यह गीत कवि की गहन आत्मानुभूति और माँ के प्रति अटूट प्रेम को व्यक्त करता है। प्रकृति की शांति, बीतता समय और मन की थकान के बीच कवि अपनी चेतना में डूब जाता है। माँ की स्मृतियाँ हवा, खुशबू और विचार बनकर उसके हृदय व आत्मा में बस जाती हैं। यह रचना मातृ-वियोग, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक शांति का भावपूर्ण चित्रण है। भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, डूब गया चेतना मेरी समझ में ना आया, Dub Gaya Chetana Meri Samajh Men Naa Aaya, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
गीत =} #डूब गया चेतना मेरी समझ में ना आया
#Dub Gaya Chetana Meri Samajh Men Naa Aaya
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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बीत गई सवेरा मईया पंछी चुप हुई
थककर मौन हुई गीतिया सब अपनी घर गई
हल्की हल्की हवा बहती हल्की धुन लाती है
निम की पत्तईयॉ माँ बुदबुदाकर कुछ गाती है
बैठा हूँ अकेला मैं ना जाने किस सोच में
डूब गया अनजाने विचारों के खोज में
वक्त का ये धारा माई अहसास में डुबाया
डूब गया चेतना मेरी समझ में ना आया
बीत गई सवेरा मईया पंछी चुप हुई
थककर मौन हुई गीतिया सब अपनी घर गई
सुस्ती ने घेरा मुझको भाव बेविभोर
घेरा था थकान मुझको तनकी ना होस था
दिन बढ़ते जाते थे ताप बढ़ती आती थी
खोया था मैं किस दुनियां में रास नहीं आती थी
जीता जागता प्राण मेरा समय को ना देखे
किसको सुनाऊं हाल जो सुनकर निरेख
मैं अनजाना अनपढ़ बैठा उस हाल में
कान को सुनाई देता दिल था बेहाल में
बीत गई सवेरा मईया पंछी चुप हुई
थककर मौन हुई गीतिया सब अपनी घर गई
लगता है मुझको मैं खोया हूँ कुछ बातें
ढूंढता हूँ खाली हाथ दवा की वो यादें
बदला जमाना है बदला खबर है
आने जाने वालों का ये कैसा सफर है
जज्बातों का जोश उमंग भर के बोला
आते है सुख दुख करम देखकर बोला
शाम थी सुहानी फ़लक चांद जैसा
बसा था मेरे दिल में तेरे नाम जैसा
बीत गई सवेरा मईया पंछी चुप हुई
थककर मौन हुई गीतिया सब अपनी घर गई
हवाओं की नजरे जब मेरे दिल को छुई
नाम दिया तेरा मुझको मुझसे लिपटकर वो रोई
तेरी यादों की वो खुशबू मुझको बुलाती
मन में समाकर मईया आत्मा में घर बनाती
बार बार बोले मुझसे तुझको बुलाई है
यादों में समाकर मेरे आँखों से आई है
तुझको बसाया दिल में आत्मा में सुलाया
याद करता हूँ रोज मैं ध्यान में घुलाया
बीत गई सवेरा मईया पंछी चुप हुई
थककर मौन हुई गीतिया सब अपनी घर गई
गीत =} #डूब गया चेतना मेरी समझ में ना आया
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बीत गई सवेरा मईया पंछी चुप हुई
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