मनुष्य का शरीर नश्वर है और अंत में राख बन जाता है, लेकिन उसके भीतर की आत्मिक चेतना और ऊर्जा अमर होती है। साधना और आत्मज्ञान की अग्नि से मनुष्य अपने अहंकार, घमंड और भय को जला देता है। जब साधक इन बंधनों से मुक्त हो जाता है, तब वह भीतर से स्वतंत्र शांत और जागृत हो जाता है। संसार उसे पागल समझ सकता है पर वास्तव में वह आत्मिक सत्य को प्राप्त कर चुका होता है। यही अवस्था सच्ची मुक्ति और आंतरिक स्वतंत्रता की है।जिसे आत्मज्ञान वैराग्य अहंकार त्याग और आत्मा की स्वतंत्रता का संदेश कहते है।आध्यात्मिक दार्शनिक अनमोल भक्ति शक्ति आराधना प्रार्थना भजन कीर्तन अर्चन गीत, मेरे गर्मी से गतिमान है कण मैं राख में रहत, #Mere Garmi Se Gatimaan Hai Kan Main Raakh Mein Rehta, Writer ✍️ #Halendra Prasad,
गीत =} #मेरे गर्मी से गतिमान है कण मैं राख में रहता
#Mere Garmi Se Gatimaan Hai Kan Main Raakh Mein Rehta.
Writer ✍️ #Halendra Prasad
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पूछो हाल ना मेरा मैं तो राखके हर कण कण में रहता
मेरे गर्मी से गतिमान है कण मैं राख में रहता
मेरे आत्मा की ऊर्जा मुझसे आकर बोली
तेरे दिल की साधना है तेरे दिल की डोली
भस्म हुआ मैं राख के अंदर राख मेरा घर द्वार है
जला दिया अहंकार घमंड भय भी जलता रहता है
बचा हुआ है शेष जो मुझमें वो भी राख का ढेर है
मैं हूँ रही राख खेलवना मुझमें केवल राख है
पूछो हाल ना मेरा मैं तो राखके हर कण कण में रहता
मेरे गर्मी से गतिमान है कण मैं राख में रहता
मेरी चेतना की गर्मी अग्नि जैसी जलती है
प्रचंड तेजस्वी रूप सजाकर उग्र भाव में रहती है
मौत जैसा प्रतीत होता है हलचल भी ना करता
मेरे ऊष्मा से जीवित है वो राख बनकर रहता
गतिशील हो जाता देख दुनियां की ढांचा को
जला देता अभिमान गुमान को गर्व की राजा को
अन्तर मन की शान्ति मेरी बाहर पर निर्भर ना है
निर्भर है हालात को देखकर साधक दिल कहता है
पूछो हाल ना मेरा मैं तो राखके हर कण कण में रहता
मेरे गर्मी से गतिमान है कण मैं राख में रहता
मैं एक ऐसा पागल हूँ जो जेल में आजाद हूँ
धरती अम्बर मेरे साथ मैं कितना बिंदास हूँ
सांसारिक नजरों पे छाया पागलपन पागल
आत्मिक सत्य पागल ना है मुक्ति का है छागल
मुक्त हुआ मेरा तन मन जब मैं पड़ा था
मुक्ति का प्रतीक सूचक मेरे साथ में खड़ा था
दुनियां नियम और देह अवस्था मन कि एक आजादी है
आत्मा है स्वतंत्र जहां पे मन भी उसपे राजी है
पूछो हाल ना मेरा मैं तो राखके हर कण कण में रहता
मेरे गर्मी से गतिमान है कण मैं राख में रहता
मन मेरा मुक्त हुआ है बन्धन क्या मुझे बांधे
कैद में आजाद रहता जेलर क्या डांटे
भीतर से मैं जाग गया हूँ बन्धन ना मुझे बांध सके
भस्म लगाया राखो का मैं प्राण मेरा अब राख भए
दिखता है आकाश मुझे कारागार ना रोक पाता
जीवन की सारी सृष्टि दिखती सृष्टि में घुल जाता
चेतना की अग्नि मैं तो तपकर लाल हुआ हूँ
अन्दर से स्वतंत्र हुआ मैं राख पड़ा हुआ हूं
पूछो हाल ना मेरा मैं तो राखके हर कण कण में रहता
मेरे गर्मी से गतिमान है कण मैं राख में रहता
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#Mere Garmi Se Gatimaan Hai Kan Main Raakh Mein Rehta.
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