यह गीत जीवन-पथ पर थके, भ्रमित और संघर्षरत साधक की हृदय-निवेदन है। कवि शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक और मानसिक थकावट को व्यक्त करता है, जहाँ शब्द भी भावों का भार नहीं उठा पाते। दुर्बलता, लाचारी और मोह ने उसकी शक्ति क्षीण कर दी है, फिर भी भीतर एक प्यास शेष है ज्ञान, शांति और सत्य की। इस गीत के माध्यम से कवि स्वयं को अज्ञानी स्वीकार कर माँ से शीतल ज्ञान और आंतरिक अनुशासन की याचना करता है। गुरु उसे परम सत्य का लक्ष्य दिखाते हैं, और माँ का प्रेम उसे उस पथ पर चलने की शक्ति देता है। अनेक बाधाओं और आंधियों के बीच भी साधक दीपक की भाँति अपनी लौ को बचाए रखता है। अंततः माँ की कृपा से कवि की हृदय में पुनः जीवन, आशा और प्रेम का संचार होता है। प्रकृति तक इस अनुभूति में सहभागी बन जाती है। यह गीत बताता है कि श्रद्धा, धैर्य और मातृ-आश्रय से थका हुआ मन भी फिर से जाग उठता है। भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, थकर गिर गई है बोली मेरी गहरी थी प्रवाह रे माई, Thakar Gir Gai Hai Boli Meri Gahari Thi Prwah Re Mai, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
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Writer ✍️ #Halendra Prasad
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कैसे तुझसे मै कहूं अब अपनी दिल की हाल रे माई
थकर गिर गई है बोली मेरी गहरी थी प्रवाह रे माई
दुर्बलता ने घेरा मुझको निर्बलता ने घेरा
कमज़ोरी ने घेरा मुझको लाचारी ने घेरा
तन की शक्ति काम ना करती मन की शक्ति धूमिल हुई
बल की शक्ति लुप्त हुई है दिल की शक्ति खाली हुईं
असहाय थकावट आए थे दिल को खूब भरमाए थे
जार दिये थे भ्रम से अपनी मन खूब दौड़ाएं थे
कैसे तुझसे मै कहूं अब अपनी दिल की हाल रे माई
थकर गिर गई है बोली मेरी गहरी थी प्रवाह रे माई
मैं प्यासा प्यासा राही हूँ माँ पथ मेरा सूखा है
भीतर की आकांक्षा जलती दिल मेरा रुखा है
श्रोत नहीं है ज्ञान का कोई मैं अज्ञानी अनपढ़ हूँ
शीतल श्रोत की विद्या दे मैं अज्ञानी में दौड़ता हूँ
जागते सपने को मईया अब मन मेरा रोक देता
भ्रम माया के मोह आलस्य ने निंदिया मेरा तोड़ देता
त्याग दूं मैं इस जीवन को माँ आगे बढ़ते जाऊ
अन्तर्मन के अनुशासन का हर क्षण साथ निभाऊं
कैसे तुझसे मै कहूं अब अपनी दिल की हाल रे माई
थकर गिर गई है बोली मेरी गहरी थी प्रवाह रे माई
गंतव्य गुरु मेरे कहते है सत्य परम का धाम मेरा
दिल मेरा कहता है मईया आश्रय लेले प्रेम तेरा
रुक ना पाता थककर आगे बढ़ता हूँ
टूट गया है तनमन मेरा फिर भी दृढ़ निश्चय पे चलता हूँ
स्वीकार जीवन को करके मईया धैर्य वचन का पालन करता
अडिग रहा मैं अपने पथ पर थकर चूरे चूर हुआ
जैसे कोई दीपक मईया आंधी बीच बचाता खुदको
हिलता डुलता लौ भी मईया अपना सत्त दिखाता आपको
कैसे तुझसे मै कहूं अब अपनी दिल की हाल रे माई
थकर गिर गई है बोली मेरी गहरी थी प्रवाह रे माई
हे मईया तू शेरावाली मेरी अंजली में जल दिया
डाल दिया तू घड़े की पानी मन को मेरी सफल किया
देख रहा था पेड़ पौधों ने खड़े खड़े मुस्काए
गूंज उठी आवाजें दिल में सर सर धुन सुनाए
कोमल कोमल सहमतियों ने अपने स्वर से जोड़े
हल्की हल्की बूंदों से माँ दिल मेरा अब खोले
प्यार तेरा मैं भूल ना पाऊं याद रखूं हरदम
दिल दरिया में रखकर तुझको याद करु हर पल
कैसे तुझसे मै कहूं अब अपनी दिल की हाल रे माई
थकर गिर गई है बोली मेरी गहरी थी प्रवाह रे माई
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