कविता, विडम्बनाओं का कारवां, हलेन्द्र प्रसाद
||विडम्बनाओं का कारवां||
बड़ी अजीब सी विडंबना है साहब कुछ कह नहीं सकते
सबकुछ रखके भी कुछ गह नहीं सकते
एक थाली में खाकर आंसू बाट लिया करते थे
आज आंसुओं में रहकर भी दरारें भर नहीं सकते
खुशी के समंदर को लाया था गम को मिटाने के लिए
गम इतना है कि खुशी से भर नहीं सकते
बड़ी ऊंची उच्ची उड़ाने थी खुशीयो की बहुत ठिकाने थी
रुक ना पाया उस जगह जहां खुशियों की सदायएँ थी
कुछ खुशियां इस कदर आए कि बगावत कर बैठे
जो दीवारें टूट ना पाई उसमें कील ठोक बैठे
ज़िंदगी में खुशियों अजीब सा संगम है
ग़मों की आंधी में अपनों का अजीब हमदम है
नग से नगीना बनना था मुसाफिर बन गया
जिसने सबकुछ दे दिया वो ज्ञानि बन गया
जो हिमालय की कंदराओं में तपस्या किया वो साधु बन गया
जिसने कारण पूछा वो विद्वान बन गया
दरबदर बदल रहा था आसियाना
पीछे पड़ा था सवालों का शामियाना
उत्तर देते तो भी गुनहगार बन जाते
नहीं देते तो मक्कार बन जाते
मौन की हथियार की भी अजीब सी परछाई थी
जिन्दगी खुली किताब थी पर मन में काई थी
हवा डोलता था तो पत्ते बोलते थे
कभी हां कभी ना में टटोलते थे
नदियां जोर जोर से कहती थी ना रोक यही रटती थी
समुन्दर से मिलने का दलील आगो से कहती थी
कोई शोकवान हो गई तो कोई पूजावन हो गई
कोई पत्थरत हो गई तो कोई शमशान हो गई
अंधेरी रातों में भी चमक कर तारों की मेहमान हो गई
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