्क विश्लेषण और विचार-विमर्श के आधार पर निर्णय लेता है यानी जागरूकता विवेक है जो तत्काल प्रतिक्रिया चेतन अवस्था चेतन ही वह शक्ति है जो हमें अपने कर्तव्यों दायित्वों और वर्तमान परिस्थितियों के प्रति सचेत रखती है।
अवचेतन मन वह स्तर है जो हमारी प्रत्यक्ष जागरूकता के नीचे कार्य करता है। यह वर्तमान क्षण में प्रत्यक्ष रूप से अनुभव में नहीं आता परंतु निरंतर सक्रिय रहता है।अवचेतन में हमारी आदतें भावनात्मक पैटर्न स्मृतियाँ डर विश्वास संस्कार और अनुभव संग्रहित रहते हैं। यह मृत या ज्ञानरहित नहीं होता बल्कि अत्यंत सक्रिय और शक्तिशाली होता है अवचेतन मन तत्काल तर्क नहीं करता बल्कि पूर्व अनुभवों और स्थापित धारणाओं के आधार पर प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। कई बार हमारी स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रियाएँ आदतें या भावनात्मक व्यवहार इसी से संचालित होते हैं यानी संग्रहित अनुभव आदतें गहरे भावनात्मक संस्कार अवचेतन मन।
अवचेतन की मुख्य विशेषताएँ यह है कि हमारी आदतें जो काम हम बिना सोचे करते हैं जैसे चलना गाड़ी चलाना वे अवचेतन में संग्रहित पैटर्न से संचालित होते हैं क्योंकि भावनात्मक पैटर्न बार-बार के अनुभवों से बने भावनात्मक ढाँचे अवचेतन में जमा हो जाते हैं।
अवचेतन में स्मृतियाँ विशेषकर बचपन की गहरी स्मृतियाँ है जहां डर और विश्वास कई बार हमें कारण पता नहीं होता फिर भी प्रतिक्रिया आती है यह अवचेतन से उत्पन्न होती है संस्कार परिवार, समाज, संस्कृति से मिले गहरे प्रभाव। क्योंकि मनोविज्ञान के अनुसार अवचेतन कई बार तुरंत प्रतिक्रिया भी देता है अचानक किसी खतरे की वस्तु को देखकर डर जाना और किसी की आवाज़ से तुरंत असहज हो जाना यह प्रतिक्रिया इतनी तेज होती है कि हमें लगता है हमने सोचा ही नहीं और निर्णय हो गया क्योंकि निर्णय पहले ही अवचेतन स्तर पर हो चुका होता है।
अवचेतन शून्य या मृत नहीं है और अवचेतन निष्क्रिय भी नहीं है बल्कि अत्यंत प्रभावशाली और सक्रिय है मनोविश्लेषण के आधार से विचेतन मन में दबे हुए इच्छाओं और विचारों से भरा है मानव में अनुभवों का भण्डार है जो कुछ तुरन्त प्रतिक्रिया देती कुछ बाद में जो तुरन्त प्रतिक्रिया देती है उसे चेतन कहा जाता है और जो बाद में देती है उसे अचेतन कहा जाता है इसी आधार पर अवचेतन निष्क्रिय नहीं, बल्कि अत्यंत प्रभावशाली और सक्रिय है।
दार्शनिक दृष्टि से यदि अभी में न होना अवचेतन हैं तो यह अधिक ध्यान-योग या अद्वैत दृष्टिकोण की परिभाषा हो सकता है क्योंकि जहाँ वर्तमान क्षण की जागरूकता को चेतना और उससे हटे हुए पैटर्न को अवचेतन माना जाता है।
हम सोचते हैं कि हम तर्क से निर्णय लेते हैं, पर अधिकतर निर्णय अवचेतन प्रेरणाओं से आते हैं क्योंकि पानी के ऊपर छोटा हिस्सा चेतन और पानी के नीचे विशाल हिस्सा अवचेतन कहलाता है!
जब मन स्मृति कल्पना भय या भविष्य की योजनाओं में उलझा रहता है तब व्यक्ति स्वचालित पैटर्न में जीता है। यह अवस्था अवचेतन संचालन जैसी है जहाँ प्रतिक्रियाएँ जागरूक चुनाव से नहीं बल्कि संस्कारों से आती हैं और जब मन वर्तमान साक्षी-भाव में नहीं ठहरता, तब वह नाम-रूप की दुनिया में खोकर स्वयं को सीमित मान बैठता है। इस अर्थ में अभी में न होना आत्म-विस्मृति है जो अवचेतन के समान ही है।
ध्यान परंपराएँ चाहे वे वेदांत हों या बौद्ध विपश्यना वर्तमान क्षण की जागरूकता को चेतना का द्वार मानती हैं। जब यह स्मृति टूटती है, तब व्यक्ति आदतन प्रतिक्रियाओं में बहता है जो आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में अवचेतन पैटर्न कहे जा सकते हैं।
हमारे भारतीय दर्शन की भाषा के अनुसार से चेतन वर्तमान मन की सक्रिय वृत्तियाँ है और अवचेतन चित्त में जमा संस्कार है और संस्कार पिछले अनुभवों की छाप है और वही छाप भविष्य की प्रतिक्रिया बनती है।
आधार चेतन अवचेतन जागरूकता सीधे अनुभव में अप्रत्यक्ष गति धीमी तर्कसंगत तेज स्वचालित नियंत्रण सीमित बहुत प्रभावशाली उदाहरण अभी पढ़ना बिना सोचे गुस्सा आ जाना स्मृति अल्पकालिक दीर्घकालिक भावनात्मक मुख्य अंतर तालिका है!
जब कोई व्यक्ति आपको अपमानित करता है तो चेतन कहेगा शांत रहना चाहिए परन्तु अवचेतन कहेगा मैं बचपन से अपमान सहता आया हूँ तुरंत क्रोध या हीनता प्रतिक्रिया अभी देंगें पर जड़ पुरानी होगी।
स्वप्न में क्या होता है? जब चेतन सो जाता है और अवचेतन प्रतीकों में बोलता है यानी सपनों में तर्क नहीं होता बल्कि भावनाएँ अधिक होती हैं चेतन और अवचेतन दोनों मन के स्तर हैं और इन दोनों को जानने वाला तीसरा तत्व है साक्षी होता है क्योंकि विचार को देखने वाला विचार नहीं है आध्यात्मिक क्रांति है।
अवचेतन केवल मनोविज्ञान नहीं है चेतना एक प्रकार का स्तर अवचेतन को दबे हुए अनुभवों का भंडार माना जाता है और व्यक्तिगत से आगे सामूहिक स्तर तक विस्तारित किया जाता है क्योंकि चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है क्योंकि मन जो सोचता है बुद्धि जो निर्णय करती है अहंकार जो मैं का भाव बनाता है संस्कार हैं वही आपका अवचेतन है।
हम कल्पना करते है कि संस्कार कैसे काम करता हैं? जब अनुभव प्रतिक्रिया देता है तो बार-बार दोहराव करता है और संस्कार स्वचालित व्यवहार करता है क्योंकि संस्कार विचार उत्पन्न करता है तो भाव उत्पन्न होते है और भाव उत्पन्न होते है तो कर्म नया संस्कार गढ़ता है और यही चक्र जीवन में चलते रहता है!
स्वप्न और अवचेतन वह प्रतिक्रियाएं है जहां स्वप्न वह द्वार है जहाँ चेतन सो जाता है और अवचेतन बोलता है दिन भर दबाई गई भावनाएँ अधूरे कर्म अनकहे भय रात में प्रतीकों में प्रकट होते हैं जिसे योग में सूक्ष्म शरीर की गतिविधि कहा गया है।
मैं कौन हूँ? विचार को देखने वाला कौन है? भाव को जानने वाला कौन है? और स्वप्न को अनुभव करने वाला कौन है? और वह साक्षी अवचेतन भी नहीं है पर वह उससे भी परे है। यानी चेतन जो अभी सोच रहा है अवचेतन जो भीतर संचालित कर रहा है साक्षी चेतना जो दोनों को देख रही है जब आप साक्षी में टिकते हैं, तब पहली बार स्वतंत्रता शुरू होती है।
प्रतिक्रिया से पहले रुकना विचार को देखना और भावना को नाम देना ध्यान में बैठना स्वप्नों को लिखना धीरे-धीरे संस्कार अपनी पकड़ ढीली करते हैं। अंतिम रहस्य यह है कि अवचेतन शक्ति है। पर साक्षी स्वामी है।जब तक हम शक्ति से तादात्म्य रखते हैं, जीवन आपको चलाता है।किन्तु जब आप साक्षी में स्थिर होते हैं, तब आप जीवन को जागरूकता से जीते हैं।
जब नींद और स्वप्न, सपनों में अक्सर अवचेतन मन अपने दबे भावों या अधूरी इच्छाओं को प्रतीकों में व्यक्त करता है क्योंकि चेतन विचार कई बार हमें लगता है कि हम सोच-समझकर निर्णय ले रहे हैं, पर उनके पीछे अवचेतन धारणाएँ काम कर रही होती हैं और व्यवहारिक जीवन और कर्म हमारे संस्कार बचपन जवानी के अनुभव और अंदर बैठी मान्यताएँ हमारे कर्मों को प्रभावित करती हैं।
अवचेतन प्रभावशाली है परन्तु पूर्णत नियंत्रक नहीं।मनुष्य में जागरूकता की शक्ति होती है पर ध्यान आत्मचिंतन और सचेत अभ्यास से हम अवचेतन पैटर्न को पहचानकर बदल सकते हैं। क्योंकि मेरा अवचेतन नींद-स्वप्न चेतन विचार और व्यवहारिक जीवन कर्म सब पर उसी का प्रभाव है, वही सबकुछ संचालित करती है।
जो हर जीव के भीतर विद्यमान है पर फिर भी अप्राप्य अलौकिक और अकेला है यानी सब पर अधिकार रखने के बावजूद वह स्वयं सबसे दूर है अकेली है किसी के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी नहीं।जो सबके भीतर है जो सबको संचालित कर रही है वही स्वयं संगहीन और एकाकी है। कभी कभी लगता है कि ईश्वर आत्मा प्रकृति चेतना या किसी आदर्श प्रेम की ओर भी इशारा कर रही है!
भाव और दर्शन दोनों स्तरों पर जो हर जीव के भीतर विद्यमान है इसका अर्थ है कि वह तत्त्व हर प्राणी के अंदर है मनुष्य पशु पक्षी सबमें। उपनिषदों में इसे आत्मा या परमात्मा कहा गया है। वह बाहर से आने वाली कोई वस्तु नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व का मूल है। श्वास चेतना अनुभव करने की क्षमता सब उसी से है।
पर फिर भी अप्राप्य है पर यही गहराई है। वह भीतर होते हुए भी इंद्रियों से नहीं पकड़ा जा सकता। न आँख से दिखता है, न बुद्धि से पूरी तरह समझा जा सकता है। क्योंकि हम उसे बाहर खोजते हैं नाम रूप विचारों में जबकि वह इन सबसे परे है।
अलौकिक जो लोक में नहीं मिलता है जो अद्भुत है अपूर्व है सामान्य प्राकृतिक नियमों से परे है वह जन्म-मरण समय-स्थान सुख-दुःख से बँधा नहीं है। शरीर बदलता है मन बदलता है पर वह तत्त्व सदा एक-सा रहता है। इसलिए उसे दिव्य शुद्ध चेतना कहा गया है और अकेला है!
अकेलापन दुःख का नहीं है बल्कि अद्वैत का संकेत है वह दूसरा नहीं रखता। जब केवल वही सत्य है, तो उसके लिए दूसरा कौन? भीतर वही है बाहर भी वही पर अज्ञान के कारण हमें अनेकता दिखती है परम सत्य की ओर इशारा करती है जो सबके भीतर है फिर भी पकड़ में नहीं आता प्रकृति से परे है और अंततः एकमात्र है और साधना का उद्देश्य यही है उसे पाना नहीं बल्कि पहचान लेना है।
क्या चेतन समझदारी है ? आंशिक रूप से हाँ पर पूरी तरह नहीं। क्यों? क्योंकि चेतन केवल जागरूक होने की अवस्था है समझदारी बुद्धि उसका एक कार्य है पूरा स्वरूप नहीं हमारे दर्शन में मन के चार आयाम बताए गए है मन विचार और विकल्प बनाता है बुद्धि निर्णय करती है अहंकार मैं कर रहा हूँ का भाव चित्त स्मृति और संस्कारों का भंडार है क्योंकि मन बुद्धि की सक्रिय अवस्था है पर समझदारी मुख्यत बुद्धि का गुण है।
सजगता और प्रतिक्रिया यह है कि सजग सचेत सतर्क सावधान और कर्तव्य के प्रति प्रतिक्रिया देना एक सूक्ष्म अंतर से समझते है यदि प्रतिक्रिया स्वचालित है तो वह अवचेतन से आ रही है यदि प्रतिक्रिया देखने के बाद चुनी गई है तो वह सचेत है जैसे कोई अपमान करे तुरंत क्रोध आता है अवचेतन है और रुककर देखना समझना फिर उत्तर देना चेतन है!
चेतन की सीमा चेतन मन बहुत छोटा भाग है हम सोचते हैं कि हम समझदारी से निर्णय ले रहे हैं पर अक्सर निर्णय पहले हो चुका होता है और चेतन बाद में उसे तर्क दे देता है यानी समझदारी भी कभी-कभी अवचेतन से प्रभावित होती है सबसे गहरी बात यह है कि चेतन जागरूक सोच है पर साक्षी जागरूकता स्वयं है!
चेतन तत्काल जागरूक मानसिक गतिविधि है और समझदारी बुद्धि का कार्य है और अवचेतन पृष्ठभूमि की प्रोग्रामिंग साक्षी है इन सबका द्रष्टा आप सही दिशा में सोच रहे हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या आपकी सजगता निरंतर रहती है,या परिस्थितियों में बदल जाती है और यहीं से आत्मचिंतन गहरा होता है पर उस सजगता को जानने वाला कौन है?
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